केतन-सिया, राजा रघुवंशी-सोनम और आगरा में सुरेंद्र हत्याकांड जैसे चर्चित मामलों ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या अंतरंग रिश्तों में हिंसा पहले से ज्यादा खतरनाक होती जा रही है। एक्सपर्ट की मानें तो पिछले सात-आठ वर्षों में पुरुषों के साथ मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना से जुड़े मामलों में 60 से 70 फीसदी तक बढ़ोतरी दर्ज की गई है। वहीं, हत्या या गंभीर हिंसा जैसे विचारों के साथ इलाज के लिए आने वाले मरीजों की संख्या भी महीने में एक-दो से बढ़कर पांच से दस तक पहुंच गई है। विशेषज्ञों का कहना है कि बदलती सामाजिक परिस्थितियां, सोशल मीडिया का बढ़ता प्रभाव, न्यूक्लियर फैमिली, रिश्तों में संवाद की कमी और विवाहेतर संबंधों से पैदा होने वाले टकराव कई मामलों में हिंसक सोच को जन्म दे रहे हैं। हालांकि वे यह भी स्पष्ट करते हैं कि अपराध को किसी एक लिंग या मानसिक बीमारी से जोड़कर देखना न तो सही है और न ही वैज्ञानिक। दैनिक भास्कर ने ऐसे केस को लेकर एक्सपर्ट से बात की, ऐसे केस को भी समझने की कोशिश की… सबसे पहले वो केस जिन्होंने समाज को डराया केस स्टडी-1: पत्नी ने खुद कहा- ‘डर है कहीं पति की हत्या न कर दूं’ डॉ. त्रिवेदी ने बताया कि उनके पास एक दंपती उपचार के लिए आया था। पत्नी की उम्र करीब 23 वर्ष और पति की उम्र 25 वर्ष थी। दोनों आईटी प्रोफेशनल थे। महिला ने स्वयं स्वीकार किया कि उसके मन में कई बार अपने पति की हत्या करने जैसे विचार आते हैं और उसे डर है कि कहीं वह ऐसा कर न बैठे। जांच में पता चला कि वह लंबे समय से अपनी भावनाएं व्यक्त नहीं कर पा रही थी और उसके व्यक्तित्व से जुड़ी कुछ समस्याएं भी थीं। इसके बाद उसे उपचार के साथ कपल काउंसलिंग दी गई। पिछले तीन-चार महीनों से इलाज के बाद उसकी स्थिति में सुधार है और ऐसे हिंसक विचार नहीं आ रहे हैं। केस स्टडी-2: ‘हत्या कर दूंगा, फिर जेल चला जाऊंगा’ डॉ. त्रिवेदी ने एक अन्य मामले का जिक्र करते हुए बताया कि एक व्यक्ति अपनी पत्नी के प्रति इतना आक्रामक हो गया था कि उसने कई बार जानलेवा हमला करने की कोशिश की। उपचार के दौरान उसने स्वीकार किया कि उसके मन में कई बार यह विचार आता था कि पत्नी की हत्या कर देगा और फिर जेल चला जाएगा। मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन में उस व्यक्ति में पर्सनैलिटी डिसऑर्डर और डिप्रेशन जैसी समस्याएं सामने आईं। उपचार के दौरान उसके इंपल्स कंट्रोल और मानसिक स्वास्थ्य पर काम किया गया। हालांकि डॉ. त्रिवेदी ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों के आधार पर सभी मानसिक रोगियों को हिंसक मानना गलत होगा। अब पढ़िए एक्सपर्ट की राय… पुरुषों से जुड़े ऐसे मामलों में 7-8 साल में 60-70% बढ़ोतरी मनोचिकित्सक डॉ. सत्यकांत त्रिवेदी का कहना है कि एक मनोचिकित्सक के रूप में पिछले सात-आठ वर्षों में उन्होंने पुरुषों के साथ होने वाली मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना से जुड़े मामलों में करीब 60 से 70 प्रतिशत तक वृद्धि देखी है। उनके अनुसार, महिलाओं से जुड़े ऐसे मामले पहले भी आते थे, लेकिन अब पुरुष भी बड़ी संख्या में मानसिक और वैवाहिक प्रताड़ना का सामना करते हुए उपचार के लिए पहुंच रहे हैं। उन्होंने बताया कि पहले गंभीर आक्रामकता या हिंसक विचारों वाले मरीज महीने में एक-दो आते थे, जबकि पिछले दो-तीन वर्षों में यह संख्या बढ़कर हर महीने पांच से दस तक पहुंच गई है। इसमें शारीरिक हिंसा के साथ-साथ मानसिक हिंसा के मामले भी शामिल हैं। सोशल मीडिया, न्यूक्लियर फैमिली और बदलता कंटेंट बना बड़ा कारण डॉ. त्रिवेदी के अनुसार, इन घटनाओं के पीछे कई सामाजिक और मनोवैज्ञानिक कारण एक साथ काम कर रहे हैं। सोशल मीडिया का बढ़ता प्रभाव, परिवारों का संयुक्त से न्यूक्लियर होना, पूंजीवाद का दबाव और मनोरंजन माध्यमों में अपराधी प्रवृत्ति वाले पात्रों का महिमामंडन लोगों की सोच को प्रभावित कर रहा है। उन्होंने कहा कि पहले फिल्मों के नायक रोमांटिक हुआ करते थे, जबकि अब अधिकांश लोकप्रिय किरदार ग्रे शेड वाले हैं। अपराध करने वाले पात्रों को भी नायक के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है, जिससे अपराध के प्रति सामाजिक स्वीकार्यता बढ़ती दिखाई देती है। हर आरोपी मानसिक रोगी नहीं, अपराध को अपराध की तरह देखें डॉ. त्रिवेदी ने कहा कि ऐसे लोगों को सीधे-सीधे मानसिक मरीज कहना उचित नहीं होगा। ऐसा करना कई बार अपराध को मानसिक बीमारी के पीछे छिपाने जैसा हो सकता है। हालांकि कुछ मामलों में नार्सिसिस्टिक पर्सनैलिटी डिसऑर्डर, एंटी सोशल ट्रेट्स, मूड डिसऑर्डर, डिप्रेशन या नशे की लत जैसी समस्याएं भी पाई जाती हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हर मानसिक रोगी हिंसक होता है या हर हिंसक अपराध मानसिक बीमारी के कारण होता है। उन्होंने कहा कि मानसिक स्वास्थ्य अपराध को समझने में मदद कर सकता है, लेकिन अपराध का औचित्य सिद्ध नहीं कर सकता। इंटिमेट पार्टनर वायलेंस तेजी से बढ़ रहा डॉ. त्रिवेदी ने कहा कि पति-पत्नी या प्रेमी-प्रेमिका जैसे अंतरंग रिश्तों में होने वाली हिंसा को मनोविज्ञान में इंटिमेट पार्टनर वायलेंस (आईपीवी) कहा जाता है। उनके अनुसार, ऐसे मामलों में मानसिक प्रताड़ना, ब्लैकमेलिंग, बदला लेने की भावना और लगातार अपमानित करना भी हिंसा का हिस्सा है। उन्होंने यह भी कहा कि पुरुषों के साथ होने वाली हिंसा को लेकर पर्याप्त दस्तावेजीकरण और अध्ययन नहीं होने से नीतिगत स्तर पर भी कमियां बनी हुई हैं। ‘ना’ सुनने की क्षमता और स्वस्थ अलगाव की स्वीकार्यता जरूरी डॉ. त्रिवेदी के अनुसार, कई परिवारों में युवाओं को अपनी असहमति व्यक्त करने की स्वतंत्रता नहीं मिलती। विशेषकर महिलाओं पर परिवार की प्रतिष्ठा बनाए रखने का दबाव रहता है, जिससे वे अपनी वास्तविक भावनाएं व्यक्त नहीं कर पातीं। ऐसे में कुछ मामलों में गंभीर मानसिक तनाव और आपराधिक प्रवृत्तियां विकसित हो सकती हैं। उन्होंने कहा कि समाज को स्वस्थ तरीके से रिश्ता समाप्त करने (स्वस्थ अलगाव) को भी स्वीकार करना होगा। हर रिश्ते का सफल होना जरूरी नहीं है और जब दो लोगों के बीच लगातार टकराव हो तो सम्मानजनक अलगाव भी एक विकल्प होना चाहिए। ये खबर भी पढ़ें… पति के खर्राटों से परेशान पत्नी ने मांगा तलाक दिन में पति-पत्नी का रिश्ता सामान्य था, लेकिन रात होते ही पति के तेज खर्राटे दोनों के बीच तनाव की वजह बन जाते थे। लगातार नींद पूरी न होने से परेशान पत्नी ने तलाक लेने का फैसला कर लिया। फैमिली काउंसलर से उसने कहा, “वे बहुत अच्छे हैं, पर मैं रातभर जाग नहीं सकती।”पूरी खबर पढ़ें
