अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के नेतृत्व को लेकर चल रहा विवाद एक बार फिर सामने आ गया है। चार महीने पहले जिस निर्मोही अणि अखाड़े ने निरंजनी अखाड़े के सचिव और अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत रविंद्र पुरी को मानने से इनकार कर दिया था, उसी निर्मोही अखाड़े ने अब उनके समर्थन का ऐलान कर दिया है। मंगलवार रात उज्जैन में हुई बैठक में निर्मोही अखाड़े ने आगामी नासिक और उज्जैन कुंभ में रविंद्र पुरी के नेतृत्व वाली अखाड़ा परिषद के साथ रहने का फैसला किया है। उज्जैन में हुई बैठक में बदला फैसला निर्मोही अणि अखाड़े में हुई बैठक की अध्यक्षता महंत रविंद्र पुरी ने की। बैठक में श्रीमहंत मदन मोहन दास, श्रीमहंत भगवान दास, श्रीमहंत सीताराम दास सहित अखाड़े के पंच मौजूद रहे। बैठक के बाद निर्मोही अखाड़े ने अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद को समर्थन देने और कुंभ मेलों में साथ रहने की घोषणा की। अखाड़ा परिषद में दो गुट सक्रिय अखाड़ा परिषद को लेकर लंबे समय से दो गुट सक्रिय हैं। एक गुट का नेतृत्व निरंजनी अखाड़े के सचिव महंत रविंद्र पुरी कर रहे हैं, जबकि दूसरा गुट महानिर्वाणी अखाड़े के सचिव रविंद्र पुरी को अध्यक्ष मानता है। दोनों पक्ष अपने साथ अधिक अखाड़ों के होने का दावा करते रहे हैं। रविंद्र पुरी बोले- अब रामदल और शंभू दल साथ महंत रविंद्र पुरी ने दावा किया कि उनके साथ जूना, आह्वान, अग्नि, निरंजनी, आनंद, पंच निर्मोही, निर्मल और बड़ा उदासीन (रघुमुनि) अखाड़ा है। उन्होंने कहा, “आज रामदल और शंभू दल एक हो गए हैं। हमारा प्रयास सभी सन्यासियों और वैष्णव संतों को एक मंच पर लाने का है।” विरोधी गुट पर निशाना साधते हुए उन्होंने कहा, “जब बरसात होती है तो मेंढक निकल ही आते हैं। असली अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद हमारी ही है।” निर्मोही अखाड़े ने क्या कहा निर्मोही अणि अखाड़े के राष्ट्रीय प्रवक्ता महंत सीताराम दास ने कहा कि अखाड़ा परिषद को लेकर भ्रम फैलाया जा रहा था। प्रयागराज कुंभ भी महंत रविंद्र पुरी के नेतृत्व में हुआ था। मंगलवार की बैठक में आठ अखाड़ों ने उन्हें समर्थन दिया और निर्मोही अखाड़ा भी उनके साथ आ गया। चार महीने पहले लिया था दूसरा फैसला 22 मार्च 2026 को महानिर्वाणी, अटल, निर्मोही, दिगंबर, निर्वाणी अणी, बड़ा उदासीन, नया उदासीन और निर्मल अखाड़े के संतों ने महानिर्वाणी अखाड़े के सचिव रविंद्र पुरी के नेतृत्व का समर्थन किया था। उस समय उन्होंने उनके नेतृत्व में कुंभ आयोजन करने की घोषणा की थी। अब उसी निर्मोही अखाड़े के निरंजनी अखाड़े के सचिव महंत रविंद्र पुरी के समर्थन में आने से अखाड़ा परिषद का विवाद फिर चर्चा में आ गया है। आगामी सिंहस्थ 2028 और नासिक कुंभ से पहले संतों के दोनों गुटों के बीच नेतृत्व को लेकर खींचतान जारी है। 2021 से चल रहा विवाद… हरिद्वार कुंभ 2021 के बाद अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष नरेंद्र गिरि की मौत के बाद नेतृत्व को लेकर खालीपन पैदा हुआ। इस पद पर सहमति नहीं बन पाई और यहीं से दो गुट बने। जूना और निरंजनी अखाड़े ने एक रवींद्र पुरी को अध्यक्ष माना, जबकि वैष्णव और बैरागी अखाड़ों ने दूसरे रवींद्र पुरी को अपना नेता स्वीकार कर लिया। यही विभाजन धीरे-धीरे स्थायी रूप लेता गया। दोनों गुट अपने-अपने स्तर पर फैसले लेते रहे और परिषद एकजुट रूप में सामने नहीं आ पाई। कुंभ से पहले ही क्यों बढ़ता है विवाद- अंदर की वजह कुंभ से पहले अखाड़ों के बीच नेतृत्व को लेकर विवाद इसलिए बढ़ता है क्योंकि इसी समय उनका प्रभाव और दृश्यता सबसे ज्यादा होती है। अध्यक्ष पद का मतलब सिर्फ संगठन का प्रमुख होना नहीं, बल्कि कुंभ में संत समाज का चेहरा होना भी है। इसी कारण अलग-अलग अखाड़े अपने प्रभाव को बढ़ाने और नेतृत्व हासिल करने की कोशिश करते हैं। यही प्रतिस्पर्धा कई बार गुटबाजी और टकराव में बदल जाती है।
