मध्य प्रदेश में बिजली की सप्लाई को लेकर एक बड़ी जानकारी सामने आई है। केंद्र सरकार के ताजा आंकड़ों के अनुसार, मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के कार्यकाल में राज्य ‘जीरो पावर कट’ की दिशा में बड़ी उपलब्धि हासिल कर रहा है। शिवराज सिंह चौहान के कार्यकाल की तुलना में अब राज्य में बिजली की कमी लगभग खत्म हो गई है। केरल से भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) यानी CPI(M) के सांसद एए रहीम द्वारा पूछा गया था । उन्होंने शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में बिजली की उपलब्धता और लोड शेडिंग के संबंध में सरकार से जवाब मांगा था। शिवराज बनाम मोहन राज: आंकड़ों में बड़ा बदलाव राज्यसभा में पेश की गई रिपोर्ट के अनुसार, पिछले तीन वर्षों में मध्य प्रदेश ने बिजली की मांग और आपूर्ति के बीच के अंतर को जिस तेजी से भरा है, वह चौंकाने वाला है। शिवराज सिंह चौहान काल (2022-23): इस दौरान राज्य को साल भर में 92,325 मिलियन यूनिट बिजली की जरूरत थी। लेकिन, मांग के मुकाबले 358 मिलियन यूनिट बिजली कम पड़ गई थी। यह कमी 0.4% थी, जिसके कारण कई इलाकों में लोड शेडिंग या अघोषित कटौती देखनी पड़ती थी। डॉ. मोहन यादव काल (2025-26): मौजूदा वित्तीय वर्ष (जनवरी 2026 तक) के आंकड़े बताते हैं कि अब बिजली की कमी घटकर मात्र 9 मिलियन यूनिट रह गई है। चौंकाने वाली बात ये है कि शिवराज काल की तुलना में बिजली की किल्लत में 97% से ज्यादा की गिरावट आई है। अब राज्य में बिजली की कमी तकनीकी रूप से 0.0% के लेवल पर पहुंच गई है। मांग बढ़ी फिर भी सप्लाई फुल शिवराज काल (2022-23) में बिजली की मांग करीब 92 हजार यूनिट थी, जो मोहन यादव के कार्यकाल (2024-25) में बढ़कर 1,04,445 मिलियन यूनिट तक पहुंच गई। मांग में 13% की भारी बढ़ोत्तरी होने के बावजूद बिजली की कमी बढ़ने के बजाय घट गई। गांवों में रोशनी का रिकॉर्ड 2014 के समय जब गांवों में मात्र 12.5 घंटे बिजली मिलती थी, वह अब मोहन यादव सरकार के समय बढ़कर औसतन 22.6 घंटे हो गई है। यानी अब गांव और शहर के बीच बिजली का अंतर लगभग खत्म हो गया है। अब क्यों गुल होती है बिजली? सरकार ने स्पष्ट किया है कि अब राज्य में बिजली की कोई कमी (शॉर्टेज) नहीं है। अगर अब भी आपके घर की लाइट जाती है, तो वह बिजली कम होने के कारण नहीं, बल्कि स्थानीय स्तर पर तारों के टूटने, ट्रांसफार्मर खराब होने या मेंटेनेंस जैसे तकनीकी कारणों से होती है। बिजली संकट के मामले
