प्रसव पीड़ा से तड़पती महिला… 4 किमी दूर एंबुलेंस और बीच में नदी। पत्नी को दर्द से कराहते देख पति और परिजन बेचैन थे। गांव तक सड़क नहीं थी और नदी पार किए बिना एंबुलेंस तक पहुंचना मुमकिन नहीं था। आखिरकार परिजनों ने कपड़े की झोली बनाई। उसमें गर्भवती यशोदा मरकाम को बैठाया और झोली के दोनों सिरों में लकड़ी फंसाकर दो लोगों ने उसे कंधों पर उठा लिया। इसी तरह यशोदा को सिलगी नदी पार कराई। नदी पार करने के बाद भी मुश्किल खत्म नहीं हुई। एंबुलेंस तक पहुंचने के लिए साढ़े 3 किमी पैदल चलना पड़ा। शहपुरा सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में यशोदा का सुरक्षित प्रसव हुआ। मां और बच्चा दोनों स्वस्थ हैं और घर लौट चुके हैं। लेकिन डिंडोरी के कलगी टोला में सड़क नहीं होने से ग्रामीणों को आज भी बुनियादी जरूरतों के लिए ऐसी मुश्किलों से गुजरना पड़ता है। यहां करीब 300 लोग रहते हैं। डिंडोरी जिले की पाकर बघरा ग्राम पंचायत के पोषक गांव कलगी टोला पहुंचकर दैनिक भास्कर टीम ने जाना कि सड़क और पुल के अभाव में ग्रामीणों की जिंदगी कितनी मुश्किल है। पढ़िए ग्राउंड रिपोर्ट… पहले देखिए दो तस्वीरें… एंबुलेंस तक पहुंचने के लिए साढ़े 3 किमी पैदल चले परिजन कलगी टोला निवासी राजेश मरकाम ने बताया कि 18 अक्टूबर को उनकी पत्नी यशोदा मरकाम को प्रसव पीड़ा हुई। आशा कार्यकर्ता ने एंबुलेंस को फोन किया, लेकिन गांव तक सड़क नहीं होने के कारण वह करीब 4 किमी दूर भीटी टोला में खड़ी थी। परिजनों ने कपड़े की झोली बनाई और उसके दोनों सिरों में लकड़ी फंसाकर यशोदा को कंधों पर उठाया। इस तरह करीब 100 मीटर सिलगी नदी पार कराई। नदी पार करने के बाद परिजन यशोदा को लेकर साढ़े 3 किमी पैदल चले और एंबुलेंस तक पहुंचे। इसके बाद उन्हें शहपुरा सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र ले जाया गया, जहां सुरक्षित प्रसव हुआ। राजेश के मुताबिक, यशोदा और बच्चा दोनों स्वस्थ हैं और घर लौट चुके हैं। 300 की आबादी, गांव तक नहीं पहुंचते वाहन डिंडोरी जिला मुख्यालय से करीब 50 किमी दूर पाकर बघरा ग्राम पंचायत के पोषक गांव कलगी टोला में लगभग 300 लोग रहते हैं। गांव तक पक्की सड़क नहीं है। ग्रामीणों को मुख्य सड़क तक पहुंचने के लिए सिलगी नदी पार करनी पड़ती है। सामान्य दिनों में भी आवागमन आसान नहीं है, जबकि बारिश में नदी का जलस्तर बढ़ने पर गांव से बाहर निकलना और मुश्किल हो जाता है। सड़क के अभाव में मरीजों को अस्पताल पहुंचाना ही नहीं, रोजमर्रा के जरूरी कामों के लिए बाहर जाना भी चुनौती है। गांव तक वाहन नहीं पहुंच पाते, इसलिए ग्रामीणों को नदी और कच्चे रास्ते की स्थिति देखकर आवागमन करना पड़ता है। यशोदा को झोली में बैठाकर नदी पार कराने की घटना इसी परेशानी की तस्वीर है। बारिश में बच्चों की पढ़ाई भी प्रभावित कलगी टोला में प्राथमिक स्कूल और आंगनबाड़ी केंद्र हैं, लेकिन मिडिल स्कूल पाकर बघरा में है। ग्रामीणों के मुताबिक, बारिश के दौरान सिलगी नदी में पानी बढ़ने पर बच्चे और शिक्षक स्कूल नहीं पहुंच पाते। इससे बच्चों की पढ़ाई प्रभावित होती है। गांव से बाहर जाने के लिए खेतों से होकर एक कच्चा रास्ता भी गुजरता है। फसल खड़ी होने के दौरान इस रास्ते से वाहनों का निकलना मुश्किल होता है। फसल कटने के बाद ही ट्रैक्टर और बड़े वाहन यहां से गुजर पाते हैं। बारिश में यह रास्ता भी भरोसेमंद विकल्प नहीं रहता। ग्रामीणों की मांग है कि गांव को मुख्य सड़क से जोड़ने के लिए स्थायी मार्ग बनाया जाए, ताकि बच्चों की पढ़ाई और जरूरी काम प्रभावित न हों। 2014 में पुल के लिए सर्वे हुआ, लेकिन काम आगे नहीं बढ़ा ग्रामीणों के मुताबिक, सिलगी नदी पर पुल बनाने की मांग वर्षों पुरानी है। वर्ष 2014 में तत्कालीन कलेक्टर छवि भारद्वाज ने पुल निर्माण के लिए सर्वे कराया था। इससे ग्रामीणों को उम्मीद जगी थी कि गांव तक पहुंचने का रास्ता बनेगा। हालांकि, ग्रामीणों का कहना है कि कलेक्टर के स्थानांतरण के बाद मामला आगे नहीं बढ़ा। पाकर बघरा सरपंच कौशल सिंह नेताम ने बताया कि सिलगी नदी पर पुलिया नहीं होने से भीटीटोला और कलगी टोला के ग्रामीणों को बारिश में भारी परेशानी होती है। बच्चे कई दिनों तक स्कूल नहीं जा पाते और बीमारों व गर्भवती महिलाओं को समय पर अस्पताल पहुंचाना मुश्किल हो जाता है। 18 अक्टूबर को प्रसव पीड़ा से परेशान यशोदा मरकाम को परिजनों ने कपड़े की झोली में बैठाकर नदी पार कराई, क्योंकि एंबुलेंस 4 किमी दूर खड़ी थी। शासन-प्रशासन को कई बार समस्या बताने के बावजूद पुलिया नहीं बनी। अब आश्वासन नहीं, पुलिया का निर्माण चाहिए, ताकि ग्रामीणों को इलाज, शिक्षा और आवागमन के लिए हर बारिश में संघर्ष न करना पड़े। जब से होश संभाला, तब से नदी पार कर रहे हैं कलगी टोला निवासी सकीना धुर्वे बताती हैं कि उनकी उम्र करीब 35 साल है। जब से होश संभाला है, तब से नदी पार कर रहे हैं। रिश्तेदारी में जाना हो या बाजार, इसी नदी से होकर गुजरना पड़ता है। गांव में प्राइमरी स्कूल है, लेकिन छठवीं कक्षा में पढ़ने के लिए पाकर बघरा मिडिल स्कूल जाना पड़ता था। बारिश के दिनों में नदी में बाढ़ आने से स्कूल जाना लगभग बंद हो जाता था। पानी कम होने पर घुटनों तक पानी में से निकलकर जाना पड़ता था। आज भी स्थिति नहीं बदली है। बच्चे अब भी नदी पार करके स्कूल जाते हैं। शादी के बाद मायके जाना हो, तब भी नदी पार करनी ही पड़ती है। जनप्रतिनिधि और अधिकारी आए, लेकिन पुल नहीं बना ग्रामीण गुलाब सिंह बताते हैं कि गांव के बच्चे, बुजुर्ग और बीमार लोग आसानी से अस्पताल पहुंच सकें, बच्चे स्कूल जा सकें और गांव तक गाड़ियां पहुंचें, इसके लिए वे कई वर्षों से नदी पर पुल बनाने की मांग कर रहे हैं। अधिकारी, विधायक और सांसद भी गांव आकर स्थिति देख चुके हैं, लेकिन पुल नहीं बन सका। चुनाव के समय नेता भाषणों में आश्वासन जरूर देते हैं, लेकिन जीतने के बाद मांग भूल जाते हैं। गुलाब सिंह कहते हैं कि बड़ा पुल नहीं बन पा रहा है तो कम से कम छोटा पुल ही बना दिया जाए, ताकि बाढ़ न होने पर वाहन गांव तक पहुंच सकें। विधायक बोले- पुल पर ₹3 करोड़ खर्च होंगे, दूसरे रास्ते पर विचार शहपुरा विधायक ओमप्रकाश धुर्वे ने कहा कि वे ग्रामीणों की समस्या से अवगत हैं। सिलगी नदी पर पुल बनाने में करीब ₹3 करोड़ खर्च होने का अनुमान है। इसी वजह से निर्माण में देरी हो रही है। उन्होंने बताया कि जंगल की तरफ से वैकल्पिक सड़क बनाने पर विचार किया जा रहा है। इस रास्ते में कुछ किसानों की जमीन आती है, इसलिए उनकी सहमति जरूरी है। विधायक के मुताबिक, किसानों से सहमति बनने पर सड़क निर्माण की योजना आगे बढ़ाई जा सकती है। फिलहाल ग्रामीणों को पुल या वैकल्पिक सड़क बनने का इंतजार है। कलेक्टर बोलीं- वैकल्पिक रास्ते का सर्वे करने इंजीनियर भेजेंगे कलेक्टर अंजू पवन भदौरिया ने बताया कि मुख्यमंत्री जनविश्वास शिविर में ग्रामीणों ने सड़क की समस्या रखी थी। इसके बाद आरईएस विभाग के कार्यपालन यंत्री और सब इंजीनियर को मौके पर भेजकर सर्वे कराया जाएगा। इसमें देखा जाएगा कि वैकल्पिक रास्ते में कितनी शासकीय और कितनी निजी जमीन आ रही है।
