एमपी में बेसहारा गोवंश सरकार और किसानों के लिए बड़ी चुनौती है। एक तरफ जहां किसानों की फसलों को बेसहारा जानवर नुकसान पहुंचाते हैं, वहीं दूसरी तरफ सड़कों पर घूमते ये पशु दुर्घटनाओं का कारण बनते हैं। अब एमपी सरकार प्रदेशभर में गोवंशीय और भैंसवंशीय पशुओं के लिए अलग-अलग रंगों के टैग लगाने जा रही है। इस पूरे मामले पर पशुपालन मंत्री लखन पटेल ने दैनिक भास्कर से बातचीत की। सवाल: बेसहारा जानवरों की पहचान के लिए क्या योजना है? जवाब: हम लोगों ने केंद्र सरकार को सुझाव देते हुए पत्र लिखा था कि गोशाला, निराश्रित और पालतू जानवरों के लिए अलग-अलग रंग के टैग हों। दो रंग के टैग को लेकर केंद्र से सहमति मिल गई है। बहुत जल्द केंद्र हमें ये टैग उपलब्ध कराएगा। टैग लगने से पशुओं की पहचान हो सकेगी। रंग के आधार पर आम लोग समझ पाएंगे कि पशु निराश्रित है या पालतू। यदि पालतू होगा तो उसके टैग से पहचान हो जाएगी कि वह किसी का है या उसे छोड़ा गया है। इससे पशुओं की पहचान आसान होगी और धीरे-धीरे इसके सकारात्मक परिणाम सामने आएंगे। सवाल: प्रदेश भर में कुल कितने पशु हैं? जवाब: प्रदेशभर में गोवंश और भैंसवंशीय नस्ल के पशुओं की बात करें तो दोनों को मिलाकर लगभग 2 करोड़ 90 लाख जानवर हैं। इनमें से 1 करोड़ 57 लाख गोवंश हैं और शेष भैंसवंशीय हैं। सवाल: अच्छी नस्ल के जानवरों की संख्या कितनी है?
जवाब: अगर ब्रीडेड और अनब्रीडेड की बात करें, यानी अच्छी नस्ल की गायों की तो हमारे पास 30% से ज्यादा नहीं हैं। बाकी 70 प्रतिशत देशी नस्ल की अवर्णित गायें हैं। इनके लिए नस्ल सुधार का काम किया जाएगा, जिससे दूध उत्पादन बढ़ाया जा सके। गुजरात की तुलना में हमारे यहां पशुओं की संख्या ज्यादा है, लेकिन वहां दुग्ध उत्पादन अधिक है। इसका कारण यह है कि वहां गाय और भैंसें बेहतर नस्ल की हैं, जो ज्यादा दूध देती हैं। वहीं, हमारे यहां बड़ी संख्या में कमजोर नस्ल के पशु हैं। यही गुजरात और मध्य प्रदेश के बीच मुख्य अंतर है। सवाल: स्वावलंबी गोशालाओं में क्या नस्ल सुधार करेंगे?
जवाब: इसमें नस्ल सुधार सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है और इससे लाभ भी होगा। यदि किसी ने 25 हजार गायें रखी हैं और वह सालभर में डेढ़ से दो हजार अच्छी नस्ल की बछिया तैयार कर लेता है, तो आने वाले तीन वर्षों में उसे अच्छा आर्थिक लाभ मिलेगा। यदि एक गाय की कीमत एक लाख रुपए मानी जाए, तो उसे करीब डेढ़ से दो करोड़ रुपए तक की आय हो सकती है। सवाल: स्वावलंबी गोशाला में आमदनी बढ़ाने के लिए और क्या योजना है? जवाब: स्वावलंबी गोशाला बनाने के लिए कई प्रकार के काम किए जाएंगे। इसमें सोलर प्लांट, ब्रीडिंग, दुग्ध उत्पादन, सीएनजी निर्माण और खाद उत्पादन शामिल हैं। इसके साथ ही गोशालाओं को पर्यटन से भी जोड़ा जाएगा। यदि गोशाला किसी नदी के किनारे स्थित है, तो वहां हट्स बनाए जा सकते हैं और पर्यटकों के लिए बोटिंग जैसी सुविधाएं शुरू की जा सकती हैं। वर्तमान में ग्रामीण पर्यटन का कॉन्सेप्ट तेजी से बढ़ रहा है, ऐसे में लोग वहां आकर ठहर सकेंगे। इसके लिए होम-स्टे की व्यवस्था भी की जाएगी, जिससे पर्यटक रुक सकें और गोशाला की आमदनी में भी बढ़ोतरी हो सके। मंत्री बोले- 5 हजार से ज्यादा क्षमता वाली गोशालाएं बन रही हैं पशुपालन मंत्री ने बताया कि प्रदेश में स्वावलंबी गोशालाओं की स्थापना नीति-2025 लागू की गई है। इसके अंतर्गत नगरीय क्षेत्रों में उपलब्ध गोवंश के आश्रय और भरण-पोषण के लिए 5 हजार से ज्यादा क्षमता वाली बड़ी गोशालाएं स्थापित की जा रही हैं। आगर मालवा, इंदौर, ग्वालियर और उज्जैन जिलों में आदर्श गोशालाएं स्थापित की जा चुकी हैं, जबकि भोपाल, जबलपुर और सागर में इनका निर्माण काम चल रहा है। ग्वालियर स्थित आदर्श गौशाला में देश का पहला 100 टन क्षमता वाला सीएनजी प्लांट स्थापित किया जा रहा है। गौशालाओं को प्रति गोवंश 40 रुपए चारा-भूसा के लिए दिया जा रहा अनुदान पशुपालन मंत्री ने बताया कि गोसंवर्धन बोर्ड के माध्यम से गोशालाओं को चारा-भूसा अनुदान के लिए 505 करोड़ रुपए के बजट का प्रावधान किया गया है। गोशालाओं में गोवंश के बेहतर आहार की व्यवस्था के लिए प्रति गोवंश दी जाने वाली सहायता राशि 20 रुपए प्रतिदिन से बढ़ाकर 40 रुपए प्रतिदिन कर दी गई है। घायल और असहाय गायों के लिए हाइड्रोलिक कैटल लिफ्टिंग वाहनों की व्यवस्था भी की जा रही है।
