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ओले-बारिश से बिगड़ा संतुलन, ‘कंफ्यूज’ हो रहे पेड़-पौधे:समय से पहले आ रहीं पत्तियां, क्लाइमेट चेंज का असर; फूड सिक्योरिटी पर खतरा

क्लाइमेट चेंज के चलते मौसम का संतुलन तेजी से बिगड़ रहा है, जिसका सीधा असर अब प्रकृति और इंसानी जीवन पर दिखाई देने लगा है। सबसे बड़ा खतरा फूड सिक्योरिटी पर मंडरा रहा है, क्योंकि पेड़-पौधों का जीवन चक्र गड़बड़ा गया है। समय से पहले पत्तियां आना और मौसम के अनुसार पौधों का व्यवहार बदल जाना प्राकृतिक चक्र के साथ एक बड़ा ‘धोखा’ है। विशेषज्ञों के अनुसार, यदि यह स्थिति जारी रही तो आने वाले समय में पौधों की वृद्धि और उत्पादन दोनों प्रभावित होंगे, जिसका असर खाद्यान्न उपलब्धता पर पड़ेगा।
असर अब सिर्फ पर्यावरण ही नहीं बल्कि स्वास्थ्य और पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों पर भी साफ नजर आने लगा है। पेड़-पौधों का बिगड़ा जीवन चक्र, समय से पहले आ रहीं पत्तियां
पर्यावरण के विशेषज्ञ सुभाष सी पांडे ने जंगलों का उदाहरण देते हुए बताया कि सागौन जैसे पेड़ गर्मियों में पत्तियां गिरा देते हैं, लेकिन हाल की बारिश के कारण उन्हें भ्रम हो गया कि मानसून आ गया है। इसके चलते उनमें समय से पहले नई पत्तियां और कलियां आ गईं। यह प्राकृतिक चक्र के साथ बड़ा ‘धोखा’ है, जो आगे चलकर पौधों की वृद्धि और उत्पादन को प्रभावित करेगा। उन्होंने बताया कि पास में ही खारी गांव के नजदीक उन्होंने कई सागौन के पेड़ों में उस समय नई पत्तियां देखीं जब वह पहले से ही पतझड़ हो चुके थे। यह असर अप्रैल माह में हुई बारिश के कारण ही देखा गया है। फूड सिक्योरिटी पर मंडराता खतरा
पांडे के अनुसार, यदि यही स्थिति बनी रही तो आने वाले समय में सबसे बड़ा संकट ‘फूड इनसिक्योरिटी’ का होगा। उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि अगर समय पर गर्मी नहीं पड़ेगी तो गेहूं की फसल प्रभावित होगी और अगर बारिश समय पर नहीं होगी तो अन्य फसलें भी प्रभावित होंगी। ओलावृष्टि और बारिश से सब्जियों का नुकसान
पांडे ने हाल की घटनाओं का जिक्र करते हुए कहा कि कुछ ही दिनों की तेज बारिश और ओलावृष्टि से सब्जियों की फसलें नष्ट हो गईं। कई जगहों पर सब्जियां गल गईं, जिससे बाजार में आपूर्ति कम हो गई और कीमतें बढ़ गईं। सडन क्लाइमेट चेंज: मौसम का असंतुलित होता चक्र
सुभाष सी पांडे के मुताबिक, वर्तमान में जो असामान्य मौसम देखने को मिल रहा है, गर्मी में बारिश, सर्दी में गर्मी, यह ‘सडन क्लाइमेट चेंज’ का परिणाम है। उन्होंने बताया कि यह किसी एक कारण से नहीं, बल्कि कई वैश्विक और स्थानीय कारणों के संयुक्त प्रभाव से हो रहा है, जिससे मौसम का प्राकृतिक संतुलन लगातार बिगड़ रहा है।
दुनिया की जलवायु पर प्रशांत महासागर की समुद्री धाराओं का बड़ा प्रभाव है। वैश्विक स्तर पर इंटर गवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज और अन्य वैज्ञानिक संस्थाएं भी मानती हैं कि अलनीनो और ला नीना जैसे प्रभाव पूरी दुनिया के मौसम को प्रभावित करते हैं। एल नीनो के दौरान तापमान बढ़ता है, जबकि ला नीना के समय अधिक वर्षा होती है। अलनीनो और ला-नीना के पीछे का कारण अब भी रहस्य
पांडे ने कहा कि वैज्ञानिक अभी तक यह पूरी तरह नहीं समझ पाए हैं कि अलनीनो और ला-नीना को ट्रिगर कौन करता है। क्या इसके पीछे समुद्र में बढ़ता प्रदूषण, प्लास्टिक कचरा या ग्लोबल वार्मिंग जिम्मेदार है, इस पर अभी पर्याप्त शोध नहीं हुआ है। ग्लोबल वार्मिंग बना सबसे बड़ा खतरा
ग्लोबल वार्मिंग इस पूरे बदलाव का सबसे बड़ा कारक है। यह न केवल वैश्विक जलवायु को प्रभावित कर रही है, बल्कि स्थानीय स्तर पर भी अचानक मौसम परिवर्तन की घटनाओं को बढ़ा रही है। उन्होंने कहा कि इस तरह के अचानक मौसम बदलाव का असर सिर्फ पर्यावरण तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका प्रभाव इंसानों के स्वास्थ्य और व्यवहार पर भी पड़ रहा है। तापमान में अचानक बदलाव से बीमारियां बढ़ने का खतरा भी बढ़ता है। समय से पहले सूख गया गेहूं, घटेगा उत्पादन
पांडे ने बताया कि फरवरी में अचानक बढ़ी गर्मी के कारण गेहूं की फसल समय से पहले पकने की स्थिति में पहुंच गई। दाने पूरी तरह विकसित नहीं हो पाए और उत्पादन तथा गुणवत्ता दोनों प्रभावित हुए। उन्होंने नैनीताल का उदाहरण देते हुए बताया कि जहां पहले तापमान 5-7 डिग्री रहता था, वहां अब 13 डिग्री तक पहुंच गया है। इसका कारण बढ़ता पर्यटन, वाहनों का प्रदूषण और मानव गतिविधियां हैं। इससे वन्यजीवों का अस्तित्व भी खतरे में पड़ गया है। ग्लेशियर पिघलने से बढ़ेगा समुद्र का जलस्तर
पांडे ने चेतावनी दी कि ग्लोबल वार्मिंग के चलते आर्कटिक और अंटार्कटिक क्षेत्रों की बर्फ तेजी से पिघल रही है। इससे समुद्र का जलस्तर बढ़ेगा और 2050 तक कई तटीय शहर डूब सकते हैं। उन्होंने बताया कि इंडोनेशिया की राजधानी जकार्ता इसका उदाहरण है, जहां समुद्र के बढ़ते जलस्तर के कारण सरकार को राजधानी स्थानांतरित करनी पड़ी। भारत के तटीय शहर भी खतरे में
पांडे ने कहा कि इसका असर भारत पर भी पड़ेगा। देश के तटीय शहरों पर खतरा मंडरा रहा है और वहां रहने वाले लोगों को अंदरूनी क्षेत्रों में पलायन करना पड़ सकता है, जिससे सामाजिक और आर्थिक दबाव बढ़ेगा। सीजनल ट्रीटमेंट पर पड़ रहा असर
आयुर्वेदिक चिकित्सक डॉ. प्रीति चतुर्वेदी के अनुसार, आयुर्वेद में इलाज पूरी तरह मौसम के अनुसार तय किया जाता है। इसमें प्रिवेंटिव (रोकथाम) और क्यूरेटिव (इलाज) दोनों तरह के उपचार शामिल होते हैं। हर ऋतुबसंत, वर्षा और शरद के लिए अलग-अलग पंचकर्म और उपचार पद्धतियां निर्धारित होती हैं, लेकिन अब मौसम के असंतुलन के कारण इस तय पैटर्न में बदलाव करना पड़ रहा है। इम्युनिटी बढ़ाने पर बढ़ा फोकस
डॉ. चतुर्वेदी बताती हैं कि अचानक तापमान में उतार-चढ़ाव और मौसम के अनिश्चित व्यवहार के कारण शरीर पर सीधा असर पड़ता है। ऐसे में मरीजों को सुरक्षित रखने के लिए इम्यूनो-मॉड्यूलेटर, पंचकर्म और रीजुवेनेशन थेरेपी का सहारा लिया जा रहा है, ताकि शरीर को इस तरह तैयार किया जा सके कि वह बदलते मौसम के प्रभाव को सहन कर सके। ‘संधिकाल’ में बढ़ती है चुनौती
उन्होंने बताया कि मार्च-अप्रैल जैसे समय को आयुर्वेद में ‘संधिकाल’ कहा जाता है, जब एक ऋतु से दूसरी ऋतु में बदलाव होता है। इस दौरान सामान्य रूप से भी शरीर को विशेष देखभाल की जरूरत होती है, लेकिन अब क्लाइमेट चेंज के कारण यह बदलाव और ज्यादा अस्थिर हो गया है, जिससे मरीजों को अतिरिक्त समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। प्रकृति और शरीर का गहरा संबंध
डॉ. चतुर्वेदी के मुताबिक, आयुर्वेद में यह माना जाता है कि “जो बाहर है, वही अंदर है।” यानी प्रकृति में हो रहे बदलाव सीधे शरीर को प्रभावित करते हैं। बढ़ता प्रदूषण, वनों की कटाई और पर्यावरण में हो रहे परिवर्तन अब मौसम के असामान्य व्यवहार के रूप में सामने आ रहे हैं, जिसका असर स्वास्थ्य पर भी दिख रहा है। ये खबर भी पढ़ें… नर्मदा में 11 हजार लीटर दूध अर्पण से खतरा सीहोर जिले के सातदेव में नर्मदा नदी में 11 हजार लीटर दूध प्रवाहित करने का मामला अब नए खतरे की ओर इशारा कर रहा है। पर्यावरण विशेषज्ञ सुभाष सी पांडे के अनुसार, इसका असर केवल तत्काल प्रदूषण तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका “सेकेंड फेज” और ज्यादा खतरनाक है, जिसमें जलीय जीवों की मौत और सड़न से महीनों तक नदी का पानी प्रदूषित रहेगा और लोगों के स्वास्थ्य पर गंभीर असर पड़ सकता है।पूरी खबर पढ़ें

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