पिछले 5 महीनों से मेरा वेतन रोक रखा है। इस प्रताड़ना के बाद मुझे समझ आया कि लोग कैसे सुसाइड करने पर मजबूर हो जाते हैं। अगर मेरे छोटे बच्चे नहीं होते, तो शायद मैं भी अब तक आत्महत्या कर लेती। इंस्टाग्राम पर रोते हुए अपनी परेशानी बताने वाली एसआई पूजा रघुवंशी अशोकनगर में पदस्थ हैं। उन्होंने बीमारी के बावजूद फील्ड ड्यूटी दिए जाने, अपनी बात नहीं सुने जाने और करीब पांच महीने से वेतन रोके जाने का आरोप लगाया है। अधिकारियों पर प्रताड़ना और सुनवाई नहीं होने का आरोप लगाने वाली पूजा अकेली नहीं हैं। बीते सप्ताह ग्वालियर में एक एएसआई ने वरिष्ठ अधिकारियों पर वाहनों से एंट्री के नाम पर अवैध वसूली कराने के आरोप लगाए। भिंड में चेकिंग पॉइंट पर वाहन चालकों से वसूली की शिकायत सोशल मीडिया पर पोस्ट करने वाले एक आरक्षक को निलंबित कर दिया गया। तीनों मामले अलग-अलग हैं, लेकिन सवाल एक ही है-अनुशासित माने जाने वाले पुलिस विभाग में क्या कर्मचारियों की शिकायतें उनके ही अधिकारियों तक नहीं पहुंच रहीं? पुलिसकर्मी अपनी बात रखने के लिए सोशल मीडिया का सहारा क्यों ले रहे हैं? क्या विभागीय व्यवस्था पर भरोसा कम हो रहा है या सोशल मीडिया को दबाव बनाने का जरिया बनाया जा रहा है? आज मंडे स्पेशल में इसी मुद्दे पर बात… सबसे पहले वो मामले समझिए जिससे ये सवाल खड़े हुए… केस-1: एएसआई ने लगाए वसूली के आरोप, फिर मांगी माफी ग्वालियर यातायात थाने में पदस्थ एएसआई चौधरी भानु प्रताप सिंह गुर्जर ने सोशल मीडिया पर दो वीडियो जारी कर अपने वरिष्ठ अधिकारियों पर गंभीर आरोप लगाए। उन्होंने यातायात थाना और चेकिंग पॉइंट पर तैनात पुलिसकर्मियों के माध्यम से वाहनों से अवैध वसूली कराने का आरोप लगाया। एएसआई ने वीडियो में दावा किया कि हर पॉइंट से हर महीने करीब 8-8 हजार रुपए वसूलने का दबाव था। उन्होंने यातायात थाने में सिपाहियों और लोडिंग वाहनों से भी वसूली किए जाने का आरोप लगाया। उनका कहना था कि आरोप सामने रखने के बाद उन्हें धमकी दी जा रही है और उनकी सोशल मीडिया आईडी सस्पेंड कराने का प्रयास किया जा रहा है। वीडियो वायरल होने के बाद मामला चर्चा में आया। हालांकि, कुछ दिन बाद एएसआई ने दूसरा वीडियो जारी कर अपने आरोप वापस लेते हुए माफी मांगी। उन्होंने खुद को मानसिक रूप से परेशान बताते हुए कहा कि दूसरे व्यक्ति के उकसाने पर उन्होंने पहला वीडियो बनाया था। उनके परिजन ने भी उनकी मानसिक स्थिति ठीक नहीं होने की बात कही। हालांकि पहला वीडियो उकसावे में बनाया गया था या दूसरा दबाव में बनाया गया ये अब भी साफ नहीं है। केस-2: बीमारी के बीच ड्यूटी और वेतन को लेकर शिकायत अशोकनगर सिटी कोतवाली में पदस्थ महिला सब-इंस्पेक्टर पूजा रघुवंशी ने सोशल मीडिया पर वीडियो जारी कर वरिष्ठ अधिकारियों पर अपनी शिकायत नहीं सुनने और प्रताड़ित करने के आरोप लगाए। पूजा का कहना है कि वह पिछले कई महीनों से स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों से जूझ रही हैं और लगातार इलाज करा रही हैं। उनका दावा है कि वह फील्ड या ग्राउंड ड्यूटी करने की स्थिति में नहीं थीं। उन्होंने अधिकारियों से ऑफिस या हल्की ड्यूटी देने का अनुरोध किया, लेकिन उनकी बात नहीं सुनी गई। पूजा ने करीब पांच महीने से वेतन रोके जाने का भी आरोप लगाया। उनका कहना है कि बीमारी और इलाज के बीच वेतन रुकने से उनकी परेशानी और बढ़ गई। उन्होंने सोशल मीडिया के जरिए अपनी समस्या सार्वजनिक की और अधिकारियों से सुनवाई की मांग की। वीडियो सामने आने के बाद अशोकनगर एसपी राजीव कुमार ने विभाग का पक्ष रखा। एसपी के मुताबिक डॉक्टरों ने परीक्षण के बाद पूजा को 10 दिन का आराम दिया था और इसके बाद ड्यूटी जॉइन करने के लिए कहा था। तय अवधि पूरी होने के बाद भी उन्होंने ड्यूटी ज्वाइन नहीं की और लंबे समय तक गैरहाजिर रहीं। पूजा को ड्यूटी जॉइन कर अपना आवेदन और मेडिकल दस्तावेज पेश करना चाहिए। दस्तावेजों की जांच करने के बाद उनकी मेडिकल समस्या को देखते हुए नियमानुसार उचित फैसला लिया जाएगा। केस-3: निलंबन के बाद आरक्षक ने लगाए वसूली के आरोप भिंड में चेकिंग पॉइंट पर तैनात आरक्षक आलोक राठौड़ को ट्रकों और मालवाहक वाहनों से अवैध वसूली के आरोप में निलंबित किया गया। निलंबन के बाद आरक्षक ने फेसबुक पर पोस्ट कर वरिष्ठ अधिकारियों पर ही वसूली का दबाव बनाने के आरोप लगाए। आरक्षक ने पोस्ट में आरोप लगाया कि एसडीओपी थानों पर 25 हजार से लेकर एक लाख रुपए तक वसूली का दबाव बना रहे थे।
उन्होंने दावा किया कि उनसे भी 50 हजार रुपए की मांग की गई थी। रकम पूरी नहीं करने पर उनके खिलाफ एसपी को बढ़ा-चढ़ाकर रिपोर्ट भेजी गई और उन्हें निलंबित करा दिया गया। मामला सामने आने के बाद पूर्व नेता प्रतिपक्ष डॉ. गोविंद सिंह ने मुख्यमंत्री मोहन यादव को पत्र लिखकर कार्रवाई की मांग की। हालांकि अब तक काेई कार्रवाई नहीं हुई है। हाल के रिश्वत के मामलों ने भी बढ़ाए सवाल पुलिस विभाग में भ्रष्टाचार के आरोपों के बीच हाल के कुछ मामलों ने भी सवाल खड़े किए हैं। इंदौर में लोकायुक्त ने क्राइम ब्रांच के एक इंस्पेक्टर सहित चार पुलिसकर्मियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की थी। आरोप था कि एक युवक को कानूनी कार्रवाई से बचाने और रिहा करने के बदले 1.20 लाख रुपए की रिश्वत मांगी गई। इसी तरह कटनी में पदस्थ रहीं सीएसपी नेहा पच्चीसिया पर जमीन के सौदे और रिश्वत से जुड़े आरोप लगे। मुख्यमंत्री के निर्देश के बाद उन्हें निलंबित किया गया। नेहा समेत तीन लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू की गई। इन मामलों से यह जरूर सामने आता है कि पुलिसकर्मियों पर लगने वाले भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच और कार्रवाई के मामले सामने आते रहे हैं। इसलिए इसे सिर्फ आरोप-प्रत्यारोप मानकर खारिज नहीं किया जा सकता। सोशल मीडिया क्यों बन रहा शिकायत का रास्ता? रिटायर्ड आईपीएस अधिकारी एनके त्रिपाठी के मुताबिक पुलिस एक अनुशासित बल है। विभाग में कर्मचारियों की शिकायतों के लिए बाकायदा व्यवस्था है। कोई भी पुलिसकर्मी अपनी समस्या या शिकायत वरिष्ठ अधिकारियों के सामने रख सकता है और उसके निराकरण का प्रावधान है।
उनका कहना है कि यदि किसी स्तर पर कर्मचारी को लगता है कि उसकी शिकायत नहीं सुनी जा रही, तो वह सोशल मीडिया का सहारा लेने के लिए मजबूर हो सकता है। ऐसी शिकायत में प्रथम दृष्टया सच्चाई नजर आए तो उसे सुना जाना चाहिए और जरूरत हो तो उच्च स्तर पर जांच भी कराई जानी चाहिए। हालांकि, त्रिपाठी यह भी मानते हैं कि पुलिसकर्मियों को सोशल मीडिया पर विभाग या अधिकारियों के खिलाफ विवादित आरोप लगाने से बचना चाहिए।
