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खेल, न्याय, विज्ञान के मोर्चे पर अगुआई:भोपाल सिर्फ झीलों का शहर नहीं, देश की रणनीति और गौरव का केंद्र भी है…

सच्ची बात, बेधड़क। दैनिक भास्कर भोपाल संस्करण के 68 वर्ष पूरे होने पर हम 11 दिन तक हर सुबह भोपाल की नई कहानी, अनदेखे पहलू की एक विशेष श्रृंखला लेकर आए हैं। हम आपको भोपाल के सबसे बड़े बदलावों, शहर को जीवन देने वाली धरोहरों पर विशेषज्ञों के मंथन, पुराने दस्तावेजों और दुर्लभ अभिलेखों की पड़ताल से निकले अनकहे सच, तथ्यों पर आधारित एक्सक्लूसिव खुलासों और दुर्लभ तस्वीरों के संग्रह से रूबरू कराएंगे। पढ़िए आज की कहानी… भोपाल को अक्सर झीलों, हरियाली और अपनी शांत रफ्तार के लिए जाना जाता है। लेकिन देश में बहुत कम शहर ऐसे हैं जहां न्यायपालिका, खेल, वैज्ञानिक अनुसंधान और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसी संस्थाएं एक साथ इतनी मजबूती से मौजूद हों। भोपाल में देश-दुनिया के जज ट्रेनिंग लेते हैं, ओलिंपिक खिलाड़ी तैयार होते हैं, अंतरिक्ष के सैटेलाइट संभाले जाते हैं और राष्ट्रीय नीतियां लिखी जाती हैं। यानी भोपाल देश की ताकत का शहर है। स्पोर्ट्स हब : शूटिंग, हॉकी, एथलेटिक्स, रोइंग, कयाकिंग, कैनोइंग जैसे अनेक ओलिंपिक खेलों का गढ़ भारत के ओलिंपिक मेडल का रास्ता भोपाल से गुजरता है… बाय इन्विटेशन ऐश्वर्य प्रताप सिंह, ओलिंपियन खरगोन जिले के एक छोटे से गांव से निकलकर मध्यप्रदेश में खेलते हुए मैंने यहां की खेल सुविधाओं को लगातार बेहतर होते देखा है। आज भोपाल में खिलाड़ियों के लिए कई ऐसे इंफ्रास्ट्रक्चर और अकादमियां हैं, जो देश के दूसरे राज्यों की सुविधाओं के मुकाबले काफी अच्छी हैं। आधुनिक ट्रेनिंग सेंटर, बेहतर मैदान, सिंथेटिक ट्रैक और शूटिंग रेंज जैसी सुविधाओं से खिलाड़ियों को अपने खेल को निखारने का बेहतर अवसर मिल रहा है। मप्र की खेल अकादमियों ने भी खिलाड़ियों को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। अलग-अलग खेलों के लिए विशेषज्ञ प्रशिक्षण, कोचिंग और अभ्यास की सुविधाएं उपलब्ध हैं। इसका असर खिलाड़ियों के प्रदर्शन में भी दिखाई दे रहा है। प्रदेश के खिलाड़ी राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लगातार अपनी पहचान बना रहे हैं। पदक जीतने वालों को नौकरी और कॅरियर का भरोसा मिले खिलाड़ी के लिए बेहतर मैदान और ट्रेनिंग जितनी जरूरी है, उतनी ही जरूरी उसके भविष्य की सुरक्षा भी है। मेरा मानना है कि सरकार ने खेल इंफ्रास्ट्रक्चर मजबूत करने की दिशा में अच्छा काम किया है। अब पदक जीतने वाले खिलाड़ियों की नौकरी और करियर पर भी उतना ही ध्यान देने की जरूरत है। एक खिलाड़ी अपने जीवन के कई साल खेल को देता है। लगातार मेहनत के बाद जब वह प्रदेश या देश के लिए पदक जीतता है तो उसके सामने आगे के जीवन और करियर का सवाल भी होता है। यदि पदक विजेता खिलाड़ियों को सम्मानजनक नौकरी और भविष्य की सुरक्षा मिले तो वे करियर की चिंता किए बिना अपने खेल पर ज्यादा ध्यान दे सकेंगे। बता दें कि पेरिस ओलिंपिक-2024 से पहले भारतीय शूटिंग टीम के चयन का अंतिम दौर भोपाल में हुआ। ऐश्वर्य प्रताप सिंह तोमर, मनु भाकर, स्वप्निल कुसाले, विजयवीर सिद्धू और सिफ्ट कौर समरा समेत देश के शीर्ष निशानेबाजों ने यहां ट्रायल दिए थे। साई भोपाल : रोज 370 खिलाड़ियों की ट्रेनिंग बिशनखेड़ी स्थित भारतीय खेल प्राधिकरण (साई) का राष्ट्रीय उत्कृष्टता केंद्र भोपाल की खेल ताकत का सबसे बड़ा आधार है। यहां एथलेटिक्स, हॉकी, बॉक्सिंग, जूडो, वुशु और कयाकिंग-कैनोइंग के खिलाड़ी आधुनिक खेल विज्ञान, फिटनेस, रिकवरी और तकनीकी विश्लेषण की सुविधाओं के बीच प्रशिक्षण लेते हैं। मप्र शूटिंग एकेडमी : हर ओलिंपिक की तैयारी यहीं जनवरी 2007 में शुरू हुई मध्यप्रदेश राज्य शूटिंग अकादमी आज देश की सर्वश्रेष्ठ शूटिंग सुविधाओं में गिनी जाती है। राष्ट्रीय चयन ट्रायल, ओलिंपिक कैंप और बड़े टूर्नामेंट लगातार यहां आयोजित होते हैं। मनीषा कीर जैसे अंतरराष्ट्रीय निशानेबाज और जयदीप कर्माकर जैसे ओलिंपियन कोच इस अकादमी से जुड़े रहे हैं। घुड़सवारी एकेडमी : 90 अस्तबल, ओलिंपिक तैयारी जनवरी 2007 में स्थापित राज्य घुड़सवारी अकादमी देश के चुनिंदा हाई-परफॉर्मेंस प्रशिक्षण केंद्रों में शामिल है। यहां शो जंपिंग, ड्रेसेज और थ्री-डे इवेंटिंग जैसी ओलिंपिक स्पर्धाओं की तैयारी कराई जाती है। अत्याधुनिक प्रशिक्षण उपलब्ध है। हॉकी : 7 ओलिंपियन दिए, 4 ने मेडल जीते इस शहर ने देश को 7 ओलंपियन दिए हैं, जिनमें से 4 ने पदक जीते। आज भी यह विरासत जारी है। टोक्यो ओलिंपिक-2020 के कांस्य पदक विजेता विवेक सागर प्रसाद और नीलकंठ शर्मा ने भी भोपाल एकेडमी में प्रशिक्षण लिया है। पानी बना मैदान : पांच खेल, 97 राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय पदक देश के प्रमुख वाटर स्पोर्ट्स प्रशिक्षण केंद्रों में। जनवरी 2007 में शुरू हुई मप्र राज्य वाटर स्पोर्ट्स अकादमी ने रोइंग, सेलिंग, कयाकिंग, कैनोइंग व कैनो स्लालम में कई अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी तैयार किए। 2025 में खेलो इंडिया वाटर स्पोर्ट्स में पदक जीते। छाेटा तालाब स्थित पैरा कयाकिंग-कैनोइंग केंद्र की चर्चा कम होती है। सिर्फ तीन प्रशिक्षकों की टीम ने यहां 66 अंतरराष्ट्रीय पदक विजेता तैयार किए हैं। खिलाड़ियों की जरूरत के मुताबिक नावों में बदलाव से लेकर उच्चस्तरीय प्रशिक्षण तक की सुविधाएं। नेशनल ज्यूडिशियल एकेडमी यहां देश-दुनिया के जजों की पाठशाला बाय इन्विटेशन विश्वजीत पाण्डेय, रजिस्ट्रार (प्रशासन) अगर भारत में कोई नया कानून लागू होता है, न्यायिक व्यवस्था में बड़ा बदलाव आता है या अदालतों के सामने नई चुनौतियां खड़ी होती हैं, तो उसकी तैयारी की एक अहम कड़ी भोपाल से जुड़ती है। यहां स्थित राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी अपने देश की सर्वोच्च न्यायिक प्रशिक्षण अकादमी ही नहीं अपितु विश्व की सबसे बड़ी न्यायिक प्रशिक्षण अकादमी है। यहां सुप्रीम कोर्ट, हाई कोर्ट और जिला न्यायपालिका के न्यायाधीश सिर्फ कानून ही नहीं पढ़ते, बल्कि निर्णय लेखन, न्यायिक नैतिकता, संवैधानिक मूल्य, साइबर अपराध, डिजिटल साक्ष्य, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई), न्यायालय प्रबंधन और नई न्यायिक चुनौतियों जैसे विषयों पर प्रशिक्षण लेते हैं। इसके अलावा आज के अन्य महत्वपूर्ण विषय जैसे पर्यावरण, जेंडर, आतंकवाद विरोधी कानून, नशीले पदार्थ, एडीआर, आईपीआर और समुद्री कानून पर भी अकादमी, न्यायिक अधिकारियों के क्षमता विकास का प्रशिक्षण भी देती है। यही वजह है कि भोपाल आज देश की न्यायिक प्रशिक्षण राजधानी बन चुका है। 51 हजार से ज्यादा भारतीय जज, 50 देशों के न्यायाधीश भी यहीं आए साल 1993 में स्थापित राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी करीब 64 एकड़ क्षेत्र में फैली है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसके पदेन अध्यक्ष भारत के मुख्य न्यायाधीश होते हैं। पिछले तीन दशकों में 51 हजार से अधिक भारतीय न्यायाधीश यहां प्रशिक्षण ले चुके हैं। नए आपराधिक कानून भारतीय न्याय संहिता, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता और भारतीय साक्ष्य अधिनियम 01 जुलाई 2024 को लागू होने के पश्चात् अब तक 6348 न्यायाधीशों को अकादमी में प्रशिक्षित किया गया। इसे देश का अब तक का सबसे बड़ा न्यायिक प्रशिक्षण अभियान माना जाता है। राष्ट्रीय न्यायिक अकादमी की पहचान अब भारत तक ही सीमित नहीं है। विदेश मंत्रालय के भारतीय तकनीकी एवं आर्थिक सहयोग (आईटीईसी) कार्यक्रम के तहत करीब 50 देशों के न्यायाधीश भी भोपाल में प्रशिक्षण ले चुके हैं। 2017 से 2026 के बीच 2103 विदेशी न्यायाधीश यहां आए। नेपाल, भूटान, मालदीव, म्यांमार, सिंगापुर, श्रीलंका, पेरू और अफ्रीकी देशों के न्यायाधीश भारतीय न्याय व्यवस्था को समझने और अपनी न्यायिक क्षमता बढ़ाने के लिए भोपाल आते हैं। विधि एवं न्याय मंत्रालय के अनुसार 2017 से 30 नवंबर 2025 तक अकादमी ने कुल 543 शैक्षणिक कार्यक्रम आयोजित किए, जिनमें 20,899 उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों, न्यायिक अधिकारियों, ट्रिब्यूनल सदस्यों और विदेशी न्यायाधीशों ने हिस्सा लिया। यानी बीते नौ वर्षों में ही अकादमी की गतिविधि पहले से कहीं ज्यादा तेज हुई है। अकादमी भारत सरकार के विभिन्न विभागों के अधिकारियों को विधिक तौर पर प्रशासनिक मामलों को सक्षम ढंग से समाधान करने में क्षमता विकास का प्रशिक्षण भी देती है। यही है भोपाल की सबसे बड़ी ताकत: देश में राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय और न्यायिक प्रशिक्षण संस्थान अलग-अलग शहरों में मिलना सामान्य सी बात है, लेकिन भोपाल की पहचान इससे अलग है। यहां देश की सर्वोच्च न्यायिक प्रशिक्षण संस्था और शीर्ष राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय एक ही शहर में हैं। एक ओर यहां कार्यरत न्यायाधीश बदलते समय के अनुरूप स्वयं को तैयार करते हैं, तो दूसरी ओर भविष्य के न्यायाधीश, वरिष्ठ अधिवक्ता, कॉर्पोरेट विधि विशेषज्ञ और नीति निर्माता तैयार होते हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो भारत की न्यायपालिका का वर्तमान भोपाल से जुड़ा है और भविष्य भी। हमारी 4 बड़ी खासियतें 1. निशाद : जिन 6 पशु लैब पर दुनिया को भरोसा, उनमें से एक यहां मुकुंदपुरा में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद का नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हाई सिक्योरिटी एनिमल डिजीज (निशाद) है। यह देश की सबसे सुरक्षित पशु रोग प्रयोगशाला है। यहां बर्ड फ्लू, लम्पी, रिंडरपेस्ट जैसे बेहद खतरनाक पशु वायरस पर शोध होता है। निशाद देश की इकलौती संस्था है, जहां बीएसएल-3 और बीएसएल-4 दोनों स्तर की हाई-सिक्योरिटी लैब हैं। इन लैब में वैज्ञानिक विशेष सुरक्षा व्यवस्था के बीच सबसे खतरनाक वायरस पर शोध करते हैं, ताकि उनका कोई नमूना बाहर न जा सके। मई 2025 में विश्व पशु स्वास्थ्य संगठन और संयुक्त राष्ट्र की खाद्य एवं कृषि संस्था ने इसे दुनिया की उन 6 लैब में शामिल किया, जहां सबसे खतरनाक रिंडरपेस्ट वायरस के सुरक्षित नमूने रखे जा सकते हैं। चेचक के बाद यह दूसरी ऐसी बीमारी थी, जिसे मिटा दिया गया है। भविष्य में वैक्सीन व इमरजेंसी के लिए सुरक्षित नमूने दुनिया की 6 लैब में रखे गए हैं। 2. मास्टर कंट्रोल फैसिलिटी : अंतरिक्ष में घूम रहे भारतीय सैटेलाइट, निगरानी यहां से भौंरी इलाके में भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) की मास्टर कंट्रोल फैसिलिटी (एमसीएफ) है। यहां अंतरिक्ष में पहुंच चुके भारतीय उपग्रहों की 24 घंटे निगरानी की जाती है। रॉकेट सैटेलाइट को अंतरिक्ष में छोड़ देता है, पर उसे सही कक्षा में बनाए रखना, जरूरत पड़ने पर उसकी दिशा ठीक करना व तकनीकी सेहत पर लगातार नजर रखना इसी केंद्र की जिम्मेदारी है। देश में ऐसी सिर्फ दो एमसीएफ हैं- एक कर्नाटक के हासन में, दूसरी भोपाल में। दोनों केंद्र मिलकर अभी 32 भारतीय उपग्रहों व अंतरिक्ष यानों का संचालन कर रहे हैं। इनमें 20 संचार, 9 नेविगेशन और 3 मौसम उपग्रह शामिल हैं। मोबाइल नेटवर्क, डीटीएच, मौसम पूर्वानुमान, आपदा प्रबंधन और NavIC जैसी सेवाएं इन्हीं उपग्रहों पर निर्भर हैं। भोपाल और हासन की MCF मिलकर 150 डिग्री Geo-Arc को कवर करती हैं। यानी फारस की खाड़ी से ऑस्ट्रेलिया तक फैले अंतरिक्ष क्षेत्र में निगरानी। 3. सीएसआईआर-एमप्री :हम परमाणु बिजलीघरों की सुरक्षा तकनीक बना रहे… अरेरा कॉलोनी स्थित सीएसआईआर-एडवांस्ड मैटेरियल्स एंड प्रोसेसेस रिसर्च इंस्टीट्यूट (एमप्री) देश की उन चुनिंदा राष्ट्रीय प्रयोगशालाओं में है, जहां उद्योग, ऊर्जा, रेलवे, रक्षा और निर्माण क्षेत्र के लिए नई सामग्री और तकनीक विकसित की जाती हैं। संस्थान की सबसे चर्चित उपलब्धियों में से एक है एल्युमिनियम उद्योग के कचरे ‘रेड मड’ से विकसित रेडिएशन-शील्डिंग सामग्री। यह सामान्य कंक्रीट की तुलना में गामा किरणों को 11% अधिक रोकने में सक्षम है। उपयोग परमाणु बिजलीघरों के साथ एक्स-रे रूम, रेडियोथेरेपी इकाइयों व अन्य रेडिएशन वाले क्षेत्रों में किया जा सकता है। इस तकनीक को अमेरिकी पेटेंट भी मिल चुका है। एमप्री ने बांस से ऐसी इंजीनियर्ड लकड़ी भी विकसित की है, जो सागौन जैसी मजबूत है। एमप्री 2023 और 2024 के दौरान रेडिएशन व शील्डिंग सामग्री, बांस कंपोजिट, बायो-बाइंडरसहित 9 तकनीकों का उद्योगों को ट्रांसफर भी कर चुका है। 4. डिजिटल शक्ति :देश का सबसे बड़ा सरकारी डेटा सेंटर भी यहीं बन रहा… भोपाल के आईटी पार्क में नेशनल इंफॉर्मेटिक्स सेंटर (एनआईसी) का नेशनल डेटा सेंटर बनाया जा रहा है। यह परियोजना 1,500 रैक क्षमता के साथ चरणबद्ध तरीके से विकसित की जाएगी। दिल्ली के नेशनल डेटा सेंटर की क्षमता 462 रैक, भुवनेश्वर की 271 रैक, पुणे की 171 रैक और हैदराबाद की 154 रैक है। यानी योजना पूरी होने पर भोपाल का डेटा सेंटर क्षमता के लिहाज से अब तक के सभी मौजूदा डेटा सेंटर से बड़ा होगा। यहीं से ई-ऑफिस, ई-कोर्ट्स, राष्ट्रीय क्लाउड, सरकारी वेबसाइट, डिजिटल रिकॉर्ड और हजारों ई-गवर्नेंस सेवाओं के लिए आधारभूत डिजिटल ढांचा तैयार होगा। आज एनआईसी के डेटा सेंटरों पर 10,000 सरकारी एप, 5,000 सर्वर, करीब 100 पेटाबाइट डेटा संचालित हो रहा है। परियोजना के लिए आईटी पार्क में 5 एकड़ जमीन आवंटित की जा चुकी है और इसे चरणबद्ध तरीके से विकसित किया जा रहा है। ये भी हमारा गौरव आईआईएफएम भोपाल देश का सबसे बड़ा संस्थान, जो पर्यावरण-बिजनेस साथ पढ़ाता है… 1982 में स्थापित आईआईएफएम भोपाल (भारतीय वन प्रबंधन संस्थान) देश का सबसे बड़ा संस्थान है जो पर्यावरण-बिजनेस साथ पढ़ाता है। जब दुनिया में ईएसजी (पर्यावरण, सामाजिक और शासन-प्रणाली) और ‘ग्रीन जॉब्स’ जैसे शब्द भी नहीं थे, उससे दो दशक पहले से यह संस्थान वन प्रबंधन को आर्थिक और सामाजिक संतुलन से जोड़ रहा था। जिस भाषा को दुनिया ने बाद में ‘सस्टेनेबिलिटी’ का नाम दिया, भोपाल का यह संस्थान उसे बरसों पहले से जमीन पर उतार रहा था। एसपीए, भोपाल दिल्ली के सेंट्रल विस्टा में 100 साल पुरानी इमारतों को सहेजेगा स्कूल ऑफ प्लानिंग एंड आर्किटेक्चर (एसपीए) को केंद्र सरकार राष्ट्रीय महत्व का संस्थान घोषित कर चुकी है। यानी इसकी डिग्री आईआईटी व आईआईएम के बराबर होती है। देश में सिर्फ 3 एसपीए हैं- भोपाल, दिल्ली और विजयवाड़ा। दिल्ली के ‘सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट’ में 100 साल पुरानी ऐतिहासिक इमारतों (नॉर्थ व साउथ ब्लॉक) के हेरिटेज लुक और मूल मजबूती को बिना कोई नुकसान पहुंचाए, उन्हें विश्वस्तरीय राष्ट्रीय संग्रहालयों में बदलने का काम एसपीए भोपाल करेगा। (कल पार्ट 8 में पढ़िए नई कहानी)

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