अपराधियों को पकड़ने के लिए जबलपुर पुलिस सप्ताह में दो दिन कांबिंग गश्त करते हुए उनके खिलाफ लगातार कार्रवाई कर रही है, लेकिन वारंटियों की संख्या कम ही नहीं हो रही है। जिले में अभी भी 10 हजार से अधिक ऐसे वारंटी हैं, जो लंबे समय से फरार हैं। इनमें कई तो ऐसे हैं, जिनके पते तक बदल गए हैं या गलत हैं। ऐसे में इन तक पहुंचना पुलिस के लिए चुनौती बन गई है। कोर्ट से समंस,गिरफ्तारी और जमानती वारंट जारी होते हैं, तो पुलिस उन तक पहुंचने का प्रयास भी करती है, लेकिन पता ना मिल पाने के चलते पुलिस के हाथ खाली रहते हैं। सबसे ज्यादा गढ़ा थाने के वारंटी गायब
जिले के कई थानों में स्थायी वारंटियों की संख्या काफी अधिक है। गढ़ा थाने में सबसे ज्यादा 1075 वारंटी दर्ज हैं। इसके साथ ही गोहलपुर में 876, हनुमानताल में 825 और घमापुर थाने में 728 स्थायी वारंटी हैं। ये सभी फरार हैं। पुलिस रिकार्ड के मुताबिक कई मामले ऐसे हैं, जिनमें आरोपी जमानत मिलने के बाद से ही फरार हैं। हाल ही में पुलिस को पता चला कि जबलपुर के करौंदी निवासी संतोष अहिरवार ने वर्ष 2012 में मारपीट की घटना को अंजाम दिया था, जो गायब है। इसके साथ ही राजगढ़ निवासी जाकिर खान ने 2013 में चोरी की वारदात को अंजाम देने का मामले पर गिरफ्तार किया था, जिसे बाद में जमानत मिल गई। इसी तरह कांचीपुरम निवासी स्टीव को भी मारपीट करने के मामले पर गिरफ्तार कर जेल भेजा गया था। तीनों ही आरोपी जमानत पर जेल से छूटकर बाहर आए और गायब हो गए। संतोष 14 साल और स्टीव एवं जाकिर करीब 13 साल से फरार है। पता और नाम दोनों बदले
कई मालमों में आरोपी जमानत मिलने के बाद मोहल्ला,शहर छोड़ देता है, इतना ही नहीं नाम तक बदल लेते है। और फिर दूसरे शहर या फिर राज्यों में छिपकर रहने लगते है। यहां तक अपनी पहचान तक छिपा लेते है। जिसके चलते पुलिस को उन्हें तलाश करने में परेशानी का सामना करना पड़ता है। हालांकि फरार लोगों को जमानतदार पर पुलिस जरूर कार्रवाई करती है। जबलपुर के बाबा टोला निवासी राजेंद्र मराठा और उसका भाई नरबद मराठा ने साल 1997 में हत्या की वारदात को अंजाम दिया था। दोनों को उम्रकैद की सजा हुई। कुछ साल बाद दोनों को हाईकोर्ट से जमानत मिल गई। इसके बाद दोनों ही भाई परिवार के साथ शहर छोड़कर गायब हो गए। कई सालों बाद पुलिस ने दोनों को उत्तरप्रदेश के कानपुर से गिरफ्तार किया, जहां दोनों ही मजूदरी कर रहे थे। इस दौरान उनकी शक्ल तक बदल गई थी। दोनों ने रिश्तेदारों से भी बात करना बंद कर दिया था। कोर्ट करती है वारंट जारी
फरार आरोपियों को पेश करने के लिए कोर्ट पहले समंस और वारंट जारी किया जाता है। यदि आरोपी उपस्थित नहीं होता तो जमानती वारंट और फिर अंतत: स्थायी वारंट जारी किया जाता है, जिसे पुलिस को तामील कराना होता है। कई बार ऐसा भी होता है कि वारंटियों की तलाशी के लिए पुलिस सिर्फ खानापूर्ति करती है। पुलिस के रोजनामचे में यह भी दर्ज कर दिया जाता है कि आरोपी की तलाश की गई थी, लेकिन वह फरार है। हर सप्ताह होती है कांबिंग गश्त
जिले में अपराधों पर अंकुश लगाने और कानून व्यवस्था मजबूत करने के उद्देश्य से पुलिस अधिकारी हर सप्ताह कांबिंग गश्त करती है। इस दौरान फरार वारटिंयों की भी धरपकड़ होती है। पुलिस अधीक्षक सम्पत उपाध्याय के निर्देश पर व्यापक कांबिंग गश्त अभियान भी चलाया जाता है। इस दौरान पुलिस वर्षों से फरार आरोपियों की धरपकड़ करते हुए कार्रवाई भी करती है। अभियान के दौरान सक्रिय बदमाशों की निगरानी के लिए रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड, मुसाफिरखानों सहित सार्वजनिक स्थानों पर छापा मारा जाता है, जिस पर पुलिस को कामयाबी भी मिलती है। 3 महीनों में 300 से ज्यादा को पकड़ा
एएसपी सूर्यकांत शर्मा का कहना है कि फरार वारंटियों को पकड़ने के लिए हर सप्ताह शनिवार को पुलिस रात भर सड़क पर उतरकर फरार आरोपियों को पकड़ने का काम करती है। जिसमें कि ज्यादा से ज्यादा वारंटियों को पकड़ा जाता है। उन्होंने बताया कि जनवरी,फरवरी और मार्च के वर्तमान दिन तक में 300 से अधिक स्थायी वारंटियों को पकड़ा गया है। एएसपी का कहना है कि कुछ वारंटी नाम और पता बदल लेते है, जिन्हें पकड़ना थोड़ा चुनौतीपूर्ण रहता है। उन्होंने कहा कि कोर्ट के समक्ष जो पता आरोपियों के द्वारा दिया जाता है और बाद में जब समंस वारंट कटता है। पुलिस मौके पर जाती है तो व्यक्ति का पता गलत मिलता है, इसके बाद फाइल से जमानतदार का पता निकालकर वास्तविक पता आरोपी का निकाला जाता है। हालांकि इस काम में समय बहुत लगता है। जिले में वारंटियों की स्थिति
