इंदौर नगर निगम के चर्चित नामांतरण घोटाला सामने आने के बाद अब जांच का सबसे बड़ा सवाल ‘नाम किसने बदला?’ से आगे बढ़कर ‘सिस्टम में लॉगिन किसने किया?’ पर अटक गया है। नवंबर 2025 से अप्रैल 2026 के बीच निगम के 356 संपत्ति कर खातों में बिना विधिवत आवेदन नामांतरण और स्वामित्व में बदलाव के मामले सामने आए। विभागीय जांच में अनियमितताओं की पुष्टि हुई, 350 से ज्यादा संपत्तियों की रजिस्ट्रियां खंगाली गईं, जिनमें 55 में विसंगतियां मिलीं। ऑनलाइन सिस्टम से छेड़छाड़ की तकनीकी जांच MP-CERT को सौंपी गई, लेकिन दो रिपोर्ट के बाद भी किसी एक व्यक्ति को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सका। अब जांच समिति ने साइबर FIR दर्ज कराकर पूरे डिजिटल नेटवर्क की गहराई से जांच कराने की सिफारिश की है। 356 खातों से जांच, रजिस्ट्रियों तक पहुंचा मामला नामांतरण घोटाले की शुरुआती जांच में 356 संपत्ति कर खातों में बिना विधिवत आवेदन नामांतरण और स्वामित्व में बदलाव के मामले सामने आए थे। निगम की तीन अपर आयुक्तों की समिति ने जांच की और अनियमितताओं की पुष्टि की। इसके बाद संबंधित निगम कर्मचारियों और आउटसोर्स कर्मियों पर कार्रवाई की गई। मामला केवल निगम के रिकॉर्ड तक सीमित न रहे, इसलिए नामांतरण के आधार पर 350 से अधिक संपत्तियों की रजिस्ट्रियां भी जांच के लिए खंगाली गईं। सीनियर रजिस्ट्रार अमरीश नायडू के मुताबिक इनमें से 55 रजिस्ट्रियों में विसंगतियां सामने आईं, जबकि कुछ रजिस्ट्रियां पूरी तरह सही भी मिलीं। नामांतरण के बाद किसी ने बेची, किसी ने लीज पर दी संपत्ति जांच में कुछ ऐसे मामले भी सामने आए जिनमें निगम रिकॉर्ड में नामांतरण होने के बाद संबंधित संपत्तियों की नई रजिस्ट्रियां हुईं। कुछ संपत्तियां आगे बेची गईं, कुछ लीज पर दी गईं और कुछ मामलों में संपत्ति के आधार पर लोन लेने की जानकारी भी सामने आई। यहीं से जांच का दायरा और बढ़ गया। अब यह पता लगाने की कोशिश है कि ऑनलाइन नामांतरण में किए गए बदलावों का इस्तेमाल बाद में संपत्ति के वास्तविक लेन-देन में तो नहीं किया गया और इससे किसी व्यक्ति को आर्थिक फायदा मिला या नहीं। दो हिस्सों में हुई जांच, डिजिटल पहलू MP-CERT को सौंपा नामांतरण घोटाले की जांच को मुख्य रूप से दो हिस्सों में बांटा गया था। एक ओऱ् संपत्तियों के नामांतरण और राजस्व संबंधी रिकॉर्ड की जांच की गई, जबकि दूसरी ओर ऑनलाइन सिस्टम में हुए बदलावों के तकनीकी पहलू की जांच की गई। तकनीकी जांच में कई जटिल बिंदु सामने आए। इनमें फायरवॉल, IP एड्रेस, सिस्टम लॉग और लॉगिन गतिविधियों की जांच शामिल थी। मामला सामान्य विभागीय जांच से अलग होने के कारण इसे प्रदेश की साइबर सिक्योरिटी टीम MP-CERT (Madhya Pradesh Computer Emergency Response Team) को भेजा गया। MP-CERT ने इस मामले में दो रिपोर्ट प्रस्तुत कीं। दोनों रिपोर्ट का निष्कर्ष यह रहा कि उपलब्ध डिजिटल रिकॉर्ड से किसी एक व्यक्ति को सीधे तौर पर जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। 356 खातों में से 55 रजिस्ट्रियों में गड़बड़ियां नामांतरण घोटाले की शुरुआती जांच में निगम के 356 संपत्ति कर खातों में बिना विधिवत आवेदन नामांतरण और स्वामित्व में बदलाव की शिकायतों की पड़ताल की गई थी। निगम की तीन अपर आयुक्तों की समिति ने जांच में अनियमितताओं की पुष्टि की। इसके बाद ऑउटसोर्स कर्मचारियों और निगम कर्मचारियों पर कार्रवाई की गई लेकिन जांच आगे बढ़ी तो मामला केवल संपत्ति कर रिकॉर्ड में नाम बदलने तक सीमित नहीं रहा। निगम ने पारदर्शिता के लिए नामांतरण के आधार पर रेंडम तरीके से 350 से अधिक संपत्तियों की रजिस्ट्रियां भी खंगालने की प्रक्रिया शुरू की। इसके लिए पत्र के साथ इसकी पूरी जानकारी रजिस्ट्रार कार्यालय को जांच के लिए दी गई। नामांतरण के बाद संपत्तियां बिकीं, लीज हुईं और लोन भी लिया गया जांच के दौरान कुछ ऐसे मामले सामने आए जिनमें निगम के रिकॉर्ड में नामांतरण होने के बाद संबंधित संपत्तियों की नई रजिस्ट्री हुई। कुछ संपत्तियों को आगे बेचा गया, कुछ को लीज पर दिया गया, जबकि कुछ मामलों में संपत्ति के आधार पर लोन लेने की जानकारी भी सामने आई। इससे जांच का दायरा अब इस सवाल तक पहुंच गया है कि क्या ऑनलाइन नामांतरण में हुई गड़बड़ी का इस्तेमाल बाद में संपत्ति के वास्तविक कारोबार में किया गया? यदि ऐसा हुआ है तो यह पता लगाना महत्वपूर्ण होगा कि नामांतरण में बदलाव से किसे फायदा मिला। यह पहला मामला नहीं… निगम की साख पर फिर सवाल नामांतरण घोटाले ने एक बार फिर इंदौर नगर निगम की कार्यप्रणाली और निगरानी व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं। इससे पहले निगम में 100 करोड़ रुपए से अधिक के फर्जी बिल कांड का मामला सामने आ चुका है। अब संपत्ति कर जैसे संवेदनशील रिकॉर्ड में खातों में बदलाव की पुष्टि हुई है। ऐसे में सवाल सिर्फ यह नहीं है कि किस कर्मचारी ने क्या किया, बल्कि यह भी है कि इतने बड़े स्तर पर बदलाव होते रहे और निगम का सिस्टम उन्हें समय रहते पकड़ क्यों नहीं पाया? ये खबर भी पढ़ें… 103.42 करोड़ के घोटाले में 20 हजार पन्नों का चालान इंदौर नगर निगम के 103.42 करोड़ रुपए के फर्जी बिल घोटाले में प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने बड़ी कार्रवाई की है। इंदौर सब-जोनल कार्यालय ने सोमवार को 32 आरोपियों के खिलाफ 20 हजार से अधिक पन्नों का अभियोजन शिकायत पत्र (प्रॉसिक्यूशन कंप्लेंट) विशेष पीएमएलए कोर्ट में पेश किया है।पूरी खबर पढ़ें
