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इंजीनियरिंग कॉलेज के शिक्षक बने छत्तीसगढ़ के पहले CM:फिजिक्स लेक्चरर से डिप्टी सीएम बने विजय शर्मा, ब्लैकबोर्ड से विधानसभा तक का सफर देखिए

छत्तीसगढ़ की राजनीति में ऐसे कई चेहरे हैं, जिनके करियर की शुरुआत पॉलिटिक्स से नहीं, बल्कि क्लासरूम से हुई। कभी हाथ में चॉक और सामने बच्चों की क्लास होती थी, लेकिन वक्त के साथ इन नेताओं ने शिक्षक की नौकरी छोड़कर राजनीति का रास्ता चुना। इसके बाद किसी ने विधायक बनकर अपनी पहचान बनाई, तो किसी ने मंत्री की जिम्मेदारी संभाली और कोई पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष जैसे अहम पद तक पहुंचा। यानी बच्चों को पढ़ाने से शुरू हुआ सफर आगे चलकर छत्तीसगढ़ की राजनीति में बड़ी जिम्मेदारियों तक पहुंचा। क्लासरूम से सियासत तक का सफर इन नेताओं में किसी के हाथ में कभी चॉक हुआ करता था, तो किसी के हाथ में रजिस्टर। क्लासरूम में सामने बैठे बच्चों को पढ़ाते थे, उन्हें सवालों के जवाब समझाते थे और जिंदगी में आगे बढ़ने का रास्ता बताते थे। लेकिन वक्त बदला और इन शिक्षकों की जिंदगी ने भी करवट ली। क्लासरूम से निकलकर ये लोग राजनीति के मैदान में आए और फिर जनता के बीच अपनी जगह बनाई। छत्तीसगढ़ की राजनीति में ऐसे कई नाम हैं, जिन्होंने राजनीति में आने से पहले शिक्षक की भूमिका निभाई। कोई स्कूल में बच्चों को पढ़ाता था, कोई कॉलेज में लेक्चरर था, तो कोई शिक्षाकर्मी रहा। शिक्षक दिवस पर बात ऐसे ही नेताओं की, जिन्होंने कभी ब्लैकबोर्ड पर बच्चों का भविष्य लिखने में मदद की और बाद में राजनीति के मैदान में अपना भविष्य लिखा। रामविचार नेताम: सरकारी शिक्षक से मंत्री तक का सफर बलरामपुर के सनावल गांव से आने वाले नेताम की शुरुआती जिंदगी बहुत सामान्य थी। पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्हें नौकरी मिली, लेकिन उन्होंने बैंक की नौकरी के बजाय शिक्षक बनना चुना रामविचार नेताम बलरामपुर इलाके के रामचंद्रपुर ब्लॉक के चाकी गांव के शासकीय प्राथमिक स्कूल में शिक्षक रहे। यानी राजनीति में आने से पहले उनका रोज का काम बच्चों को पढ़ाना था। गांव में रहते हुए ही उनका सामाजिक जुड़ाव बढ़ा और लोगों के बीच काम करने का मौका मिला। फिर धीरे-धीरे शिक्षक से सामाजिक कार्यकर्ता और उसके बाद नेता बनने का सफर शुरू हुआ। 1990 में उन्होंने पहली बार विधानसभा चुनाव लड़ा। उस वक्त छत्तीसगढ़ अलग राज्य नहीं बना था और क्षेत्र मध्यप्रदेश का हिस्सा था। चुनाव जीता तो राजनीति उनकी जिंदगी का स्थायी हिस्सा बन गई।इसके बाद वे लगातार बड़े होते गए। विधायक बने, राज्य और केंद्र की राजनीति में जिम्मेदारियां संभालीं और कई बार मंत्री रहे। आज वे छत्तीसगढ़ सरकार में मंत्री हैं। यानी जिस शख्स ने कभी प्राथमिक स्कूल के बच्चों को पढ़ाया, वही आगे चलकर राज्य की सरकार में फैसले लेने वाली टीम का हिस्सा बना। विजय शर्मा: फिजिक्स की क्लास से डिप्टी सीएम की कुर्सी तक कवर्धा से आने वाले विजय शर्मा ने भौतिक शास्त्र यानी फिजिक्स में एमएससी की। पढ़ाई पूरी करने के बाद 1996 से 1998 के बीच उन्होंने रायपुर के सेंट्रल कॉलेज, प्रगति कॉलेज और इंजीनियरिंग कॉलेज में लेक्चरर के तौर पर काम किया। वहां वे फिजिक्स पढ़ाते थे। मतलब उस दौर में उनका दिन राजनीति के मंच पर नहीं, बल्कि कॉलेज की क्लास में बीतता था। सामने छात्र होते थे, विषय फिजिक्स होता था और काम था उन्हें समझाना। हालांकि छात्र जीवन से ही उनका राजनीति से जुड़ाव था। अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के जरिए वे सक्रिय राजनीति की तरफ बढ़े। बाद में संगठन में जिम्मेदारियां बढ़ती गईं। 2023 में भाजपा ने उन्हें कवर्धा से विधानसभा चुनाव में उतारा। उन्होंने तत्कालीन मंत्री मोहम्मद अकबर को हराकर पहली बार विधानसभा में कदम रखा। और पहली ही बार विधायक बनने के बाद कहानी यहीं नहीं रुकी। उन्हें राज्य सरकार में उपमुख्यमंत्री की जिम्मेदारी मिली। आज विजय शर्मा के पास सरकार की बड़ी जिम्मेदारियां हैं। लेकिन उनके राजनीतिक सफर के पीछे एक ऐसा दौर भी है, जब वे रायपुर के कॉलेजों में फिजिक्स के लेक्चरर हुआ करते थे। टंकराम वर्मा: सरकारी शिक्षक से कैबिनेट मंत्री टंकराम वर्मा की कहानी भी क्लासरूम से शुरू होती है। उन्होंने उच्च शिक्षा हासिल करने के बाद सरकारी शिक्षक के रूप में काम किया। बाद में वे शिक्षा विभाग की नौकरी से रिटायर हुए। उनके करियर का यह हिस्सा इसलिए भी दिलचस्प है क्योंकि राजनीति में आने से पहले उन्होंने गांव-कस्बे की शिक्षा व्यवस्था को बहुत करीब से देखा। शिक्षक की नौकरी के दौरान ही उनका सामाजिक और राजनीतिक जुड़ाव बढ़ता गया। आगे चलकर वे भाजपा से जुड़े और संगठन में काम करते रहे। एक समय ऐसा भी आया जब वे भाजपा के वरिष्ठ नेता रमेश बैस के साथ जुड़े और बाद में मंत्री के निजी सहायक के रूप में भी काम किया। यानी एक तरफ स्कूल की नौकरी का अनुभव था, दूसरी तरफ राजनीति और संगठन को करीब से देखने का मौका। 2023 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने उन्हें बलौदाबाजार से मैदान में उतारा। उन्होंने जीत दर्ज की और पहली बार विधानसभा पहुंचे। इसके बाद जिस नेता ने कभी सरकारी स्कूल में बच्चों को पढ़ाया था, वही छत्तीसगढ़ सरकार में कैबिनेट मंत्री की कुर्सी तक पहुंच गया। शिक्षक से मंत्री बनने का यह सफर शायद उनकी कहानी का सबसे बड़ा मोड़ है। मोहन मरकाम: शिक्षाकर्मी से प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष और मंत्री तक मोहन मरकाम की कहानी थोड़ी अलग है। वे नियमित सरकारी शिक्षक नहीं, बल्कि शिक्षाकर्मी के तौर पर शिक्षा विभाग से जुड़े रहे। उन्होंने शिक्षाकर्मी वर्ग-1 और वर्ग-2 के रूप में काम किया। यानी राजनीति में पूरी तरह आने से पहले उनका एक बड़ा हिस्सा स्कूल और शिक्षा व्यवस्था के बीच गुजरा। छात्र जीवन से ही उनका राजनीतिक झुकाव था। लेकिन राजनीति में सक्रिय भूमिका बढ़ने के साथ उन्होंने सरकारी नौकरी छोड़ दी। 1990 में कांग्रेस की प्राथमिक सदस्यता लेने के बाद उनका राजनीतिक सफर आगे बढ़ा। शुरुआती दौर में टिकट नहीं मिली, चुनावी कोशिशें हुईं, लेकिन मंजिल तुरंत नहीं मिली। फिर 2008 में वे कोंडागांव से विधानसभा पहुंचे। इसके बाद उनका राजनीतिक कद लगातार बढ़ता गया। 2019 में उन्हें छत्तीसगढ़ कांग्रेस का प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया। इसके बाद 2023 में उन्हें भूपेश बघेल सरकार में मंत्री भी बनाया गया। यानी कभी स्कूल में शिक्षाकर्मी के तौर पर काम करने वाला एक युवा आगे चलकर प्रदेश की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टियों में से एक का प्रदेश अध्यक्ष बना और फिर सरकार में मंत्री भी। डोमनलाल कोर्सेवाड़ा: 26 साल पढ़ाया, रिटायरमेंट के बाद राजनीति में आए डोमनलाल कोर्सेवाड़ा की कहानी शायद इस पूरी सूची में सबसे लंबी शिक्षक पारी वाली कहानियों में से एक है। उन्होंने 1972 में सहायक शिक्षक के रूप में नौकरी शुरू की। शुरुआत प्राथमिक शाला साजा, गुंडरदेही ब्लॉक से हुई। इसके बाद 1987 में वे उच्च श्रेणी शिक्षक बने और आगे चलकर व्याख्याता के पद तक पहुंचे। करीब 26 साल तक शिक्षा के क्षेत्र में काम करने के बाद 1998 में वे व्याख्याता के पद से रिटायर हुए। लेकिन नौकरी से रिटायर होने के बाद सार्वजनिक जीवन से रिटायर नहीं हुए। राजनीति और सामाजिक गतिविधियों से उनका जुड़ाव पहले से था। बाद में भाजपा की राजनीति में सक्रिय हुए और 2023 में अहिवारा से चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचे। यानी जिस व्यक्ति ने 1972 में शिक्षक के रूप में करियर शुरू किया था, उसने करीब ढाई दशक बाद राजनीति में एक नई पारी शुरू की। रामपुकार सिंह: शिक्षक की नौकरी से लंबी राजनीतिक पारी पत्थलगांव की राजनीति का बड़ा नाम रामपुकार सिंह भी कभी शिक्षक हुआ करते थे। राजनीति में आने से पहले उन्होंने शिक्षक का पेशा संभाला। बाद में सार्वजनिक जीवन में सक्रिय हुए और पत्थलगांव की राजनीति में उनकी पकड़ लगातार मजबूत होती गई। उनका राजनीतिक सफर बाकी कई नेताओं से लंबा रहा है। वे कई बार विधायक बने और विधानसभा में वरिष्ठ सदस्यों में गिने गए। 2018 में तो विधानसभा में उन्हें प्रोटेम स्पीकर की जिम्मेदारी भी दी गई थी। यानी जिनका करियर कभी शिक्षक के रूप में शुरू हुआ था, वे आगे चलकर विधानसभा के वरिष्ठतम चेहरों में शामिल हुए। यह कहानी बताती है कि राजनीति में आने के बाद भी शिक्षक की नौकरी से मिला अनुशासन और लंबे समय तक लोगों के बीच काम करने का अनुभव किस तरह किसी नेता के सफर में काम आ सकता है। चंद्रदेव राय: शिक्षाकर्मी आंदोलन से विधानसभा तक चंद्रदेव राय की कहानी सीधे उस दौर से जुड़ती है जब छत्तीसगढ़ में शिक्षाकर्मियों का आंदोलन बड़ा मुद्दा हुआ करता था। उन्होंने 2003 में शिक्षाकर्मी के रूप में नौकरी शुरू की और लगातार अध्यापन कार्य किया। बाद में वे शिक्षाकर्मी संगठन से जुड़े और कर्मचारी नेता के तौर पर भी सक्रिय हुए। यानी स्कूल में पढ़ाने के साथ-साथ वे शिक्षाकर्मियों की समस्याओं और उनके अधिकारों की आवाज उठाने लगे। यही सक्रियता धीरे-धीरे उन्हें राजनीति की तरफ ले गई। 2018 में कांग्रेस के टिकट पर बिलाईगढ़ विधानसभा से चुनाव लड़ा और पहली बार विधायक बने। इसके बाद वे संसदीय सचिव भी रहे। उनकी कहानी में एक खास बात यह है कि वे सिर्फ शिक्षक से सीधे नेता नहीं बने, बल्कि शिक्षाकर्मी आंदोलन के रास्ते राजनीति तक पहुंचे। सावित्री मंडावी: क्लासरूम से चुनावी मैदान तक सावित्री मंडावी की कहानी भी शिक्षक दिवस के मौके पर खास तौर पर याद करने लायक है। वे रायपुर के कटोरा तालाब स्थित एक सरकारी स्कूल में लैक्चरर थीं। यानी राजनीति में आने से पहले उनकी दुनिया भी क्लासरूम और बच्चों के बीच थी। उनके पति मनोज मंडावी के निधन के बाद 2022 में भानुप्रतापपुर विधानसभा सीट के उपचुनाव की घोषणा हुई। इसके बाद उन्होंने शिक्षिका की नौकरी से इस्तीफा दिया और राजनीति के मैदान में उतर गईं। कांग्रेस ने उन्हें उम्मीदवार बनाया और उन्होंने चुनाव जीत लिया। इसके बाद एक शिक्षिका सीधे विधानसभा की सदस्य बन गईं। आज भी जब वे विधानसभा में बोलती हैं तो उनके परिचय में यह बात जुड़ी रहती है कि राजनीति में आने से पहले वे शिक्षिका थीं। चातुरी नंद: व्याख्याता की नौकरी छोड़ी, राजनीति में उतरीं सरायपाली की विधायक चातुरी नंद राजनीति में आने से पहले वे शासकीय व्याख्याता थीं। सरकारी नौकरी छोड़कर उन्होंने राजनीति का रास्ता चुना। 2023 में कांग्रेस ने उन्हें सरायपाली से टिकट दिया। पहली बार विधानसभा चुनाव लड़ा और पहली ही कोशिश में जीत हासिल कर विधायक बन गईं। उनके शिक्षक वाले दौर की एक तस्वीर 2024 में फिर देखने को मिली। अपने बचपन के स्कूल पहुंचीं तो खुद को बच्चों से दूर नहीं रख पाईं और क्लासरूम में जाकर करीब 30 मिनट तक बच्चों को साइंस पढ़ाया। यानी विधायक बनने के बाद भी शिक्षक वाली भूमिका उनसे पूरी तरह अलग नहीं हुई। विक्रम उसेंडी: शिक्षक से प्रदेश भाजपा अध्यक्ष तक विक्रम उसेंडी ने भी राजनीति में आने से पहले शिक्षक के तौर पर काम किया। पढ़ाने की नौकरी के बाद उनका जुड़ाव भाजपा संगठन से बढ़ा और धीरे-धीरे वे सक्रिय राजनीति में आ गए। इसके बाद उन्होंने चुनावी राजनीति में अपनी जगह बनाई। वे विधायक बने, फिर लोकसभा पहुंचे और सांसद के तौर पर भी काम किया। संगठन में उनकी जिम्मेदारियां भी बढ़ती गईं और उन्हें प्रदेश भाजपा अध्यक्ष की कमान भी मिली। लंबे राजनीतिक सफर के बाद एक बार फिर वे विधानसभा की राजनीति में हैं। यानी जिस सफर की शुरुआत कभी शिक्षक के रूप में हुई थी, वह विधायक, सांसद और प्रदेश भाजपा अध्यक्ष की जिम्मेदारियों से गुजरते हुए फिर विधानसभा तक पहुंचा। अजीत जोगी: शिक्षक से मुख्यमंत्री तक का सफर शिक्षक से राजनीति में आने वालों में सबसे बड़ा नाम अजीत जोगी का रहा। छत्तीसगढ़ के पहले मुख्यमंत्री बनने से पहले जोगी ने रायपुर के इंजीनियरिंग कॉलेज में अध्यापन किया था। 1964-65 के दौरान वे इंजीनियरिंग कॉलेज में पढ़ाते थे। इसके बाद उन्होंने भारतीय प्रशासनिक सेवा का रास्ता चुना और आईएएस अधिकारी बने। बाद में आईएएस की नौकरी छोड़कर सक्रिय राजनीति में आए। कांग्रेस के टिकट पर लोकसभा पहुंचे, राज्यसभा सांसद रहे और राष्ट्रीय स्तर पर पार्टी में कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभालीं। 2000 में छत्तीसगढ़ अलग राज्य बना तो वे इसके पहले मुख्यमंत्री बने। उनकी पत्नी डॉ. रेणु जोगी का भी शिक्षा से जुड़ाव रहा। राजनीति में आने से पहले वे इंदौर और रायपुर के मेडिकल कॉलेजों में नेत्र विभाग में प्रोफेसर थीं। बाद में कोटा से विधायक बनीं। यानी एक ही परिवार में पति पहले कॉलेज में पढ़ाते रहे और आगे चलकर मुख्यमंत्री बने, जबकि पत्नी मेडिकल कॉलेज की प्रोफेसर से विधायक बनीं। शिक्षक से नेता बने कई और चेहरे… शिक्षक से राजनीति में आने वालों की फेहरिस्त सिर्फ मौजूदा नेताओं तक सीमित नहीं है। छत्तीसगढ़ की राजनीति में कई ऐसे चेहरे रहे हैं, जिन्होंने पहले स्कूल या कॉलेज में पढ़ाया और बाद में चुनावी राजनीति में उतरकर विधायक, सांसद और मंत्री तक का सफर तय किया। पूर्व केंद्रीय मंत्री और आदिवासी नेता अरविंद नेताम भी शिक्षक से नेता बने। राजनीति में आने से पहले उन्होंने अध्यापन का काम किया। इसके बाद सक्रिय राजनीति में आए और कांकेर से कई बार सांसद रहे। वे 4 बार विधायक भी रहे और केंद्र सरकार में मंत्री की जिम्मेदारी संभाली। डॉ. शक्राजीत नायक कॉलेज में प्रोफेसर रहे। बाद में राजनीति में आए और रायगढ़ से विधायक चुने गए। वे छत्तीसगढ़ सरकार में मंत्री भी रहे। खास बात यह रही कि उनका राजनीतिक सफर भाजपा और कांग्रेस, दोनों दलों से जुड़ा रहा। नंदकुमार साय भी राजनीति में आने से पहले शिक्षक रहे। बाद में भाजपा के बड़े आदिवासी नेताओं में शामिल हुए। वे कई बार सांसद रहे और भाजपा के राष्ट्रीय स्तर पर भी महत्वपूर्ण पदों पर रहे। बाद में उन्होंने कांग्रेस का दामन थामा और राज्य सरकार में भी जिम्मेदारी संभाली। पूर्व विधायक देवलाल दुग्गा भी शिक्षक रहे। राजनीति में आने के बाद विधायक बने और आगे चलकर अनुसूचित जाति-जनजाति आयोग के अध्यक्ष की जिम्मेदारी भी संभाली। सिद्धनाथ पैकरा भी शिक्षक से राजनीति में आए नेताओं में रहे। वे सामरी विधानसभा सीट से विधायक रहे और रमन सिंह सरकार के दौरान संसदीय सचिव की जिम्मेदारी संभाली। उनके राजनीतिक सफर में चुनावी जीत के साथ हार का दौर भी आया। पुराने दौर के कई आदिवासी और ग्रामीण इलाकों के नेताओं की राजनीति की शुरुआत भी स्कूलों से हुई। झतिरूराम बघेल, राजाराम तोड़ेम, अंतूराम कश्यप, भुसरूराम नाग, अघन सिंह ठाकुर, मंतूराम पवार, संपत सिंह भंडारी और डॉ. रामलाल भारद्वाज जैसे नाम भी शिक्षक या मास्टर के रूप में काम करने के बाद राजनीति में आए। इसी कड़ी में कृष्ण कुमार ध्रुव का नाम भी आता है। वे पहले शिक्षक थे और बाद में राजनीति में सक्रिय हुए। विधायक बनने के बाद विधानसभा तक पहुंचे। इन नेताओं के राजनीतिक सफर का दौर अलग-अलग रहा। किसी ने पंचायत और स्थानीय राजनीति से शुरुआत की, किसी ने विधानसभा का चुनाव लड़ा तो किसी ने लोकसभा तक का सफर तय किया। लेकिन इनके राजनीतिक जीवन की शुरुआत राजनीति की कुर्सी से नहीं, बल्कि स्कूल की कक्षा से हुई थी। शिक्षक दिवस पर इन नेताओं की कहानी इसलिए भी खास है, क्योंकि ये सिर्फ राजनीति में पहुंचे शिक्षकों की कहानी नहीं है। ये उस सफर की कहानी है, जिसमें एक शिक्षक पहले बच्चों का भविष्य संवारने की कोशिश करता है और बाद में पूरे समाज के लिए काम करने की जिम्मेदारी उठाता है। …………………… शिक्षकों से जुड़ी ये खबर भी पढ़ें… टीचर्स डे, 68 शिक्षक होंगे सम्मानित, 4 को स्मृति पुरस्कार:खैरागढ़ के राजेश, कोरबा के कामता, दुर्ग की प्रज्ञा और सारंगढ़ की प्रियंका का चयन 5 सितंबर टीचर्स डे पर छत्तीसगढ़ के 68 शिक्षकों को राज्य शिक्षक सम्मान से सम्मानित किया जाएगा। शिक्षा के क्षेत्र में नए प्रयोग के लिए इनमें से 4 शिक्षकों को स्मृति पुरस्कार भी दिया जाएगा। राज्य शिक्षक सम्मान और स्मृति पुरस्कार समारोह शनिवार को रायपुर के लोकभवन स्थित छत्तीसगढ़ मंडपम में सुबह 11 बजे होगा। पढ़ें पूरी खबर

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