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भूकंप भी नहीं हिला पाया, वह कुदरती करिश्मा खतरे में:MP की 2000 साल पुरानी बैलेंसिंग रॉक के पास बहुमंजिला निर्माण, सरकारी जमीन पर कब्जा

जबलपुर की पहचान बन चुकी प्राकृतिक धरोहर बैलेंसिंग रॉक के आसपास जमीन और निर्माण को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। मदन महल की पहाड़ियों पर स्थित इस अनोखी चट्टान से महज 20 फीट की दूरी पर बहुमंजिला इमारत का निर्माण हो रहा है। सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. पीजी नाजपांडे का दावा है कि वर्ष 1910 के राजस्व रिकॉर्ड में खसरा नंबर 194 की 30 एकड़ जमीन सरकारी दर्ज थी, लेकिन धीरे-धीरे कब्जे और निजी स्वामित्व बढ़ने से अब बैलेंसिंग रॉक के आसपास केवल 0.8 हेक्टेयर सरकारी जमीन बची है। सबसे गंभीर सवाल यह है कि जबलपुर की इस प्राकृतिक धरोहर के आसपास निर्माण की अनुमति किस आधार पर दी जा रही है और इसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी किस विभाग की है। पर्यटन विभाग इसे पुरातत्व विभाग की जिम्मेदारी बता रहा है, जबकि पुरातत्व विभाग के एक अधिकारी के मुताबिक बैलेंसिंग रॉक उनके विभाग के अधीन नहीं है। नगर निगम के भवन अधिकारी का कहना है कि उन्हें आसपास हो रहे निर्माण की जानकारी नहीं है। ऐसे में धरोहर के पास निर्माण और जमीन के रिकॉर्ड की जांच को लेकर विभागों की भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं। 1935 का भूकंप भी हिला नहीं पाया इस चट्‌टान को मदन महल की पहाड़ियों पर एक विशाल गोलाकार चट्टान दूसरी चट्टान के ऊपर इस तरह टिकी है कि देखने वालों को उसके गिरने का आभास होता है। टनों वजनी यह संरचना लंबे समय से जबलपुर की पहचान बनी हुई है। वर्ष 1935 के भूकंप से लेकर 1997 के 6.5 तीव्रता वाले भूकंप तक के झटकों के बावजूद यह अपनी जगह पर टिकी रही। लेकिन अब इसके ठीक पीछे करीब 20 फीट की दूरी पर बहुमंजिला इमारत का निर्माण हो रहा है। यहां आने वाले पर्यटकों का कहना है कि ऐसी प्राकृतिक संरचना दोबारा नहीं बनाई जा सकती। इसे सुरक्षित रखने के साथ आसपास के क्षेत्र को भी संरक्षित किया जाना चाहिए। सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. पीजी नाजपांडे का कहना है कि करीब 2 हजार साल पुरानी बताई जाने वाली इस धरोहर के आसपास अतिक्रमण बढ़ता गया और जंगल की जगह इमारतें बनने लगीं। उन्होंने प्रशासन से तत्काल हस्तक्षेप कर निर्माण और जमीन के रिकॉर्ड की जांच कराने की मांग की है। इसकी ऐतिहासिक आयु की स्वतंत्र पुष्टि जरूरी है। 30 एकड़ सरकारी जमीन का रिकॉर्ड, अब 0.8 हेक्टेयर बचने का दावा नाजपांडे के मुताबिक, वर्ष 1910 के राजस्व रिकॉर्ड में खसरा नंबर 194 की 30 एकड़ जमीन सरकारी दर्ज थी। उनका आरोप है कि समय के साथ आसपास कब्जे हुए और जमीन निजी स्वामित्व में दर्ज होती गई। अब उनके अनुसार, बैलेंसिंग रॉक के आसपास केवल 0.8 हेक्टेयर सरकारी जमीन बची है। इन सवालों का जवाब राजस्व रिकॉर्ड, नामांतरण दस्तावेजों, भवन अनुमति और मौके की सीमांकन रिपोर्ट से ही स्पष्ट हो सकेगा। फिलहाल जमीन पर कब्जे और दस्तावेजों में हेरफेर के आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि जरूरी है। पर्यटन ने पुरातत्व पर डाली जिम्मेदारी, नगर निगम को निर्माण की जानकारी नहीं पर्यटन विभाग के रीजनल मैनेजर नवीन शर्मा ने कहा कि बैलेंसिंग रॉक के संरक्षण की जिम्मेदारी पुरातत्व विभाग की है। उनके मुताबिक, सामाजिक संगठनों की शिकायत काफी हद तक सही है और वे संबंधित अधिकारियों तक बात पहुंचाएंगे। शर्मा ने बताया कि मौके पर संरचना का इतिहास बताने वाला बोर्ड लगा है और लाइटिंग भी है, लेकिन वह पर्याप्त नहीं है। यहां भारतीयों के साथ विदेशी पर्यटक भी आते हैं। दूसरी ओर, पुरातत्व विभाग में पदस्थ सीनियर गाइड राजकुमार का कहना है कि विभाग के अधीन संग्रहालय है, जबकि बैलेंसिंग रॉक की जिम्मेदारी जिला प्रशासन देखता है। नगर निगम के भवन अधिकारी शैलेंद्र सिंह कौरव ने कहा कि बैलेंसिंग रॉक के आसपास हो रहे निर्माण की जानकारी उन्हें नहीं है। यदि शिकायत मिलती है तो जांच कराई जाएगी। निर्माण अवैध या बिना अनुमति के पाया गया तो कार्रवाई की जाएगी। इस तरह, जिस धरोहर के आसपास निर्माण और जमीन के स्वामित्व को लेकर सवाल उठ रहे हैं, उसकी जिम्मेदारी को लेकर संबंधित विभागों के बयान अलग-अलग हैं। अब यह स्पष्ट होना जरूरी है कि संरक्षण, जमीन के रिकॉर्ड और निर्माण अनुमति की जांच कौन करेगा। मशीनों की धमक और पानी से भी चट्टान को नुकसान की आशंका आर्कियोलॉजिकल विशेषज्ञ मनोहर सिंह उईके के मुताबिक, बैलेंसिंग रॉक के आसपास मशीनों के इस्तेमाल से पैदा होने वाली कंपन चट्टान को प्रभावित कर सकती है। उन्होंने कहा कि अतिक्रमण बढ़ने से इसकी प्राकृतिक सुंदरता भी खत्म होगी। उईके के अनुसार, चट्टान के आसपास पानी की निकासी की व्यवस्था नहीं होने पर पानी जमा हो सकता है। लंबे समय तक पानी का जमाव और उसका बहाव चट्टान के आसपास की जमीन को प्रभावित कर सकता है। इसलिए निर्माण की स्थिति, मशीनों के इस्तेमाल और जल निकासी का तकनीकी आकलन जरूरी है। करोड़ों साल में प्राकृतिक कटाव से बनी अनोखी संरचना भूवैज्ञानिकों के अनुसार, बैलेंसिंग रॉक जैसी संरचनाएं प्राचीन ज्वालामुखीय चट्टानों और लंबे समय तक हवा-पानी से हुए प्राकृतिक कटाव के कारण बनती हैं। आसपास की अपेक्षाकृत नरम चट्टानें धीरे-धीरे घिसकर हट गईं और विशाल चट्टान छोटे आधार पर संतुलित रह गई। 1997 के जबलपुर भूकंप के दौरान भी यह संरचना अपनी जगह पर बनी रही थी। यही इसकी विशिष्टता है। लेकिन इसके आसपास निर्माण से वास्तव में कितना खतरा है, इसका निष्कर्ष केवल दृश्य स्थिति के आधार पर नहीं निकाला जा सकता। इसके लिए भूवैज्ञानिक और संरचनात्मक विशेषज्ञों की जांच जरूरी है। अब जमीन और निर्माण की जांच जरूरी बैलेंसिंग रॉक के पास निर्माण, सरकारी जमीन के स्वामित्व में कथित बदलाव और विभागों के बीच जिम्मेदारी को लेकर उठे सवालों की जांच जरूरी है। प्रशासन को राजस्व रिकॉर्ड और भवन अनुमतियों की पड़ताल कर यह स्पष्ट करना चाहिए कि निर्माण नियमों के अनुरूप है या नहीं। साथ ही, प्राकृतिक संरचना की सुरक्षा के लिए विशेषज्ञों से तकनीकी आकलन कराया जाना चाहिए। जबलपुर की इस पहचान को बचाने के लिए केवल बोर्ड और लाइटिंग पर्याप्त नहीं हैं। सबसे पहले यह स्पष्ट होना चाहिए कि धरोहर के आसपास की जमीन किसकी है, निर्माण की अनुमति किसने दी और संरक्षण की जिम्मेदारी किस विभाग की है।

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