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दुर्ग में 3 महीने में सुसाइड के 20 केस:इनमें कांग्रेस प्रवक्ता की भतीजी, ग्राफिक्स डिजाइनर भी शामिल, पढ़ाई, आर्थिक तंगी, पारिवारिक कलह बने कारण

छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले में पिछले करीब 3 महीनों में 20 लोगों ने आत्महत्या की है। अप्रैल के पहले 8 दिनों में ही सुसाइड के 7 मामले सामने आ चुके हैं। इन घटनाओं में चौथी कक्षा में पढ़ने वाली 10 साल की बच्ची से लेकर 70 साल तक के बुजुर्ग शामिल हैं। इन आत्महत्या के मामलों के पीछे पढ़ाई का दबाव, आर्थिक तंगी, गंभीर बीमारी और पारिवारिक कलह जैसे कारण सामने आए हैं। मार्च और अप्रैल के दौरान ही ऐसे कई मामले दर्ज किए गए हैं। उदाहरण के तौर पर, दुर्ग में एक 16 साल की छात्रा ने ‘अच्छी बेटी नहीं बन सकी’ लिखकर आत्महत्या कर ली। वहीं, जामुल क्षेत्र में चौथी कक्षा की 9 साल की बच्ची ने बड़े भाई की डांट से आहत होकर अपनी जान दे दी। अप्रैल महीने का सातवां आत्महत्या का मामला मंगलवार (7 अप्रैल) को सामने आया। इस घटना में एक विवाहित महिला ने अपने ही घर में आग लगाकर जान दे दी। महिला की पहचान किरण पटेल (28) के रूप में हुई है। मामला नंदिनी थाना क्षेत्र का है। जानकारी के अनुसार महिला ने मंगलवार सुबह अपने घर में खुद को आग के हवाले कर दिया। घटना के समय परिवार के सदस्य घर पर ही मौजूद थे, लेकिन जब तक वे स्थिति को समझ पाते और आग पर काबू पाने की कोशिश करते, तब तक आग ने विकराल रूप ले लिया था। महिला की मौके पर ही जलकर मौत हो गई। घटना की सूचना मिलते ही नंदिनी थाना पुलिस मौके पर पहुंची और शव को पोस्टमॉर्टम के लिए भेज दिया गया। शुरुआती जांच में इसे आत्महत्या का मामला माना जा रहा है। फिलहाल पुलिस पूरे मामले की जांच कर रही है और आत्महत्या के कारणों का पता लगाने का प्रयास जारी है। जानिए अलग-अलग कारणों से सुसाइड करने वालों की कहानी:- केस-1 कांग्रेस प्रवक्ता की भतीजी ने लगाई फांसी 5 जनवरी 2026 को दुर्ग के मोहन नगर थाना क्षेत्र स्थित शंकर नगर में 16 साल की निष्ठा गोस्वामी ने घर में फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली। वह सेक्टर-10 के श्री शंकरा स्कूल में 11वीं की छात्रा थी। घटना के समय घर पर केवल दादी मौजूद थीं, जबकि माता-पिता बाहर गए थे। कमरे का दरवाजा तोड़ने पर छात्रा फंदे पर लटकती मिली। पुलिस को सुसाइड नोट मिला, जिसमें उसने मम्मी-पापा से माफी मांगी और खुद को अच्छी बेटी नहीं बता पाई। पिता सरकारी वकील और मां सरकारी शिक्षिका हैं। केस- 2 ग्राफिक्स डिजाइनर ने की खुदकुशी 28 जनवरी 2026 को जामुल थाना क्षेत्र में भोज नारायण (36) ने अपने घर में फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली। वह एक निजी कॉलेज में सीनियर ग्राफिक्स डिजाइनर के पद पर कार्यरत था। मूल रूप से वह गरियाबंद जिले के राजिम का निवासी था और भिलाई में किराए के मकान में रहता था। भोज नारायण शादीशुदा था। जानकारी के अनुसार, उसका एक महिला प्यून के साथ प्रेम संबंध था, जो खुद भी शादीशुदा थी। इस संबंध की जानकारी उसकी पत्नी को थी, जिसका वह लगातार विरोध करती थी। कुछ दिनों पहले भोज नारायण घर से लापता हो गया था, जिसके बाद उसकी पत्नी ने थाने में गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज कराई थी। जांच के दौरान उसके इस प्रेम संबंध का खुलासा हुआ। यह भी सामने आया कि वह अपनी महिला मित्र को बाहर लेकर गया था। बाद में जब वह उसे छोड़कर घर लौटा, तो पति-पत्नी के बीच विवाद शुरू हो गया। इसके बाद उसने यह आत्मघाती कदम उठा लिया। केस-3 भाई की डांट से बहन ने लगाई फांसी 19 मार्च को जामुल थाना क्षेत्र के गणेश नगर में 10 साल गुरप्रीत कौर उर्फ खुशी ने आत्महत्या कर ली। वह चौथी कक्षा की छात्रा थी और स्वामी आत्मानंद स्कूल में पढ़ती थी। घटना के समय उसके माता-पिता घर से बाहर थे। जानकारी के अनुसार, भाई की डांट से नाराज होकर बच्ची अपने कमरे में चली गई और चुन्नी से पंखे पर फंदा लगाकर फांसी लगा ली। परिजनों ने उसे तत्काल अस्पताल पहुंचाया, जहां डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया। घटना की सूचना मिलने पर पुलिस ने मर्ग कायम कर जांच शुरू कर दी है और परिजनों से पूछताछ की जा रही है। केस-4 इंस्टा रील बनाने पर पति से विवाद में फांसी लगाई 2 फरवरी 2026 को सोशल मीडिया पर रील बनाने को लेकर पति-पत्नी के बीच हुए विवाद के बाद पत्नी ने आत्महत्या कर ली। दंपती में आए दिन विवाद होता था, जिससे नाराज होकर पत्नी ने घर पर फांसी लगाकर खुदकुशी कर ली। मामला छावनी थाना क्षेत्र का है। जानकारी के मुताबिक, महिला का नाम अंजली साव (35) है, जो भिलाई क्षेत्र की रहने वाली थी। अंजली इंस्टाग्राम पर एक्टिव रहती थी और रील बनाती थी। लेकिन यह उसके पति को पसंद नहीं था। ऐसे में दोनों में आए दिन झगड़ा होता था। बुधवार को जब बच्चे ट्यूशन गए तो उसने जान दे दी। इनके अलावा ये भी रहे आत्महत्या के चर्चित मामले पुलिस बोली- बच्चों को अनावश्यक प्रेशर न दें सीएसपी सत्यप्रकाश तिवारी ने कहा कि आत्महत्या की घटनाओं को रोकने के लिए पुलिस लगातार सामाजिक स्तर पर और शैक्षणिक संस्थानों में जाकर जागरूकता अभियान चला रही है। इस दौरान छात्रों की काउंसलिंग की जा रही है और उन्हें समझाया भी जा रहा है। साथ ही, अभिभावकों को भी जागरूक किया जा रहा है। उन्होंने बताया कि पुलिस की महिला रक्षा टीम, थाना प्रभारियों और वरिष्ठ अधिकारियों की ओर से अलग-अलग शैक्षणिक संस्थानों में जाकर बैठकें ली जा रही हैं, जहां छात्रों और उनके परिजनों को गाइडेंस दिया जा रहा है। पेरेंट्स को खासतौर पर यह समझाया जा रहा है कि वे बच्चों पर अनावश्यक पढ़ाई का दबाव न डालें। सीएसपी ने कहा कि बच्चों को केवल पढ़ाई तक सीमित न रखें, बल्कि उनकी रुचियों को पहचानते हुए उन्हें अन्य गतिविधियों में भी आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करें। उन्हें सही दिशा में मार्गदर्शन देना जरूरी है। आत्महत्या करना कोई हल नहीं बीमारी और आर्थिक तंगी से जुड़े मामलों पर सीएसपी सत्यप्रकाश तिवारी ने कहा कि इस तरह की समस्याएं अधिकतर व्यक्तिगत परिस्थितियों से जुड़ी होती हैं, जिनके चलते लोग आत्महत्या जैसा कदम उठा लेते हैं। कई मामलों में यह मानसिकता भी सामने आई है कि व्यक्ति खुद को परिवार पर बोझ समझने लगता है और यह सोचता है कि उपलब्ध संसाधन परिवार और बच्चों के लिए ही बचाए जाने चाहिए। हाल के दिनों में ऐसे 2-3 मामले भी सामने आए हैं। उन्होंने बताया कि पुलिस की ओर से परिजनों को समझाइश दी जा रही है कि ऐसी परिस्थितियों में घबराने या गलत कदम उठाने के बजाय उपलब्ध विकल्पों की जानकारी लेना जरूरी है। वर्तमान में आर्थिक और चिकित्सीय सहायता के कई साधन मौजूद हैं। सीएसपी ने कहा कि सरकार की ओर से चिकित्सा सुविधाएं और आर्थिक सहायता पर्याप्त रूप से उपलब्ध कराई जा रही हैं। राज्य शासन और स्वास्थ्य विभाग के माध्यम से गंभीर बीमारियों के इलाज के लिए लगभग 2.5 लाख से लेकर 10 लाख रुपए तक की सहायता दी जाती है। अगर लोग सही प्लेटफॉर्म पर जानकारी लें और आवेदन करें, तो उन्हें इसका लाभ मिल सकता है और इस प्रकार की घटनाओं को रोका जा सकता है। सुसाइड में एकेडमिक प्रेशर एक बड़ा रीजन मनोवैज्ञानिक डॉ. शमा हमदानी ने कहा कि छात्रों में आत्महत्या के मामलों के पीछे अकादमिक दबाव एक बड़ा कारण होता है। कई छात्रों को स्कूल और कॉलेज में बुलिंग का सामना करना पड़ता है। इसके अलावा परिवार में होने वाले विवाद, माता-पिता के बीच झगड़े और मनमुटाव भी बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर असर डालते हैं। उन्होंने बताया कि परिवार के सदस्य भी अक्सर बच्चों पर पढ़ाई को लेकर दबाव डालते हैं, जैसे दूसरे बच्चे अच्छा कर रहे हैं, तुम क्यों नहीं?” जिससे बच्चों पर अतिरिक्त मानसिक बोझ बढ़ता है। आज के समय में प्रतिस्पर्धा भी काफी बढ़ गई है, जो तनाव का एक प्रमुख कारण है। मन की बात शेयर नहीं करने से घुटने लगते हैं बच्चे डॉ. शमा हमदानी ने कहा कि आजकल बच्चे अपनी मन की बातें खुलकर साझा नहीं कर पाते हैं। वे सोशल मीडिया पर तो जुड़े रहते हैं, लेकिन अपनी भावनाएं किसी व्यक्ति के साथ साझा नहीं कर पाते। इससे एक बड़ा कम्युनिकेशन गैप पैदा हो गया है। बच्चे अंदर ही अंदर घुटते रहते हैं और अपनी बात न कह पाने के कारण उनका मन हल्का नहीं हो पाता, जो आत्महत्या जैसे कदम का कारण बन सकता है। उन्होंने कहा कि ऐसे मामलों की रोकथाम के लिए सबसे पहले इस कम्युनिकेशन गैप को खत्म करना जरूरी है। अभिभावकों को समझना चाहिए कि हर बच्चा अलग और विशिष्ट होता है, और हर बच्चे में कोई न कोई क्षमता जरूर होती है। डॉ. हमदानी ने कहा कि बच्चों पर अधिक अंक लाने या आईआईटी, जेईई, नीट जैसे प्रतियोगी परीक्षाओं को पास करने का अत्यधिक दबाव नहीं डालना चाहिए। ऐसा करने से बच्चे की वास्तविक क्षमता उभर नहीं पाती और वह मानसिक दबाव में आ जाता है। इसलिए जरूरी है कि बच्चों को उनकी रुचि और क्षमता के अनुसार आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया जाए।

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