जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला की शादी हो, एक्ट्रेस सारा अली खान की केदारनाथ में पूजा-अर्चना या फिर उत्तराखंड के एक हिंदू युवक का नाम के आगे ‘मोहम्मद’ जोड़ना। निजी जिंदगी और आस्था से जुड़े इन तीनों मामलों पर बरेली से एक के बाद एक तीन फतवे जारी हुए हैं। ऑल इंडिया मुस्लिम जमात के राष्ट्रीय अध्यक्ष मौलाना मुफ्ती शहाबुद्दीन रजवी बरेलवी ने महज तीन दिनों के भीतर तीन फतवे जारी कर इन्हें शरीयत के खिलाफ, नाजायज और हराम करार दिया है। दो बालिगों की रजामंदी और निजी आस्था के मामलों पर जारी इन फतवों के बाद अब सियासी और सामाजिक हलकों में तीखी बहस छिड़ गई है। 1. उमर अब्दुल्ला-निधि राजदान विवाह: बिना धर्म परिवर्तन निकाह ‘नाजायज’
मौलाना शहाबुद्दीन रजवी ने जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला और पूर्व पत्रकार निधि राजदान के रिश्ते को शरीयत के खिलाफ बताया है। मौलाना का कहना है कि यह विवाह इस्लामी कायदे-कानून के तहत पूरी तरह नाजायज है।
शरीयत के बुनियादी उसूलों का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि निकाह की पहली शर्त लड़का और लड़की दोनों का कलमा पढ़कर इस्लाम का अनुयायी होना है। यदि दोनों में से कोई एक भी गैर-मुस्लिम रहता है, तो वह शादी मान्य नहीं हो सकती। उमर अब्दुल्ला मुस्लिम हैं जबकि निधि राजदान गैर-मुस्लिम, लिहाजा यह रिश्ता शादी नहीं बल्कि गैर-शरई है। मौलाना के अनुसार, उमर अब्दुल्ला को शादी से पहले निधि राजदान को कलमा पढ़वाकर बाकायदा इस्लाम कबूल करवाना चाहिए था। चूंकि धर्म परिवर्तन नहीं हुआ, इसलिए यह निकाह इस्लाम की नजर में पूरी तरह अमान्य है। 2. केदारनाथ में पूजा पर सारा अली खान के खिलाफ फतवा: ‘शरीयत में मंदिर जाना हराम’
बॉलीवुड एक्ट्रेस सारा अली खान के केदारनाथ धाम जाकर दर्शन और पूजा करने पर मौलाना ने दूसरा फतवा जारी किया। मौलाना ने साफ कहा कि शरीयत की रोशनी में किसी भी मुस्लिम के लिए मंदिर जाना, दर्शन करना या पूजा-अर्चना करना पूरी तरह नाजायज और हराम है।
देशभर के मुस्लिम नौजवानों के सवालों का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि इस्लाम अपने मानने वालों को शिर्क (मूर्ति पूजा या गैर-इस्लामी धार्मिक अनुष्ठान) की इजाजत कतई नहीं देता। सारा ने मंदिर जाकर आधे घंटे तक बाकायदा पूजा-पाठ किया, जो शरीयत के नियमों का सीधा उल्लंघन है। मौलाना ने दो टूक कहा कि इस कृत्य के बाद सारा अली खान शरीयत की नजर में मुजरिम और बड़े गुनाह की भागीदार बन चुकी हैं। उन्हें फौरन खुदा की बारगाह में सच्चे दिल से माफी मांगकर तौबा करनी चाहिए। 3. ‘मोहम्मद दीपक’ नाम पर ऐतराज: बिना ईमान के मुकद्दस नाम का इस्तेमाल गलत
तीसरा फतवा उत्तराखंड के कोटद्वार निवासी दीपक कुमार के खिलाफ आया, जिन्होंने अपने नाम के आगे ‘मोहम्मद’ जोड़ा था। मौलाना ने दो टूक कहा कि शरीयत में किसी भी गैर-मुस्लिम के लिए अपने नाम के साथ ‘मोहम्मद’ लगाना पूरी तरह ममनू (वर्जित) है।
मौलाना ने दलील दी कि ‘मोहम्मद’ कोई साधारण शब्द नहीं, बल्कि पैगंबर-ए-इस्लाम का बेहद मुकद्दस, बरकत और गरिमा वाला नाम है। इस नाम को रखने का हक सिर्फ उसी को है जो इस्लाम और कुरान पर ईमान रखता हो। हालांकि दीपक ने एक बुजुर्ग मुस्लिम के समर्थन में जज्बात में आकर यह नाम रखा था, लेकिन मजहबी उसूलों से समझौता नहीं हो सकता। मौलाना ने साफ किया कि अगर कोई मर्जी से इस्लाम कबूल करे तभी यह नाम जायज है, वरना दीपक को अपने मूल नाम और असल पहचान के साथ ही जीना चाहिए।
बरेलवी मरकज से जुड़े उलेमा इन फतवों को इस्लामी उसूलों की हिफाजत बता रहे हैं, वहीं सामाजिक और राजनीतिक हलकों में इसे व्यक्तिगत फैसलों और निजी आजादी में सीधा दखल माना जा रहा है। एक मुख्यमंत्री, एक मशहूर अदाकारा और एक आम नागरिक के नाम पर आए इन फतवों ने सोशल मीडिया से लेकर सियासी गलियारों तक नया विवाद खड़ा कर दिया है।
