राजधानी रायपुर के इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय परिसर इन दिनों आमों की खुशबू और रंगों से सराबोर है। यहां आयोजित नेशनल मैंगो फेस्टिवल में देश-विदेश की 250 से ज्यादा किस्मों के आम लोगों को आकर्षित कर रहे हैं। कोई इन अनोखे आमों के साथ तस्वीरें खिंचवाता नजर आया, तो कोई एक्सपर्ट्स और किसानों से नई किस्मों, खेती की नई तकनीकों की जानकारी लेता दिखा। महोत्सव में 6 किलो वजनी हाथीझूल आम और सबसे छोटा लाल लड्डू आम आकर्षण का केंद्र रहा। वहीं दशहरी, लंगड़ा, चौसा, केसर और अल्फांसो जैसी लोकप्रिय किस्मों के अलावा जापान की प्रीमियम किस्म मियाजाकी, हाथीझूल और दुर्लभ नूरजहां आम को देखने के लिए लोगों में खास उत्साह देखा गया। छत्तीसगढ़ के खास 5 आम भी चर्चा में रहे। देखिए पहले ये तस्वीरें- एक्जॉटिक वैरायटी के आमों ने किया आकर्षित महोत्सव में विदेशी आमों की कई दुर्लभ किस्मों ने लोगों को आकर्षित किया। यहां 30 से अधिक एक्जॉटिक वैरायटी के आम प्रदर्शित किए गए हैं, जिनमें जापान की चर्चित प्रीमियम किस्म मियाजाकी सबसे ज्यादा चर्चा में है। इसकी कीमत करीब 2 लाख रुपये प्रति किलो तक बताई जाती है इसके अलावा अमेरिका की इर्विन किस्म, ऑस्ट्रेलिया की किंग्स्टन प्राइड और थाईलैंड-ताइवान की आइवरी किस्म भी लोगों को खूब पसंद आई। आमों के नाम भी उतने ही दिलचस्प प्रदर्शनी में केवल आम ही नहीं, उनके अनोखे नाम भी लोगों को आकर्षित कर रहे हैं। उत्तर प्रदेश से आई किस्मों में कलुआ, केलवा, सीपिया, आमीन, देसी गिलास, करेलहा, जर्दालु तुकमी, लखनऊवा और टुमरु जैसे नाम शामिल हैं। दक्षिण भारत और अन्य राज्यों से आई किस्मों में महमूद, टेन्नेरु, पूट्टू, सरदार, जमादार, माया और रामकेला जैसे नाम लोगों को चौंका रहे हैं। बस्तर, बीजापुर और कोंडागांव क्षेत्र से भी कई स्थानीय और पारंपरिक किस्मों को प्रदर्शित किया गया है। छत्तीसगढ़ के आमों की अपनी पहचान भी राष्ट्रीय आम महोत्सव में इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय (आईजीकेवी) की विकसित लगभग 25 आम किस्मों को भी प्रदर्शित किया गया है। इनमें पांच ऐसी किस्में शामिल हैं, जिन्हें छत्तीसगढ़ की पहचान माना जाता है। इनमें छत्तीसगढ़ स्वर्णप्रभा, छत्तीसगढ़ नंदीराज, छत्तीसगढ़ अचार, छत्तीसगढ़ गौरव और छत्तीसगढ़ पवन प्रमुख हैं। इन किस्मों को अच्छे स्वाद, ज्यादा गूदे, अधिक पैदावार और अचार, जूस जैसे उत्पाद बनाने के लिए उपयुक्त गुणों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है। आम की 11 गुठलियां लाने पर 1 आम फ्री आम महोत्सव में आमों के प्रदर्शन के साथ साथ आम से बनने वाले प्रोडक्ट को भी प्रदर्शित किया गया है, जिसे लोग खूब पसंद कर रहे हैं। इसके साथ ही यहां 11 गुठलियां लाने पर प्रकृति की ओर सोसायटी की ओर से 1 आम फ्री दिया गया। इसके अलावा यहां आम से बनने वाली अलग-अलग डिश तैयार की गई। शेफ ने वहां पहुंचे लोगों को आम से कई तरह की डिश बनाना भी सिखाया। UP की दशहरी-चौसा ने लुभाया पिछले 3 सालों से राष्ट्रीय आम महोत्सव में हिस्सा ले रहीं उत्तर प्रदेश के मलियाबाद की आम उत्पादक रिषिका गुप्ता ने बताया कि, रायपुर आना हमेशा उनके लिए एक अच्छा अनुभव रहा है। यहां लोगों का उत्साह और आमों के प्रति लगाव काफी आकर्षित करता है। इस बार वे अपने साथ पूसा, दशहरी और चौसा जैसी लोकप्रिय किस्मों के आम लेकर आई हैं। उन्होंने बताया कि उत्तर प्रदेश से बड़ी मात्रा में आम महोत्सव के लिए लाए गए हैं। अफगानिस्तान के ‘आमीर गोल’ ने बटोरी सुर्खियां दल्लीराजहरा से आए आम उत्पादक बलजीत सिंह ने बताया कि उनके स्टॉल में प्रदर्शित ‘आमीर गोल’ अफगानिस्तान की एक खास किस्म है। इसका स्वाद आम और अनानास (पाइनएप्पल) के मिक्स फ्लेवर जैसा होता है। उन्होंने बताया कि यह किस्म बैंगनफल्ली के समान मानी जाती है और इसमें रेशा बहुत कम होता है, जिससे इसका स्वाद और गुणवत्ता बेहतर हो जाती है। वर्तमान में यह आम 120 रुपए प्रति किलो की दर से बेचा जा रहा है। आम उत्पादन में छत्तीसगढ़ 17वें स्थान पर छत्तीसगढ़ में करीब 75 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में आम की खेती होती है और औसत उत्पादकता लगभग 11 मीट्रिक टन प्रति हेक्टेयर है। राज्य में 250 से अधिक किस्मों के आम पाए जाते हैं और यहां की जलवायु भी आम उत्पादन के लिए अनुकूल मानी जाती है। इसके बावजूद आम उत्पादन में छत्तीसगढ़ का स्थान देश में लगभग 16वें-17वें स्थान पर है। इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के विशेषज्ञों के अनुसार, साल 1987 से विश्वविद्यालय में आम की अलग-अलग किस्मों पर शोध किया जा रहा है। रायपुर कैंपस में 23 और बिलासपुर में 52 किस्मों के पौधे लगाए गए हैं। राज्य की अपनी उन्नत किस्में विकसित होने के बावजूद यहां महाराष्ट्र का अल्फांसो, गुजरात का केसर और उत्तर प्रदेश का दशहरी भी बड़े पैमाने पर उगाया जाता है। विशेषज्ञों का कहना है कि, आम की दुनिया में हर किस्म की अपनी अलग पहचान होती है। स्वाद, खुशबू, रंग और बाजार की मांग यह तय करते हैं कि कौन-सी किस्म किसानों और उपभोक्ताओं की पहली पसंद बनेगी।
