मुरैना जिले की पोरसा जनपद पंचायत एक बार फिर सवालों के घेरे में है। यहां मनरेगा और अन्य ग्रामीण विकास कार्यों के नाम पर करोड़ों रुपए के भुगतान की तैयारी हो चुकी है, लेकिन पंचायतों में जमीनी हकीकत सरकारी रिकॉर्ड से बिल्कुल अलग नजर आ रही है। दस्तावेजों में करोड़ों रुपए के निर्माण कार्य पूरे बताए गए हैं, वहीं कई स्थानों पर काम या तो अधूरा मिला या फिर उसका अस्तित्व ही दिखाई नहीं दिया। मामला पोरसा जनपद की तीन पंचायतों कुरैठा, रायपुर और धोर्रा से जुड़ा है। इन पंचायतों में कुल 5 करोड़ 43 लाख 76 हजार 633 रुपए के भुगतान की प्रक्रिया अंतिम चरण में बताई जा रही है। लेखपाल, उपलेखपाल और अन्य स्तरों से फाइलें आगे बढ़ चुकी हैं। अब केवल जनपद सीईओ के डिजिटल हस्ताक्षर के बाद भुगतान होना शेष है। भास्कर टीम ने इस मामले की पड़ताल की तो सामने आया कि जिन कार्यों का मूल्यांकन, सत्यापन और मस्टर रोल स्वीकृत किए जा चुके हैं, उनमें से कई कार्य धरातल पर है ही नहीं। इसके साथ ही बड़ी संख्या में संदिग्ध जॉब कार्ड, फर्जी हाजिरी और निरीक्षण प्रक्रिया पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। पढ़िए पूरी रिपोर्ट… कुरैठा पंचायत: 2.47 करोड़ के भुगतान से पहले सवाल करीब 8 हजार आबादी वाली कुरैठा पंचायत में विभिन्न विकास कार्यों के लिए 2 करोड़ 47 लाख 70 हजार 930 रुपए के भुगतान की तैयारी है। पंचायत में लगभग 20 लाख रुपए की लागत से बनाए गए रपटे की उपयोगिता पर ग्रामीण सवाल उठा रहे हैं। उनका कहना है कि इस मार्ग का उपयोग सीमित है और अधिकांश लोग आज भी वैकल्पिक कच्चे रास्ते से ही आवागमन करते हैं। सबसे गंभीर मामला वाटरशेड योजना के तहत बनाए गए स्टॉप डेमों का सामने आया है। निरीक्षण के दौरान एक ही कच्ची संरचना के सहारे चार अलग-अलग स्टॉप डेम दर्शाए जाने की बात सामने आई। प्रत्येक स्टॉप डेम की लागत करीब 14 लाख रुपए बताई गई है। यदि जांच में यह तथ्य सही पाया जाता है तो एक ही संरचना को अलग-अलग कार्य बताकर भुगतान की प्रक्रिया तैयार किए जाने का मामला बन सकता है। पंचायत में कुल 1160 सक्रिय जॉब कार्ड दर्ज हैं। स्थानीय स्तर पर मिली जानकारी के अनुसार इनमें से करीब 700 जॉब कार्ड संदिग्ध बताए जा रहे हैं। इन कार्डधारकों के पते उत्तर प्रदेश, राजस्थान, झांसी, ग्वालियर और भिंड सहित अन्य क्षेत्रों के बताए जा रहे हैं। भास्कर टीम जब कार्यस्थलों पर पहुंची तो जिन स्थानों पर मजदूरों की उपस्थिति दर्ज थी, वहां मजदूर काम करते नहीं मिले। इससे मस्टर रोल और वास्तविक कार्य के बीच अंतर की आशंका और मजबूत होती है। रायपुर पंचायत: कागजों में विकास, जमीन पर सवाल करीब 8600 आबादी वाली रायपुर पंचायत में 2 करोड़ 37 लाख 31 हजार 703 रुपए के भुगतान की तैयारी है। यहां स्टॉप डेम और खेत तालाबों के नाम पर कराए गए कार्यों की पड़ताल में कई स्थानों पर केवल खानापूर्ति जैसी स्थिति दिखाई दी। कुछ जगहों पर मामूली मिट्टी कार्य मिला, जबकि कई स्थानों पर निर्माण कार्य स्पष्ट रूप से नजर नहीं आया। पंचायत में करीब 1400 सक्रिय जॉब कार्ड दर्ज हैं। इनमें से लगभग 800 जॉब कार्ड संदिग्ध बताए जा रहे हैं। स्थानीय लोगों का दावा है कि इनमें राजस्थान, उत्तर प्रदेश, जौरा, सबलगढ़, भिंड और ग्वालियर क्षेत्र के लोगों के नाम शामिल हैं। देखिए चार तस्वीरें… विवादों में रहे चुके हैं रायपुर पंचायत के जीआरएस रायपुर पंचायत के जीआरएस उमेश उपाध्याय पहले ही विवादों में रह चुके हैं। कलेक्टर द्वारा उन्हें निलंबित किया जा चुका है और उनके खिलाफ एफआईआर के निर्देश भी दिए गए हैं। आरोप है कि उन्होंने एक ऐसा क्लोन एप तैयार किया था जो सरकारी एमएमएस एप जैसा दिखाई देता था। इसी माध्यम से कथित तौर पर दूर-दराज के लोगों की उपस्थिति दर्ज कराई जाती थी। सवाल यह है कि यदि क्लोन एप का मामला सामने आ चुका है तो उससे जुड़े अन्य मामलों की जांच अभी तक पूरी क्यों नहीं हुई। धोर्रा पंचायत: 58 लाख के भुगतान पर सवाल धोर्रा पंचायत में करीब 58 लाख 74 हजार रुपए के भुगतान की तैयारी है। यहां भी स्टॉप डेम और खेत तालाबों के नाम पर किए गए कार्यों की वास्तविक स्थिति को लेकर सवाल उठ रहे हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि जिन कार्यों को रिकॉर्ड में दर्शाया गया है, उनका अधिकांश हिस्सा जमीन पर दिखाई नहीं देता। कई स्थानों पर केवल प्रारंभिक गतिविधियां नजर आईं, जबकि दस्तावेजों में कार्यों को आगे की स्थिति में दर्शाया गया है। पंचायत में कुल 593 जॉब कार्ड सक्रिय बताए गए हैं। इनमें से करीब 200 जॉब कार्ड संदिग्ध बताए जा रहे हैं। आरोप है कि कई बाहरी लोगों के नाम पर उपस्थिति दर्ज कर भुगतान की प्रक्रिया बनाई गई। सबसे बड़ा सवाल: सत्यापन हुआ कैसे? तीनों पंचायतों में एक समान बात सामने आती है। जिन कार्यों को लेकर सवाल उठ रहे हैं, उनका मूल्यांकन और सत्यापन पहले ही किया जा चुका है। यदि कार्य मौके पर नहीं हैं या अधूरे हैं, तो फिर तकनीकी अमले और सत्यापन अधिकारियों ने किस आधार पर रिपोर्ट तैयार की? यही सवाल पूरी भुगतान प्रक्रिया को कटघरे में खड़ा कर रहा है। क्योंकि करोड़ों रुपए के भुगतान से पहले भौतिक सत्यापन सबसे महत्वपूर्ण प्रक्रिया मानी जाती है।
