मध्य प्रदेश सरकार 1 अप्रैल से टेक होम राशन की मौजूदा व्यवस्था को बदलने का फैसला ले चुकी है, लेकिन ये मामला सरकारी विभागों की आपसी खींचतान और पुरानी नोटशीट की वजह से उलझ गया है। एक तरफ महिला एवं बाल विकास विभाग इसे निजी हाथों में सौंपने की तैयारी में था, तो वहीं मुख्य सचिव कार्यालय इसे केंद्र सरकार की एजेंसी नेफेड (NAFED) को देने के पक्ष में है। मुख्य सचिव अनुराग जैन ने एक नोटशीट भी लिखी है , जिसमें उन्होंने हाईकोर्ट के एक पुराने आदेश का हवाला देते हुए विभाग से जवाब-तलब किया है। इस खींचतान का नतीजा यह है कि 31 मार्च के बाद इस 1200 करोड़ रुपये की योजना का संचालन कौन करेगा, यह अभी तक साफ नहीं है। इससे न केवल लाखों हितग्राहियों के पोषण का सवाल खड़ा हो गया है, बल्कि उन 5 लाख महिलाओं के भविष्य पर भी अनिश्चितता के बादल मंडरा रहे हैं, जो स्व-सहायता समूहों (SHG) के माध्यम से इस व्यवस्था से जुड़ी हैं। बता दें कि मप्र में 36 लाख से अधिक गर्भवती महिलाओं, धात्री माताओं और बच्चों को टेक होम राशन दिया जाता है। फिलहाल स्व सहायता समूह इस योजना का संचालन कर रहे हैं। आखिर सरकार ने पुरानी व्यवस्था को बदलने का फैसला क्यों लिया? नई व्यवस्था से क्या फायदा होगा? पढ़िए मंडे स्टोरी… पहले जानिए क्यों और कैसे उलझा पूरा मामला? वर्तमान में, 31 मार्च 2026 तक टेक होम राशन की व्यवस्था राज्य आजीविका मिशन के तहत महिला स्व-सहायता समूहों के पास है, जो पंचायत और ग्रामीण विकास विभाग के अधीन आता है। सरकार ने नए वित्तीय वर्ष से यह काम वापस महिला एवं बाल विकास विभाग(डब्ल्यूसीडी) को सौंपने का फैसला किया। डब्ल्यूसीडी विभाग ने निविदा (टेंडर) जारी कर इस व्यवस्था को निजी कंपनियों को सौंपने का प्रस्ताव तैयार किया था। जब यह फाइल मुख्य सचिव अनुराग जैन के पास पहुंची, तो उन्होंने इस पर अपनी सहमति देने से पहले एक नोटशीट लिखकर फाइल वापस विभाग को वापस भेज दी। ये भी लिखा कि कोई भी निर्णय लेने से पहले यह स्पष्ट किया जाए कि इस संबंध में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट का पूर्व में दिया गया आदेश क्या था? चूंकि किसी भी प्रस्ताव को कैबिनेट में ले जाने से पहले मुख्य सचिव की मंजूरी अनिवार्य है, इसलिए फाइल लौटाए जाने से पूरी प्रक्रिया ठप हो गई है। इंदौर हाईकोर्ट का 2 पॉइंट्स पर आदेश इस पूरे मामले के केंद्र में इंदौर हाईकोर्ट का 13 सितंबर 2017 का एक ऐतिहासिक फैसला है। ‘महाभ्युदय स्वैच्छिक संगठन’ और ‘पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज’ की याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने 2 पॉइंट्स पर साफ निर्देश दिए हैं। यही वह आदेश है, जिसके कारण मुख्य सचिव ने फाइल पर सवाल उठाए हैं। यदि सरकार निजी कंपनियों को टेंडर देती है या नैफेड को काम सौंपती है, तो यह हाईकोर्ट के आदेश का सीधा उल्लंघन हो सकता है। क्योंकि नैफेड भी खुद उत्पादन नहीं करता, बल्कि आउटसोर्सिंग के जरिए अन्य कंपनियों और ठेकेदारों से काम करवाता है, जिस पर सिर्फ नैफेड की ब्रांडिंग होती है। नेफेड को आपात परिस्थिति में सौंपा गया था काम केंद्र की गाइडलाइन के अनुसार राज्य सरकार किसी आपात परिस्थिति जैसे बाढ़, राष्ट्रीय आपदा के दौरान किसी एक संस्था को बिना टेंडर के काम सौंप सकती है। उत्तर प्रदेश सरकार ने कोविड काल में नेफेड को काम सौंपा था। लेकिन वर्तमान में इस तरह की कोई आपदा नहीं है। ऐसे में नेफेड को सीधे काम सौंपना केंद्र की मंशा के खिलाफ है। पुराने सिस्टम में भ्रष्टाचार, कैग ने उठाए थे सवाल दिलचस्प बात यह है कि महिला स्व-सहायता समूहों को यह काम सौंपने का फैसला ही इसलिए लिया गया था क्योंकि पुरानी व्यवस्था भ्रष्टाचार में डूबी हुई थी। भारत के नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक (CAG) ने अपनी 2024-25 की रिपोर्ट में 2018-21 के बीच टेक होम राशन योजना में 428 करोड़ रुपये की भारी अनियमितताएं उजागर की थीं। CAG रिपोर्ट के खुलासे चौंकाने वाले थे इसी महाघोटाले के बाद शिवराज सिंह चौहान सरकार ने व्यवस्था बदलकर इसे एमपी एग्रो और निजी ठेकेदारों से छीनकर महिला समूहों को सौंपा था। स्व-सहायता समूहों से काम छीनने के पीछे सरकार के तर्क सरकार इस बदलाव के पीछे दो मुख्य तर्क दे रही है 141 करोड़ के प्लांट और 5 लाख महिलाओं का क्या होगा? इस पूरी कवायद ने तीन बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं विपक्ष ने उठाए सवाल, मंत्री बोलीं- अभी फैसला नहीं हाल ही में विधानसभा के बजट सत्र में नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने इस मुद्दे पर सरकार को घेरा। उन्होंने कहा कि पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान महिला स्व-सहायता समूहों को लखपति बनाने के सपने दिखाते रहे। बेचारी महिलाएं लखपति तो बनीं नहीं, अब उनसे पोषण आहार का काम छीनकर करोड़पति उद्योगपतियों को सौंपा जा रहा है। यह महिलाओं के साथ धोखा है। वहीं इस मसले पर महिला बाल विकास मंत्री निर्मला भूरिया ने कहा कि अभी इस मामले में कोई अंतिम फैसला नहीं हुआ है। जैसे ही कुछ ठोस निर्णय होगा मीडिया को इस बारे में जरूर बताया जाएगा। बड़ा सवाल: 1200 करोड़ खर्च, फिर भी बच्चे कुपोषित क्यों? इस पूरी प्रशासनिक खींचतान का सबसे दुखद पहलू यह है कि योजना अपने मूल उद्देश्य में ही विफल होती दिख रही है। सरकार पोषण आहार पर सालाना 1200 करोड़ रुपये से अधिक खर्च कर रही है, लेकिन बच्चों के स्वास्थ्य में सुधार के बजाय गिरावट देखी जा रही है।
