मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर बेंच ने 6 जुलाई को एक हैबियस कॉर्पस याचिका पर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। कोर्ट ने 14 वर्षीय बालिका की कस्टडी पॉक्सो मामले में आरोपी उसके पिता को सौंपने का आदेश दिया है। जस्टिस सुबोध अभ्यंकर और जस्टिस आलोक अवस्थी की बेंच ने नाबालिग की इच्छा, उसकी पढ़ाई और मामले की परिस्थितियों को देखते हुए यह आदेश दिया है। दरअसल, वर्ष 2020 में पति-पत्नी के बीच शुरू हुआ विवाद बाद में पॉक्सो केस तक पहुंच गया था। याचिकाकर्ता बालिका के पिता और उसकी बड़ी बहन थे। वर्ष 2021 में पत्नी की शिकायत पर पिता के खिलाफ पॉक्सो एक्ट और अन्य धाराओं में मामला दर्ज किया गया था। शिकायत में पत्नी ने अपनी छोटी बेटी के साथ यौन उत्पीड़न के आरोप लगाए थे। हालांकि, ट्रायल के दौरान बेटी ने अभियोजन पक्ष का समर्थन नहीं किया। बाद में वह अपने पिता के साथ रहने लगी थी। याचिकाकर्ताओं का आरोप था कि जिला बाल संरक्षण समिति ने बालिका को उनके घर से ले जाकर आश्रय गृह में रख दिया है, जिससे उसकी पढ़ाई प्रभावित हो रही है। वह 9वीं कक्षा की छात्रा है और आईआईटी की तैयारी भी कर रही है। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने बालिका, उसकी बड़ी बहन और मां से अलग-अलग बातचीत की। बालिका ने स्पष्ट रूप से कहा कि वह अपने पिता और बड़ी बहन के साथ रहना चाहती है। उसने यह भी कहा कि पिता ने कभी उसके साथ गलत हरकत नहीं की और वे पढ़ाई व अन्य जरूरतों का पूरा ध्यान रखते हैं। मैं पापा के साथ सुरक्षित हूं। बड़ी बहन बोली- मां ने दबाव में दिलवाए बयान
बड़ी बहन ने कोर्ट को बताया कि वह इंजीनियर है और पिता ने हमेशा हम दोनों बेटियों की देखभाल की है। मां ने वैवाहिक विवाद के कारण छोटी बहन पर दबाव बनाकर पिता के खिलाफ बयान दिलवाए थे। बालिका की इच्छा और सर्वोत्तम हित को दी प्राथमिकता कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि दोनों बेटियां समझदार, शिक्षित और अपने भविष्य को लेकर सजग हैं तथा अपने हित में निर्णय लेने में सक्षम हैं। ऐसे में बालिका की इच्छा और उसके सर्वोत्तम हित को देखते हुए उसकी कस्टडी पिता और बड़ी बहन को सौंपना उचित होगा। टीआई का नंबर भी उपलब्ध कराने के निर्देश कोर्ट ने निर्देश दिया कि बालिका को मोबाइल फोन उपलब्ध कराया जाए और संबंधित थाना प्रभारी (टीआई) का नंबर भी दिया जाए, ताकि किसी भी प्रकार की परेशानी होने पर वह सीधे पुलिस से संपर्क कर सके। साथ ही कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह आदेश केवल कस्टडी से संबंधित है। पॉक्सो केस की सुनवाई कर रही ट्रायल कोर्ट इस आदेश में की गई टिप्पणियों से प्रभावित नहीं होगी। इसके बाद हाईकोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए बालिका की कस्टडी उसके पिता और बड़ी बहन को सौंप दी। कोर्ट को पत्र देकर कहा- मेरे पिता बेगुनाह हैं अधिवक्ता माहेश्वरी के मुताबिक, पति-पत्नी वर्ष 2020 से अलग रह रहे थे। वर्ष 2021 में पारिवारिक विवाद के बीच मां ने पिता पर अपनी नाबालिग बेटी के साथ दुष्कर्म का आरोप लगाते हुए पॉक्सो एक्ट के तहत मामला दर्ज कराया था। आरोपों के बाद पिता को 51 दिन जेल में रहना पड़ा। बाद में उन्हें हाई कोर्ट से जमानत मिल गई। वर्ष 2025 में जब बेटी पॉक्सो कोर्ट में बयान दर्ज कराने पहुंची तो उसने कोर्ट को एक पत्र सौंपकर कहा कि उसके पिता निर्दोष हैं और उसने मां के दबाव में शिकायत की थी। कोर्ट में भी उसने स्पष्ट किया कि वह अपने पिता के साथ रहना चाहती है। बाल संरक्षण गृह भेजे जाने के बाद हाईकोर्ट पहुंचा मामला बाद में प्रशासनिक कार्रवाई के तहत बालिका को पिता के संरक्षण से हटाकर बाल संरक्षण गृह भेज दिया गया। पिता का आरोप था कि उन्हें उचित सुनवाई का अवसर दिए बिना यह कार्रवाई की गई। इसके बाद उन्होंने हाई कोर्ट में हैबियस कॉर्पस याचिका दायर की। सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने बालिका, उसकी बड़ी बहन, मां और पिता सहित सभी पक्षों से बातचीत की। कोर्ट ने बालिका की मानसिक स्थिति, शिक्षा, भविष्य, पारिवारिक जुड़ाव और उसकी स्पष्ट इच्छा को ध्यान में रखते हुए अंतिम फैसला सुनाया। यह खबर भी पढ़ें… पत्नी को मारने 620Km दूर से लाया कोबरा इंदौर के शिवानी हत्याकांड में जिला कोर्ट ने आरोपी पति अमितेष उर्फ शालू पटेरिया को उम्रकैद की सजा सुनाई। पत्नी की हत्या के लिए बैंक अफसर अमितेष ने साजिश रची थी। वह इंदौर से 620 किलोमीटर दूर राजस्थान के अलवर से ब्लैक डेजर्ट प्रजाति का कोबरा 30 हजार रुपए में खरीदकर लाया था। पूरी खबर यहां पढ़ें…
