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ग्वालियर में रेबीज से युवक की मौत, रोज 100+ मामले:5 दिन पहले एक शख्स ने अस्पताल में भर्ती कराया था; नाम दिया था ‘गोलू’

ग्वालियर में आवारा कुत्तों का आतंक बढ़ता जा रहा है। रोजाना 100 से अधिक लोग डॉग बाइट के शिकार हो रहे हैं। इसी बीच रविवार को 25 वर्षीय एक अज्ञात युवक की मौत हो गई, जिसका कारण रेबीज बताया गया है। जानकारी के अनुसार, 1 अप्रैल को एक अनजान व्यक्ति घायल युवक को मुरार स्थित जिला अस्पताल लेकर पहुंचा था। उसने मरीज का नाम ‘गोलू’ दर्ज कराया और बताया कि उसे कुत्ते ने काटा है। युवक गंभीर हालत में मिला था। स्थिति बिगड़ने पर उसी रात उसे जेएएच (हजार बिस्तर अस्पताल) रेफर कर दिया गया, जहां उसे रेबीज संदिग्ध मानकर उपचार शुरू किया गया। इलाज के दौरान रविवार को युवक ने दम तोड़ दिया। अस्पताल प्रबंधन की सूचना पर मुरार थाना पुलिस ने शव को निगरानी में लेकर मर्ग कायम कर लिया है। सोमवार को पोस्टमार्टम कराया जाएगा। फिलहाल मृतक की पहचान नहीं हो सकी है। उसे कुत्ते ने कब काटा, यह जानकारी पहचान के बाद ही स्पष्ट हो पाएगी। पुलिस पूरे मामले की जांच में जुटी है। भर्ती मरीज की मौत की सूचना हजार बिस्तर के अस्पताल स्ट्रेचर बॉय अभिषेक पुत्र कमलेश पांडेय निवासी पिछोर ने मुरार थाना पुलिस को दी है। साथ ही अस्पताल की तहरीर मुरार थाना पुलिस को सौंपी है। तहरीर में मौत का कारण रेबीज संक्रमण बताया गया है। रिपोर्ट में मृत्यु का कारण रेबीज बताया गया
मुरार पुलिस को जयारोग्य अस्पताल से इलाज और मौत से संबंधित रिपोर्ट प्राप्त हुई है। इसमें उल्लेख है कि मरीज की मौत रेबीज संक्रमण के कारण हुई प्रतीत होती है। रिपोर्ट मिलते ही पुलिस ने मर्ग कायम कर लिया। मृतक की पहचान के प्रयास में उसका फोटो आसपास के क्षेत्रों में दिखाया गया, लेकिन शिनाख्त नहीं हो सकी। फिलहाल शव को मर्च्यूरी में रखवाया गया है। आवारा कुत्तों पर नियंत्रण में लापरवाही
शहर की कॉलोनियों और मोहल्लों में आवारा कुत्तों की संख्या लगातार बढ़ रही है, लेकिन नगर निगम का अमला सक्रिय नजर नहीं आ रहा। अधिकारियों का दावा है कि नसबंदी जैसी योजनाओं से संख्या नियंत्रित करने का प्रयास किया जा रहा है, जबकि हकीकत में कुत्तों को पकड़ने का अभियान ठप पड़ा है। जिम्मेदार अधिकारी भी मैदान में नजर नहीं आते। हर दिन 100 से 150 डॉग बाइट के मामले
शहर में रोजाना 100 से 150 डॉग बाइट के मामले जेएएच, जिला अस्पताल और सिविल अस्पताल पहुंच रहे हैं। ये वे मरीज हैं जो काटने के बाद रेबीज के इंजेक्शन लगवाने आते हैं, जबकि कई मामले ऐसे भी हैं जो अस्पताल तक पहुंच ही नहीं पाते।

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