सच्ची बात, बेधड़क। दैनिक भास्कर भोपाल संस्करण के 68 वर्ष पूरे होने पर हम 11 दिन तक हर सुबह भोपाल की नई कहानी, अनदेखे पहलू की एक विशेष शृंखला लेकर आए हैं। हम आपको भोपाल के सबसे बड़े बदलावों, शहर को जीवन देने वाली धरोहरों पर विशेषज्ञों के मंथन, पुराने दस्तावेजों और दुर्लभ अभिलेखों की पड़ताल से निकले अनकहे सच, तथ्यों पर आधारित एक्सक्लूसिव खुलासों और दुर्लभ तस्वीरों के संग्रह से रूबरू कराएंगे। पढ़िए आज की कहानी… मेरे प्रिय सरदार पटेल, जब तक आपको यह पत्र मिलेगा, आप यह समाचार सुन चुके होंगे कि मैंने भारतीय संघ में शामिल होने का निर्णय ले लिया है। इसलिए मुझे लगता है कि यदि मैं आपको व्यक्तिगत रूप से राज्यों के विभाग के मंत्री के रूप में और उस डोमिनियन के प्रति अपने दृष्टिकोण को स्पष्ट करने के लिए लिखूं, जिसमें भोपाल राज्य शामिल होने के लिए सहमत हो गया है तो इससे हमारे संबंधों में मदद मिलेगी। 22 तारीख को हमारी बातचीत के दौरान आपने आश्चर्य व्यक्त किया था कि मैंने आपकी योजना का इतना विरोध क्यों किया। मैं यह तथ्य नहीं छिपाना चाहता कि जब तक संघर्ष चल रहा था, मैंने अपनी रियासत की स्वतंत्रता और तटस्थता बनाए रखने के लिए अपनी शक्ति में मौजूद हर साधन का इस्तेमाल किया। अब जबकि मैंने अपनी हार स्वीकार कर ली है, तो मुझे आशा है कि आप मुझे उतना ही पक्का दोस्त पाएंगे, जितना कि मैं एक कट्टर विरोधी रहा हूं। मैं किसी के प्रति कोई दुर्भावना नहीं रखता, क्योंकि पूरे समय मेरे साथ सम्मानपूर्वक व्यवहार किया गया और आपकी ओर से मुझे समझदारी और शिष्टाचार मिला है। अब मैं आपको बताना चाहता हूं कि जब तक आप देश की विघटनकारी शक्तियों के खिलाफ अपना वर्तमान कड़ा रुख बनाए रखेंगे और राज्यों के मित्र बने रहेंगे, आप मुझे एक वफादार और विश्वसनीय सहयोगी के रूप में पाएंगे। अब जबकि मैं भारत संघ के साथ हूं, मेरा प्रभाव हमेशा डोमिनियन सरकार के समर्थन में और जाति, पंथ या धर्म के भेदभाव के बिना देशद्रोही तत्वों का मुकाबला करने में इस्तेमाल होगा। मैं आपके साथ खड़ा रहूंगा और यदि आपको कभी सांप्रदायिक सद्भाव बनाए रखने में मेरी सहायता चाहिए, तो आपको बस एक शब्द कहना होगा। शायद जब मैं अगली बार दिल्ली में हूं, तो हम आगे बात कर सकते हैं।’ -आपका, हमीदुल्ला पटेल का जवाब- आपकी रियासत के भारतीय राष्ट्र में विलय को मैं न तो अपनी जीत मानता हूं, न ही आपकी हार। अंततः विजय न्याय एवं उपयुक्तता की हुई है। स्थिति की महत्ता को समझने और ईमानदारी तथा साहस के साथ अपने पुराने रुख को बदलने के लिए आप श्रेय के पात्र हैं। मुझे आपके इस आश्वासन से विशेष प्रसन्नता हुई है कि देश के गद्दारों से निपटने में आप देश साथ देंगे। पिछले कुछ महीनों में मेरे लिए यह बहुत निराशा और दुख की बात रही कि आपकी असंदिग्ध योग्यता व प्रतिभा नाजुक समय में देश को उपलब्ध नहीं थी, इसलिए सहयोग व मैत्री का आपका आश्वासन और अधिक महत्त्वपूर्ण हो गया है।’ स्रोत : रफीक जकरिया की पुस्तक ‘सरदार पटेल और भारतीय मुसलमान’। इस पुस्तक में नवाब के पत्र और सरदार पटेल के उत्तर का विस्तृत विवरण दिया गया है। (कल पार्ट 7 में पढ़िए नई कहानी)
