Homeछत्तीसगढ़बेटी की चिंता में चाहती थी दुनिया खत्म हो जाए:15 साल बाद...

बेटी की चिंता में चाहती थी दुनिया खत्म हो जाए:15 साल बाद दोबारा किताब थामकर टीचर बनीं मां, आज स्पेशल बच्चों को पढ़ा रहीं

साल 2012 में जब दुनिया खत्म होने की बातें चल रही थीं, तब मैं चाहती थी कि सच में दुनिया खत्म हो जाए…रायपुर की संगीता धुरंधर यह कहते हुए अपनी जिंदगी के उस सबसे मुश्किल दौर को याद करती हैं, जब स्पेशल चाइल्ड बेटी सृष्टि के भविष्य की चिंता उन्हें अंदर से तोड़ चुकी थी। उन्हें लगता था कि अगर सब कुछ खत्म हो जाएगा तो शायद बेटी और परिवार के हिस्से का दुख भी खत्म हो जाएगा। लेकिन वक्त बदला और वही मां, जो कभी अपनी बेटी के लिए रास्ता खोज रही थी, आज स्पेशल बच्चों की दुनिया को आगे बढ़ाने में जुटी हैं। शिक्षक दिवस पर एक मां के संघर्ष की कहानी, जिन्होंने शादी के 15 साल बाद दोबारा पढ़ाई शुरू की और स्पेशल एजुकेटर बनीं। संगीता रायुपर में बेटी सृष्टि के नाम से स्पेशल स्कूल चला रही हैं, जहां करीब 52 बच्चे पढ़ रहे हैं। बच्चों को पढ़ाई के साथ उनकी क्षमता के अनुसार काम सिखाया जाता है। कई बच्चों को रोजगार मिला है। पढ़िए ये रिपोर्ट… पहले देखिए ये तस्वीरें- दुनिया एक कमरे तक सीमित होकर रह गई थी संगीता की 2 बेटियां हैं। छोटी बेटी सृष्टि स्पेशल चाइल्ड है। सृष्टि जब करीब सात-आठ साल की थी, तब परिवार को उसकी स्थिति का सही तरीके से एहसास हुआ। इसके बाद जिंदगी पहले जैसी नहीं रही। बेटी की जरूरतों को समझना, उसकी देखभाल करना और सबसे ज्यादा उसके भविष्य की चिंता करना, परिवार की रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन गया। संगीता बताती हैं कि एक समय ऐसा भी आया, जब सृष्टि की दुनिया लगभग एक कमरे तक सीमित होकर रह गई थी। एक मां के लिए अपनी बेटी को इस तरह दुनिया से अलग होते देखना बेहद कठिन था। उम्मीद मिली तो मंदिर से अस्पताल तक दौड़ी संगीता बताती हैं कि बेटी के लिए उम्मीद की तलाश में उन्होंने शायद ही कोई रास्ता छोड़ा हो। वह कई मंदिरों में गईं और बेटी के ठीक होने की दुआ मांगी। लोगों की सलाह पर बाबा और बैगा के पास भी गईं। इसके साथ ही कई बड़े शहरों के अस्पतालों में डॉक्टरों से भी मिलीं। संगीता कहती हैं, ‘जहां से भी थोड़ी सी उम्मीद दिखाई देती थी, मैं वहां जरूर जाती थी। लेकिन धीरे-धीरे उन्हें समझ आने लगा कि बेटी को बदलने की कोशिश से ज्यादा जरूरी है उसे समझना और उसकी जरूरतों के अनुसार जिंदगी को बदलना।’ 2012 में दुनिया खत्म होने की दुआ करने लगी वह दौर संगीता के लिए मानसिक रूप से बेहद कठिन था। बेटी के भविष्य को लेकर लगातार चिंता रहती थी और आगे का रास्ता दिखाई नहीं देता था। इसी दौरान साल 2012 में दुनिया खत्म होने की चर्चाएं चल रही थीं। संगीता बताती हैं कि उस समय उनके मन में भी यह ख्याल आने लगा था कि शायद दुनिया खत्म हो जाए तो परिवार के सारे दुख भी खत्म हो जाएंगे। आज वह उस समय को याद करते हुए कहती हैं कि जिंदगी का वह सबसे कमजोर दौर था, लेकिन शायद उसी दर्द ने उन्हें आगे बढ़ने की ताकत भी दी। शादी के 15 साल बाद फिर पढ़ाई की संगीता ने महसूस किया कि स्पेशल बच्चों को सबसे ज्यादा जरूरत किसी ऐसे व्यक्ति की होती है, जो उन्हें धैर्य से समझ सके। उन्होंने तय किया कि बेटी की परेशानी को सिर्फ अपनी जिंदगी का दुख बनाकर नहीं रखेंगी। शादी के करीब 15 साल बाद उन्होंने दोबारा पढ़ाई शुरू की और स्पेशल एजुकेशन के क्षेत्र में आगे बढ़ने का फैसला किया। पढ़ाई में शुरुआत आसान नहीं थी, लेकिन बेटी के साथ बिताया हर दिन उनके लिए एक अनुभव और सीख बनता गया। धीरे-धीरे उन्होंने स्पेशल बच्चों की जरूरतों और उनकी क्षमताओं को समझना शुरू किया और स्पेशल एजुकेटर बन गई। बेटी सृष्टि के नाम से शुरू किया स्कूल आज संगीता रायपुर में बेटी सृष्टि के नाम से स्पेशल बच्चों के लिए स्कूल चला रही हैं। यह स्कूल समाज कल्याण विभाग से भी जुड़ा हुआ है और यहां सैकड़ों बच्चों को उनकी जरूरत और क्षमता के अनुसार पढ़ाई और ट्रेनिंग दी जाती है। संगीता कहती हैं कि स्पेशल बच्चों को पढ़ाना सिर्फ किताबों का ज्ञान देना नहीं है। हर बच्चे की क्षमता अलग होती है और उसे सीखने के लिए अलग तरीके की जरूरत पड़ती है। एक स्पेशल चाइल्ड की मां होने के कारण वह बच्चों के साथ-साथ उनके माता-पिता की चिंता को भी बेहतर तरीके से समझ पाती हैं। पढ़ाई के साथ काम करने की भी ट्रेनिंग असिस्टेंट प्रोफेसर और समाजसेवी डॉ. प्रीति उपाध्याय बताती हैं कि स्पेशल एजुकेशन का उद्देश्य सिर्फ बच्चों को पढ़ाना नहीं, बल्कि उन्हें अपनी क्षमता के अनुसार आत्मनिर्भर बनाना भी है। कई बच्चों को बुटीक और कपड़ों की दुकानों जैसे स्थानों पर उनकी क्षमता के अनुसार हल्के काम के लिए तैयार किया गया है, जिससे उन्हें रोजगार मिला और वे कुछ पैसे कमाकर अपना जीवन आसान बना सके। इस शिक्षक दिवस पर संगीता धुरंधर की कहानी सिर्फ एक टीचर की उपलब्धि की कहानी नहीं है। यह उस मां की कहानी है, जो कभी अपनी बेटी के भविष्य को लेकर इतनी परेशान थी कि उसे जिंदगी का अंत ही आसान रास्ता लगने लगा था। लेकिन आज वही मां अपने दर्द को ताकत बनाकर सैकड़ों बच्चों और उनके परिवारों के लिए उम्मीद बन गई है। …………………… इससे जुड़ी ये खबर भी पढ़िए… बेमेतरा की 2 शिक्षिकाओं को मिलेगा राज्यपाल पुरस्कार: खेल-खेल में पढ़ाई और प्रयोगों से बदली बच्चों की सीखने की शैली,निजी खर्च से क्लासरूम भी संवारा शिक्षा के क्षेत्र में नए प्रयोग और बेहतर काम करने वाली बेमेतरा जिले की दो शिक्षिकाओं का चयन राज्यपाल पुरस्कार के लिए किया गया है। शासकीय प्राथमिक शाला मगरघटा की सहायक शिक्षिका शीतल बैस और शासकीय प्राथमिक शाला कंतेली की सहायक शिक्षिका आँचल वर्मा को शिक्षक दिवस पर सम्मानित किया जाएगा। पढ़ें पूरी खबर

Stay Connected
16,985FansLike
2,458FollowersFollow
61,453SubscribersSubscribe
Must Read
Related News

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here