Homeमध्यप्रदेश"जब पोस्टर में मेरी फोटो लगी तो मम्मी नहीं रही":मां के इलाज...

“जब पोस्टर में मेरी फोटो लगी तो मम्मी नहीं रही”:मां के इलाज में कोचिंग की कमाई लगाई, अब टॉपर पोस्टर देखकर दर्द महसूस करती है

“जब मैं रात के 3 बजे तक पढ़ाई करती थी, तब मम्मी उठकर डांटती थीं और कहती थीं कि अब सो जाओ… आज जब कॉलेज के टॉपर पोस्टर में मेरी फोटो लगी है, तो उसे देखने के लिए मेरी मम्मी नहीं हैं।” यह कहते हुए BCA टॉपर महिमा वाजपेई की आंखें नम हो गईं। एक तरफ बेटी की मेहनत की सफलता है, तो दूसरी तरफ मां को खोने का दर्द। जिस मां के सपनों को पूरा करने के लिए महिमा ने दिन-रात मेहनत की, वही मां आज बेटी की कामयाबी देखने के लिए दुनिया में नहीं है। महिमा की मां को बचाने के लिए परिवार ने गहने बेचे, रिश्तेदारों से कर्ज लिया, लेकिन जिंदगी नहीं बचा सके। अब महिमा के सामने आगे की पढ़ाई और परिवार को संभालने की चुनौती है। परिवार का कहना है कि डॉक्टर द्वारा इलाज में लापरवाही बरतने के कारण उनकी जान चली गई। पुलिस ने भी मामले को जांच में लिया है। चांदामेटा के छोटे से घर में बड़े सपने परासिया से करीब 4 किलोमीटर दूर चांदामेटा निवासी उपेंद्र वाजपेई ड्राइवर हैं। परिवार में पत्नी कामना वाजपेई और दो बेटियां महिमा और 9 वर्षीय अवनी हैं। उपेंद्र कभी गाड़ी चलाकर तो कभी पत्नी सिलाई और पापड़ बनाकर परिवार का खर्च चलाते थे। बड़ी बेटी महिमा शुरू से पढ़ाई में होनहार रही। उसने 12वीं में भी स्कूल की प्रवीण्य सूची में स्थान बनाया था। BCA अंतिम वर्ष की पढ़ाई के दौरान भी महिमा लगातार मेहनत कर रही थी। उसका सपना था कि आगे MBA की पढ़ाई कर परिवार का नाम रोशन करे। परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत नहीं थी, लेकिन महिमा की आंखों में बड़े सपने थे। इसी बीच परिवार पर ऐसा संकट आया, जिसने सबकुछ बदल दिया। दांत दर्द के इलाज से शुरू हुआ सफर, कैंसर तक पहुंचा मामला परिवार के अनुसार, साल 2025 में महिमा की मां कामना वाजपेई के दांत में दर्द हुआ। इलाज के लिए वह चांदामेटा स्थित संजीवनी क्लीनिक संचालक डॉक्टर अंकुर बेलवंशी के पास गईं। परिवार का आरोप है कि डॉक्टर ने करीब डेढ़ से दो महीने तक इलाज चलने और हर सप्ताह इंजेक्शन लगाने की बात कही। इसके बाद इलाज शुरू हुआ। उपेंद्र के अनुसार, प्रत्येक इंजेक्शन के लिए करीब 600 रुपए लिए जाते थे, लेकिन उन्हें न तो इंजेक्शन का नाम बताया गया और न ही इलाज की कोई पर्ची दी गई। परिवार का कहना है कि क्लीनिक के सामने स्थित मेडिकल स्टोर से फोन पर इंजेक्शन मंगवाकर लगाए जाते थे। 5-6 इंजेक्शन के बाद बिगड़ी हालत, मुंह में हुए छाले परिवार के मुताबिक, 5-6 इंजेक्शन लगने के बाद कामना के मुंह में अचानक छाले हो गए। हालत इतनी बिगड़ गई कि खाना-पीना तक बंद हो गया। जब उन्होंने डॉक्टर को इसकी जानकारी दी तो कुछ दवाइयां देकर मामला टाल दिया गया। हालत ज्यादा बिगड़ने पर छिंदवाड़ा के डॉक्टर सुधीर शुक्ला को दिखाया गया। परिवार के अनुसार, डॉक्टर सुधीर शुक्ला ने जांच के बाद कैंसर की संभावना जताई और तत्काल जबलपुर या नागपुर ले जाने की सलाह दी। परिचितों की कमी के चलते परिवार कामना को भोपाल के जवाहरलाल नेहरू कैंसर अस्पताल लेकर गया। परिवार के मुताबिक, जांच रिपोर्ट में 18 नवंबर 2025 को सेकंड स्टेज कैंसर की पुष्टि हुई। इलाज के लिए बेचे गहने, करीब 7 लाख रुपए का कर्ज भोपाल में करीब दो महीने तक कामना का इलाज चला। परिवार ने इलाज के लिए पत्नी का मंगलसूत्र, बेटियों के कान के आभूषण और पैर की पायल तक बेच दी। रिश्तेदारों से उधार लेकर इलाज जारी रखा गया, लेकिन धीरे-धीरे आर्थिक स्थिति जवाब देने लगी। परिवार के मुताबिक, करीब 11 महीने चले इलाज में उस पर लगभग 7 लाख रुपए का कर्ज हो गया। इसके बाद कामना को वापस छिंदवाड़ा जिला अस्पताल लाया गया, जहां 19 मई को भर्ती कराया गया। 28 मई को उन्होंने अंतिम सांस ली। मां के इलाज में बेटी ने लगा दी कोचिंग से कमाई महिमा छोटे बच्चों को पढ़ाकर अपनी पढ़ाई और आगे की जरूरतों के लिए पैसे जमा करती थी। मां की बीमारी के बाद उसने कोचिंग से कमाए पैसे भी उनके इलाज में लगा दिए। मां को बचाने के लिए परिवार ने अपनी क्षमता से ज्यादा कोशिश की, लेकिन लाख कोशिशों के बाद भी कामना को नहीं बचाया जा सका। महिमा के लिए मां का जाना सिर्फ परिवार के एक सदस्य को खोना नहीं था। जिस मां को वह अपनी मेहनत का परिणाम दिखाना चाहती थी, वही उसकी सबसे बड़ी कामयाबी के समय उसके साथ नहीं थी। मां की 13वीं के दिन दी BCA की परीक्षा मां की 13वीं के दिन ही महिमा ने BCA की परीक्षा दी। एक तरफ मां के जाने का दुख था, दूसरी तरफ परीक्षा और भविष्य की चिंता। आर्थिक संकट के बीच भी उसने पढ़ाई नहीं छोड़ी। नतीजा आया तो महिमा ने कॉलेज में शानदार प्रदर्शन किया। उसका फोटो कॉलेज के टॉपर पोस्टर में लगाया गया। यही पोस्टर अब महिमा के लिए खुशी और दर्द दोनों का कारण है। वह कहती है कि मां रात 3 बजे तक पढ़ने पर उसे सोने के लिए डांटती थीं। आज जब उसकी मेहनत का परिणाम सामने है और कॉलेज के टॉपर पोस्टर में उसकी तस्वीर लगी है, तो उसे देखने के लिए मां नहीं हैं। महिमा का सपना अब भी आगे पढ़ाई करने का है, लेकिन परिवार की आर्थिक स्थिति उसके सामने बड़ी चुनौती बनकर खड़ी है। प्लेसमेंट मिला, फीस बकाया होने से छूटा नौकरी का मौका महिमा का चयन विप्रो कंपनी में हो चुका था। यह परिवार के लिए आर्थिक स्थिति बदलने का मौका हो सकता था, लेकिन आर्थिक संकट और स्कूल-कॉलेज की बकाया राशि ने उसका यह मौका भी छीन लिया। परिवार के मुताबिक, बकाया फीस के कारण महिमा को मार्कशीट नहीं मिल सकी। इसी वजह से वह नौकरी का मौका हासिल नहीं कर पाई। एक तरफ मां के इलाज के लिए परिवार पर कर्ज है, दूसरी तरफ नौकरी हाथ से निकल गई। महिमा की छोटी बहन अवनी की स्थिति भी परिवार की आर्थिक परेशानी बताती है। परिवार का कहना है कि स्कूल ड्रेस नहीं होने के कारण 9 वर्षीय अवनी को स्कूल से वापस भेज दिया गया। डॉक्टर पर लापरवाही के आरोप उपेंद्र वाजपेई ने डॉक्टर अंकुर बेलवंशी पर इलाज में लापरवाही के आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि यदि समय रहते सही इलाज की सलाह दी जाती तो शायद उनकी पत्नी की जान बच सकती थी। परिवार ने इस मामले की शिकायत पुलिस से की, लेकिन कार्रवाई नहीं होने का आरोप लगाया। इसके बाद मुख्यमंत्री हेल्पलाइन में भी शिकायत की गई। परिवार का कहना है कि मुख्यमंत्री मोहन यादव के छिंदवाड़ा दौरे के दौरान उन्होंने उनसे मुलाकात की थी। परिवार के मुताबिक, उस दौरान मामले की जांच और एक लाख रुपए आर्थिक सहायता की बात कही गई थी, लेकिन अब तक सहायता राशि नहीं मिली है।
क्लीनिक बोर्ड को लेकर भी सवाल परिवार ने क्लीनिक के पुराने बोर्ड का हवाला देते हुए आरोप लगाया कि वहां पहले पेट दर्द, पीलिया, सर्दी-खांसी सहित कई बीमारियों के इलाज का उल्लेख था। परिवार का कहना है कि शिकायत के बाद अब क्लीनिक पर सिर्फ दांत से संबंधित इलाज का उल्लेख किया गया है। इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। मामले में जांच के बाद ही स्थिति स्पष्ट होगी। पुलिस बोली- जांच के बाद होगी कार्रवाई थाना प्रभारी ने बताया कि मामले की जानकारी है। पूरे प्रकरण की जांच की जा रही है। जांच में सामने आने वाले तथ्यों के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी। फिलहाल उपेंद्र वाजपेई का परिवार न्याय की उम्मीद लगाए बैठा है। जिस घर में कभी मां बेटी को रात में पढ़ाई से रोककर सोने के लिए कहती थी, उसी घर में अब उसकी तस्वीर और यादें रह गई हैं। महिमा ने मां के सपने के लिए पढ़ाई की, मां के इलाज के लिए अपनी कमाई लगा दी और मां के जाने के बाद भी परीक्षा दी। आज वह BCA की टॉपर है, लेकिन जिस दिन उसकी तस्वीर टॉपर पोस्टर में लगी, उस तस्वीर को देखकर खुश होने वाली मां उसके साथ नहीं थी। अब महिमा आगे पढ़ना चाहती है, नौकरी करना चाहती है और परिवार को संभालना चाहती है। लेकिन मां के इलाज से आया कर्ज, छूटी नौकरी और घर की आर्थिक स्थिति उसके इन सपनों के सामने सबसे बड़ी चुनौती है। मुख्यमंत्री से मुलाकात कर शिकायत, न्याय की गुहार लगाई 7 अगस्त को छिंदवाड़ा पहुंचे मुख्यमंत्री मोहन यादव से मिलने पीड़ित परिवार भी पहुंचा। परिवार ने मुख्यमंत्री को पूरे मामले की जानकारी देकर शिकायत की और न्याय की गुहार लगाई। मुलाकात के दौरान मुख्यमंत्री ने मामले की जांच कर उचित कार्रवाई का आश्वासन दिया। साथ ही पीड़ित परिवार को 1 लाख रुपए की आर्थिक सहायता देने की बात भी कही थी। हालांकि, परिवार का कहना है कि अब तक उसे सहायता राशि नहीं मिल पाई है।

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