सतना के मझगवां विकासखंड में 22 अप्रैल को चार माह की सुप्रांशी की कुपोषण से मौत के बाद जांच में 10 और बच्चे कुपोषित मिले। उनको एनआरसी में भर्ती किया गया। 60 गांव हाई रिस्क चिन्हित हुए। हालात से निपटने के लिए प्रशासन ने जल्द मास्टर प्लान बनाया। भास्कर की पड़ताल में कुपोषण की वजह प्रशासनिक लापरवाही और जागरूकता की कमी सामने आई। 22 अप्रैल को 4 महीने की सुप्रांशी की कुपोषण से मौत हो गई। तबीयत बिगड़ी, अस्पताल पहुंचने से पहले ही मौत पथरा सुरांगी निवासी नत्थू प्रजापति के चार माह के जुड़वां बच्चे नैतिक और सुप्रांशी की 21 अप्रैल को तबीयत बिगड़ी। उन्हें मझगवां सीएचसी से जिला अस्पताल, फिर रीवा रेफर किया गया। 22 अप्रैल को रास्ते में सुप्रांशी की मौत हो गई। नैतिक रीवा के संजय गांधी अस्पताल में गंभीर है। घटना के बाद 7 कर्मचारियों को नोटिस दिए गए। 24 अप्रैल को बीएमओ डॉ. रूपेश सोनी की टीम ने गांव में जांच की, जिसमें अन्य कुपोषित बच्चे मिले। नयागांव की 5 माह की मोहिनी गंभीर मिली, उसे रीवा मेडिकल कॉलेज भेजा गया। दादी बोली- आंगनबाड़ी कार्यकर्ता ने पूरी जानकारी नहीं दी जिला मुख्यालय से 70 किमी दूर पथरा सुरांगी में सुप्रांशी की दादी सुरतिया ने कहा कि मैदानी अमले ने जिम्मेदारी नहीं निभाई। उनका आरोप है कि आंगनबाड़ी कार्यकर्ता के दबाव में ग्रामीण खुलकर नहीं बोलते। सरकारी योजनाओं की स्थिति खराब है। 96 घरों में सिर्फ 4 को पीएम आवास मिला। लवकुश प्रजापति के मुताबिक, खसरा जमीन न होने से आवास नहीं मिल रहा। उनका कहना है, “अगर जमीन पर मकान बना लें, तो जीविका कैसे चलेगी?” मां को एनीमिया था, समय पर खून नहीं मिला डॉ. सुचित्रा अग्रवाल की जांच में सामने आया कि मां विमला प्रजापति गर्भावस्था में गंभीर एनीमिया से ग्रस्त थीं। उनका हीमोग्लोबिन 6.3 ग्राम था। उन्हें सिर्फ एक यूनिट ब्लड दिया गया और आयरन इंजेक्शन नियमित नहीं मिले। समय पर इलाज होता, तो सुप्रांशी की जान बच सकती थी। मजबूरी और जागरूकता की कमी बड़ी बाधा कुपोषण के पीछे सिर्फ सिस्टम नहीं, गरीबी और जागरूकता की कमी भी वजह है। गुप्त गोदावरी मोड़ की निवासी निजमा ने एक साल के बेटे प्रांशु को एनआरसी ले जाने से इनकार किया। उनका कहना है, “मेरे चार बच्चे हैं, एक को लेकर जाऊंगी तो बाकी क्या खाएंगे? काम भी छूट जाएगा।” उन्हें पोषण आहार भी नियमित नहीं मिलता। बर्खास्तगी के बाद आंगनबाड़ी कार्यकर्ता की नियुक्ति इस मामले में आंगनबाड़ी कार्यकर्ता पूजा पांडेय की भूमिका सवालों में है। 2022 में कुपोषण से एक बच्ची की मौत के बाद उन्हें बर्खास्त किया गया था। उनकी दोबारा नियुक्ति कैसे हुई, यह स्पष्ट नहीं है। पूजा परिवार को जिम्मेदार ठहरा रही हैं। बीएमओ डॉ. रूपेश सोनी ने माना कि फील्ड स्तर पर फॉलोअप में लापरवाही होती है। पिछले 11 महीनों में 1680 बच्चे एनआरसी में भर्ती जिले में कुपोषण गंभीर है। करीब 4000 बच्चे कुपोषित हैं, जिनमें 1700–2000 अतिकुपोषित हैं। पिछले 11 महीनों में 1680 बच्चों को एनआरसी में भर्ती किया गया। मझगवां में 240 नए केस मिले। समस्या डिस्चार्ज के बाद बढ़ती है, क्योंकि फील्ड स्टाफ फॉलोअप नहीं करता और बच्चे फिर गंभीर हो जाते हैं। सीएचसी में न शिशु रोग विशेषज्ञ, न स्त्री रोग विशेषज्ञ मझगवां सीएचसी में न शिशु रोग विशेषज्ञ है, न स्त्री रोग विशेषज्ञ। पूरा केंद्र एक मेडिकल ऑफिसर पर निर्भर है। प्रशासनिक स्थिति कमजोर है। सेक्टर सुपरवाइजर मझगवां में रहते हुए चित्रकूट में ड्यूटी करती हैं, जिससे फील्ड वर्क प्रभावित है। सुप्रांशी की मौत के बाद कलेक्टर डॉ. सतीश कुमार एस ने मॉनिटरिंग शुरू की है। एसडीएम, सीएमएचओ व बीएमओ की टीम नया मास्टर प्लान बना रही है। अब तक 60 उच्च-जोखिम वाले गांव चिन्हित किए गए हैं। प्रशासन ने नए सर्वे का दावा किया है। इससे जुड़ी ये खबरें भी पढ़ें… 1. MP में 4 महीने की बच्ची की कुपोषण से मौत मध्य प्रदेश के सतना जिले में कुपोषण से 4 महीने की बच्ची की मौत हो गई, जबकि जुड़वां भाई की हालत गंभीर है। उसे सतना जिला अस्पताल से रीवा मेडिकल कॉलेज रेफर किया गया, जहां वह PICU में भर्ती है। दोनों बच्चे करीब 15 दिन से उल्टी-दस्त, बुखार और डायरिया से पीड़ित थे। पढ़ें पूरी खबर… 2. पांच माह की मासूम… 2.3 किलो वजन, कान भी नहीं मध्यप्रदेश के सतना में कुपोषण का एक और गंभीर मामला सामने आया है। मझगवां ब्लॉक के नयागांव में 5 माह की बच्ची मोहिनी प्रजापति गंभीर कुपोषण की हालत में मिली। चौंकाने वाली बात यह है कि बच्ची का एक कान जन्म से ही विकसित नहीं हुआ है। पढ़ें पूरी खबर…
