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‘बस घर पहुंचना है…’ कहते-कहते थम गया जिंदगी का सफर:दौसा बस हादसे में पत्नी को खो चुके चंद्रप्रकाश बोले- निर्मला ने स्टेटस लगया था- ‘यात्रा पूरी’

चारधाम यात्रा पूरी कर दोनों घर लौट रहे थे। सभी धामों में दर्शन अच्छे से हुए थे। परिवार से बात करने के बाद पत्नी निर्मला गुप्ता ने खुशी-खुशी सोशल मीडिया पर ‘यात्रा पूरी’ का स्टेटस भी लगाया था। किसी ने नहीं सोचा था कि घर पहुंचने से कुछ घंटे पहले ही यह सफर उनकी जिंदगी का आखिरी सफर बन जाएगा। राजस्थान के दौसा बस हादसे में पत्नी निर्मला गुप्ता को खो चुके इंदौर के वरिष्ठ पत्रकार चंद्रप्रकाश (चंदू) गुप्ता ने दैनिक भास्कर से बातचीत में उस दर्दनाक रात का मंजर बताया। उन्होंने कहा- हम घर लौट रहे थे, लेकिन एक पल में सब खत्म हो गया। दौसा जिले में 30 जून की देर रात दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे पर ऋषिकेश से इंदौर आ रही स्लीपर बस आगे चल रहे ट्रेलर से टकरा गई। टक्कर इतनी जबरदस्त थी कि दोनों वाहनों में आग लग गई। हादसे में 8 यात्रियों की मौत हो गई, जबकि 21 लोग घायल हो गए थे। पत्नी 3 साल से दोबारा चारधाम यात्रा पर जाने की जिद कर रही थीं चंद्रप्रकाश (चंदू) गुप्ता ने बताया कि “मेरी पत्नी निर्मला पिछले तीन साल से दोबारा चारधाम यात्रा पर जाने की जिद कर रही थीं। हम पहले भी चारधाम की यात्रा कर चुके थे। मैंने उन्हें समझाया कि एक बार दर्शन हो चुके हैं, लेकिन उनका कहना था कि वहां अब काफी बदलाव हो गया है, इसलिए दोबारा जाना है। यात्रा की पूरी तैयारी हो चुकी थी। आने-जाने की ट्रेन की टिकट भी कन्फर्म थी, लेकिन निर्मला ने कहा कि ट्रेन में प्लेटफॉर्म बदलते समय सामान लेकर इधर-उधर घूमना पड़ेगा। बस से सफर करेंगे तो ज्यादा सुविधा रहेगी। पता नहीं क्यों मैंने उनकी बात मान ली। कन्फर्म ट्रेन टिकट रद्द कर दी और 19 जून को बस से चारधाम यात्रा पर निकलने का फैसला कर लिया। एक परिचित की सलाह पर हमने एक ट्रैवल्स की बस से यात्रा शुरू की। रास्ते में बस का एसी खराब हो गया था, लेकिन जैसे-तैसे आगे बढ़े। चारों धामों में अच्छे से दर्शन हुए। हमारे दामाद की वजह से कई व्यवस्थाएं भी आसानी से हो गईं। 29 जून को हम हरिद्वार लौट आए। वापसी की बस अगले दिन थी, इसलिए 30 जून को पूरा दिन हरिद्वार घूमते रहे। तब हमें बिल्कुल अंदाजा नहीं था कि इंदौर लौटने का यही सफर हमारी जिंदगी की सबसे बड़ी त्रासदी बन जाएगा। बेटे से कहा- पहले वाली बस मत कराना, उसका एसी खराब हो गया था चंद्रप्रकाश (चंदू) गुप्ता बताते हैं कि 30 जून को हमें इंदौर लौटना था। मैंने बेटे को फोन कर कहा कि जिस बस से हम इंदौर से चारधाम आए थे, उसी से वापसी की बुकिंग मत कराना। उस बस का एसी खराब हो गया था, इसलिए किसी दूसरी बस में सीट बुक करवा देना। शाम 4:20 बजे हमारी बस थी। हम 4 बजे तक हरिद्वार घूम रहे थे। तभी अचानक याद आया कि बस का समय हो गया है। हमने जल्दबाजी में एक रिक्शा किया। रिक्शा चालक ने बस स्टैंड तक छोड़ने के 600 रुपए मांगे। हमने होटल से सामान लिया और करीब 4:15 बजे बस स्टैंड पहुंचे। वहां रिक्शा को अंदर ले जाने के लिए अलग से 90 रुपए भी देने पड़े। बस स्टैंड पहुंचकर पता चला कि हमारी बस वहां से नहीं, बल्कि ऋषिकेश की ओर से चलती है। मैंने तुरंत बस संचालक से संपर्क किया। उसने कहा कि बस करीब 5 बजे उस रास्ते से निकलेगी, आप सड़क पार करके वहीं आ जाइए। मैं और मेरी पत्नी सारा सामान उठाकर पैदल वहां पहुंचे। कुछ देर इंतजार करने के बाद फिर फोन किया तो बताया गया कि आधा किलोमीटर और पीछे आना पड़ेगा। हम फिर सारे बैग उठाकर पैदल वहां तक पहुंचे। आखिरकार वहीं हमें इंदौर जाने वाली बस मिल गई। आज सोचता हूं, अगर उस बस तक नहीं पहुंचते या वह छूट जाती, तो शायद मेरी पत्नी आज जिंदा होती। लेकिन उस वक्त यही लग रहा था कि किसी भी तरह बस नहीं छूटनी चाहिए। क्या पता था कि जिस बस को पकड़ने के लिए हम इतना संघर्ष कर रहे हैं, वही मेरी पत्नी का आखिरी सफर बन जाएगी। कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि यह सफर मेरी पूरी दुनिया बदल देगा।” इंदौर लौटने के बाद विदिशा और वृंदावन भी जाना था चंद्रप्रकाश (चंदू) गुप्ता बताते हैं, इंदौर लौटने के बाद हमारा विदिशा जाने का कार्यक्रम पहले से तय था। वहां परिवार का एक कार्यक्रम था। विदिशा से हमें वृंदावन भी जाना था। बस में सफर के दौरान निर्मला ने मुझसे कहा था कि बैग तो पहले ही पैक है। घर पहुंचकर सिर्फ तैयार होंगे और फिर विदिशा के लिए निकल जाएंगे। इसके बाद सांवरियाजी और फिर कुलदेवी के दर्शन करने का भी कार्यक्रम बनाया था। हमें क्या पता था कि इनमें से कोई भी योजना पूरी नहीं हो पाएगी। ‘यात्रा पूरी’ लिखकर लगाया था स्टेटस गुप्ता ने बताया कि बस में बैठने के बाद निर्मला बहुत खुश थीं। पिछले कई सालों में मैंने उनके चेहरे पर इतनी खुशी नहीं देखी थी। पूरे रास्ते हम परिवार की बातें करते रहे। बच्चों से फोन पर बात हुई। उन्होंने बताया कि चारधाम यात्रा अच्छे से पूरी हो गई है। वह सोशल मीडिया पर बहुत कम कुछ पोस्ट करती थीं, लेकिन उस दिन उन्होंने ‘यात्रा पूरी’ लिखकर स्टेटस लगाया। अब जब पीछे मुड़कर उन सभी घटनाओं को जोड़ता हूं तो लगता है, जैसे उन्हें पहले से किसी अनहोनी का आभास था।
44 साल साथ निभाया, कभी कोई शिकायत नहीं की हमारे साथ बहुत दर्दनाक हादसा हुआ। 18 मई 1982 को मेरी और निर्मला की शादी हुई थी। करीब 44 साल हमने साथ बिताए। इस दौरान हमारे तीन बच्चे हुए। बड़ी बेटी प्रियंका को डॉक्टर बनाया, बेटे मयंक को एमबीए कराकर अच्छी नौकरी तक पहुंचाया और सबसे छोटी बेटी दीपाश्री को प्रशासनिक सेवा में भेजा। बच्चों की पढ़ाई, उनका हौसला बढ़ाना, उन्हें जिंदगी की हर सीख देना और आगे बढ़ाना। इन सबमें सबसे बड़ा योगदान निर्मला का ही रहा। पत्रकारिता की व्यस्तता के कारण मैं घर को उतना समय नहीं दे पाता था, लेकिन उन्होंने पत्नी, मां और गृहिणी की हर जिम्मेदारी पूरी निष्ठा से निभाई। घर आने वाले मेहमानों की देखभाल हो या मेरे कामों में सहयोग, उन्होंने कभी कोई कमी नहीं छोड़ी। उन्होंने कभी अपनी पसंद-नापसंद को महत्व नहीं दिया। पहनने-ओढ़ने और खाने-पीने में जो मिला, उसी में खुश रहीं। हमारे बच्चों को शून्य से शिखर तक पहुंचाने में उनकी सबसे बड़ी भूमिका रही। वह खुद भी ग्रेजुएट थीं, इसलिए शिक्षा को हमेशा सबसे अधिक महत्व दिया। हादसे से पहले तक वह हमारे पोते-पोतियों को भी पढ़ाती थीं। तेज धमाका हुआ, ऊपर वाले यात्री हमारे ऊपर आ गिरे चंद्रप्रकाश (चंदू) गुप्ता ने बताया कि करीब ढाई बजे मेरी नींद खुली। तभी जोरदार धमाका हुआ। हम स्लीपर बस की नीचे वाली सीट पर सो रहे थे। टक्कर इतनी भीषण थी कि ऊपर की बर्थ पर सो रहे यात्री हमारे ऊपर आ गिरे। बस और ट्रेलर इस तरह टकराए कि दोनों आपस में चिपक गए। निर्मला खिड़की की तरफ सो रही थीं। टक्कर के बाद उसी तरफ से ट्रेलर बस की बॉडी को चीरता हुआ अंदर घुस गया। मेरी सीट वाली तरफ का हिस्सा दब गया था। मुझे लगता है कि खिड़की की ओर बैठे यात्रियों को सबसे ज्यादा सिर में चोट लगी। संभवतः निर्मला को भी गंभीर चोट लगी और ऊपर से गिरे यात्रियों के कारण उनकी मौके पर ही मौत हो गई। मैं पत्नी को आवाज देता रहा, बस में हर तरफ ‘बचाओ-बचाओ’ की चीखें थीं चंद्रप्रकाश (चंदू) गुप्ता बताते हैं- हादसे के तुरंत बाद मैंने निर्मला को आवाज लगाई, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला। पूरी बस धुएं से भर चुकी थी। चारों तरफ अफरा-तफरी मची थी। कोई ‘बचाओ… बचाओ…’ चिल्ला रहा था, कोई कह रहा था कि एक्सीडेंट हो गया, आग लग जाएगी। निर्मला का एक पैर सीट में फंस गया था। मैंने किसी तरह उनका पैर बाहर निकाला। उनके शरीर में कोई हलचल नहीं थी। मैंने उन्हें उठाने की कोशिश की, तभी पीछे से किसी ने मुझे खींच लिया और कहा, ‘क्या मरना है? बस में आग लग गई है।’ वह मुझे जबरदस्ती बाहर ले आया। बाहर निकलते समय रास्ते में एक घायल व्यक्ति पड़ा था। हमने उसे भी उठाकर सुरक्षित जगह पहुंचाया। इसके बाद मैं फिर से निर्मला को निकालने के लिए बस की ओर दौड़ा, लेकिन तब तक आग तेजी से फैल चुकी थी। आग की लपटें ड्राइवर तक पहुंच गई थीं। उसके पैर स्टीयरिंग में फंसे हुए थे और वह मेरी आंखों के सामने जिंदा जल गया। दो लोग सब्बल से उसे निकालने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन आग इतनी भीषण थी कि उन्हें भी पीछे हटना पड़ा। उन 7-8 मिनटों में मेरी पूरी दुनिया उजड़ गई गुप्ता ने बताया कि आग लगने के बाद जो धमाके हो रहे थे, उनके बीच उम्मीद नाम की हर चीज खत्म हो गई। वे 7-8 मिनट मैंने अपनी जिंदगी की सबसे बड़ी लाचारी, मजबूरी और बेबसी में बिताए। मेरा मोबाइल जल गया, कपड़े जल गए और मेरी पत्नी बस के अंदर ही रह गई। मैं जिस हालत में था, उसी हालत में बाहर निकल आया। वहां कई लोग वीडियो बना रहे थे, लेकिन जब मैंने किसी से मोबाइल मांगा तो ज्यादातर लोग देने को तैयार नहीं हुए। आखिर एक युवक ने अपना मोबाइल दिया और पानी भी पिलाया। उस समय सदमे में किसी का नंबर तक याद नहीं आ रहा था। सिर्फ बेटे का नंबर याद था। मैंने उसे फोन कर सिर्फ इतना कहा कि बहुत बड़ा हादसा हो गया है। सुबह करीब साढ़े आठ बजे तक मैं इसी उम्मीद में बैठा रहा कि शायद कोई चमत्कार हो जाए, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। हादसे के बाद पुलिस, एम्बुलेंस और फायर ब्रिगेड भी देर से पहुंची। मेरे लिए सबसे भारी वे शुरुआती 7-8 मिनट रहे, जिन्होंने मेरी जिंदगी की दशा और दिशा दोनों बदल दीं। अब पूरा परिवार इस दुख से उबरने की कोशिश कर रहा है। आखिर समय से बड़ा कोई मरहम नहीं होता। हादसे से जुड़ी ये खबर भी पढ़ें… ऋषिकेश से इंदौर आ रही बस ट्रेलर से टकराई, 8 मौतें राजस्थान के दौसा जिले में दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे पर मंगलवार देर रात भीषण सड़क हादसा हो गया। ऋषिकेश से इंदौर जा रही स्लीपर बस आगे चल रहे ट्रेलर से टकरा गई। टक्कर इतनी जबरदस्त थी कि दोनों वाहनों में आग लग गई। पढ़िए पूरी खबर…

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