राष्ट्रीय आर्थिक अनुसंधान परिषद (NCAER) ने बिहार में शराबबंदी को खत्म करने का सुझाव दिया है। रिसर्च पेपर में कहा है कि शराबबंदी अपने मकसद में फेल रहा है। इसलिए इसे खत्म करने का समय आ गया है। वहीं, केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी ने एक बार फिर बिहार में शराबबंदी का गुजरात मॉडल लागू करने की डिमांड की है। इंडिया पॉलिसी फोरम की स्टडी में क्या है, बिहार की तेज तरक्की के लिए इसे खत्म करना जरूरी है, सम्राट सरकार बात मानेगी, समझेंगे; बूझे की नाही में…। सवाल-1ः NCAER की स्टडी में बिहार सरकार को क्या सुझाव दिया गया है? जवाबः मशहूर टेक्नोक्रेट नंदन नीलेकणी की अध्यक्षता वाली NCAER ने 6 से 8 अगस्त तक इंडिया पॉलिसी फोरम-2026 कार्यक्रम किया। इसमें बिहार के विकास को लेकर एक रिसर्च पेपर प्रस्तुत किया गया। जिसमें बिहार के तेज आर्थिक विकास के लिए शराबबंदी जैसे कानून को खत्म करने की सिफारिश की गई। रिसर्च पेपर की मुख्य बातें जानिए… शराबबंदी का मकसद नहीं हुआ पूरा रिसर्च पेपर में दावा किया गया है कि शराबबंदी अपने मुख्य मकसद को पूरा करने में सफल नहीं रहा है। अप्रैल 2016 में शराबबंदी लागू करने का मुख्य उद्देश्य यह सोच थी कि इससे घरेलू हिंसा कम हो जाएगी। हालांकि, आंकड़े बताते हैं कि महिलाओं के खिलाफ दर्ज अपराधों में कोई कमी नहीं आई है। उल्टे बढ़े ही हैं। BAI ने शराबबंदी खत्म करने के लिए लेटर लिखा इस रिसर्च पेपर से पहले जुलाई में भारत में बीयर बनाने वाली कंपनियों की शीर्ष संस्था है ब्रुअर्स एसोसिएशन ऑफ इंडिया (BAI) ने भी CM सम्राट चौधरी को लेटर लिखकर शराबबंदी की समीक्षा करने की मांग की थी। सवाल-2ः क्या तेज तरक्की के लिए शराबबंदी खोलना ही विकल्प है? जवाबः इसे 2 अर्थशास्त्रियों से समझिए… सिर्फ पैसा कमाने के लिए शराबबंदी ना खोलें अर्थशास्त्री और पटना यूनिवर्सिटी के शिक्षक अविरल पांडेय कहते हैं, ‘बिहार में शराबबंदी को केवल सरकार के राजस्व के नजरिये से देखना उचित नहीं होगा। NFHS-4 में 15-49 साल के बीच के 28.9% पुरुषों ने शराब पीने की जानकारी दी थी, जो NFHS-5 में 17% और NFHS-6 में 16.5% रही। वहीं, NFHS-4 में जिन महिलाओं के पति अक्सर नशे में रहते थे, उनमें 83.1% ने शारीरिक या यौन हिंसा की बात बताई थी, जबकि पति के शराब नहीं पीने की स्थिति में यह आंकड़ा 31.7% था।’ पैसा जुटाने के लिए शराबबंदी से अलग ऑप्शन भी हैं अर्थशास्त्री और पटना यूनिवर्सिटी के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. शांतनु कहते हैं, ‘बिहार के सामाजिक ताने बाने को देखते हुए अभी शराबबंदी खोलना उचित नहीं है। रिपोर्ट में महिलाओं के खिलाफ बढ़ते क्राइम का जिक्र किया गया है। ऐसा नहीं है। क्राइम सिर्फ शराब पीकर ही नहीं होता, उसके कई अलग कारण होते हैं।’ डॉ. शांतुन कहते हैं, ‘NFHS-5 सर्वे के डेटा को देखें तो महिलाओं की प्रेग्नेंसी के दौरान हिंसा के मामलों में 2% की कमी आई है। जबकि, पड़ोसी राज्य UP में 0.7% और बंगाल में 1.5% की कमी थी। अगर पुरुषों में प्री-हाइपरटेंशन के मामले को देखें तो बिहार में बढ़ोत्तरी का रेट सिर्फ 1.8% था। जबकि, पड़ोसी UP में 10.9% और बंगाल में 4% था।’ सवाल-3ः …तो क्या सम्राट सरकार NCAER की सिफारिश मानेगी? जवाबः फिलहाल इसकी संभावना कम है। नीतीश कुमार यानी JDU के सरकार में रहते बहुत मुश्किल है। यही कारण है कि मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी कई मौकों पर कह चुके हैं कि हम नीतीश कुमार के इस ऐतिहासिक फैसले को नहीं बदलेंगे। 10 अगस्त को मंत्री सुनील कुमार ने कहा, ‘बिहार में फिलहाल शराबबंदी कानून पूरी तरह लागू है और सरकार इसे लेकर अपने रुख पर कायम है।’ दरअसल, शराबबंदी का मामला सीधे तौर पर वोट बैंक से जुड़ा है। नीतीश कुमार ने शराबबंदी लागू कर महिला वोटरों को अपनी तरफ किया है। महिलाओं में नीतीश कुमार सहित NDA की पैठ इस तरह के कानून से ही है। इसे ऐसे समझिए… प्रशांत किशोर ने शराबबंदी खत्म करने की बात कही, हार गए सवाल-4ः शराबबंदी को लेकर राजनीतिक दलों की क्या राय है? जवाबः JDU को छोड़कर लगभग सभी पार्टियों के नेता शराबबंदी को खत्म करने की समय-समय पर डिमांड कर चुके हैं। 9 अगस्त को एक बार फिर केंद्रीय मंत्री जीतन राम मांझी ने पूर्ण शराबबंदी को खत्म करने की मांग की। उन्होंने कहा कि यहां भी गुजरात मॉडल लागू किया जाना चाहिए। परमिट के आधार पर शराब की बिक्री होनी चाहिए। बाकी नेताओं की सिलसिलेवार राय जानिए…
