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एमपी में बढ़ा ग्राउंड वाटर, 83% कुओं में बढ़ा पानी:1036 कुओं का विश्लेषण, 49% में दो मीटर तक बढ़ा जलस्तर

मध्य प्रदेश के लिए एक बहुत अच्छी खबर सामने आई है। केंद्र सरकार की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, राज्य में जमीन के नीचे के पानी (ग्राउंड वाटर) की स्थिति में पिछले दस सालों के मुकाबले बड़ा सुधार हुआ है। लोकसभा में जल शक्ति मंत्रालय द्वारा पेश किए गए आंकड़ों के मुताबिक, मध्य प्रदेश के 82.82% निगरानी कुओं में पानी का स्तर बढ़ा है। यह आंकड़ा राष्ट्रीय औसत (73.25%) से भी काफी ज्यादा है। लोकसभा में पेश की गई ‘डायनामिक ग्राउंड वॉटर असेसमेंट रिपोर्ट 2025’ के अनुसार, मध्य प्रदेश उन राज्यों की सूची में ऊपर है, जहां पानी बचाने के प्रयास सफल हो रहे हैं। पूरे देश में मध्य प्रदेश की स्थिति अगर तुलना की जाए, तो मध्य प्रदेश की स्थिति राजस्थान, हरियाणा और पंजाब जैसे राज्यों से काफी अच्छी है। जहां देश के कई हिस्सों में पानी का बहुत ज्यादा दोहन (जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल) चिंता का विषय है, वहीं मध्य प्रदेश के 317 सरकारी ब्लॉकों में से 221 ब्लॉक (लगभग 70%) पूरी तरह ‘सुरक्षित’ श्रेणी में हैं। इसका मतलब है कि इन इलाकों में उतना पानी जमीन के अंदर वापस जा रहा है जितना बाहर निकाला जा रहा है। एमपी के ब्लॉकों में ग्राउंड वाटर की स्थिति 1036 कुओं के भूजल स्तर की रिपोर्ट (2015-2025) जल स्तर में वृद्धि (कुल 858 कुएं – 82.82%) जल स्तर में गिरावट (कुल 176 कुएं – 16.99%) सरकार की स्कीम और पब्लिक के प्रयासों से बढ़ा ग्राउंड वाटर 39 जिलों में नाइट्रेट की मात्रा ज्यादा भले ही पानी की मात्रा बढ़ रही है, लेकिन पानी की गुणवत्ता को लेकर एक नई चिंता सामने आई है। हालिया रिपोर्ट के अनुसार, मध्य प्रदेश के 55 में से 39 जिलों में भूजल में नाइट्रेट की मात्रा अधिक पाई गई है। मामले में मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश के बाद देश में दूसरे नंबर पर है। इसका मुख्य कारण खेती में यूरिया जैसे खादों का बहुत ज्यादा इस्तेमाल और शहरों में सीवेज (गंदे पानी) के सही निपटान की कमी है। एमपी सहित दूसरे राज्यों की स्थिति मध्य प्रदेश के मालवा में बड़ी चुनौती मध्य प्रदेश के कुल 317 सरकारी ब्लॉकों में से 221 ब्लॉक पूरी तरह ‘सुरक्षित’ हैं। इसका मतलब यह है कि इन इलाकों में हम उतना ही पानी निकाल रहे हैं, जितना बारिश या अन्य तरीकों से जमीन के अंदर वापस जा रहा है। हालांकि, मालवा अंचल के इंदौर, उज्जैन, शाजापुर में अब भी चुनौती बनी हुई है। इंदौर जैसे औद्योगिक और घनी आबादी वाले क्षेत्रों को ‘क्रिटिकल’ या गंभीर श्रेणी में रखा है, जहां पानी का दोहन 80% से ज्यादा है।

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