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विटामिन D और B12 की कमी से हार्टअटैक का खतरा:भाेपाल में 10 में से 8 पेशेंट में मिली कमी; बढ़ा होमोसिस्टीन दिल-दिमाग-किडनी के लिए बना खतरा

भोपाल में एक 44 वर्षीय सुयश मल्होत्रा को अचानक सीने में दर्द हुआ। उन्हें एक निजी अस्पताल ले जाया गया। कोलेस्ट्रॉल और अन्य जांचें लगभग ठीक थीं, लेकिन रिपोर्ट में एक पैरामीटर ने तस्वीर बदल दी। मरीज का होमोसिस्टीन का स्तर काफी बढ़ा हुआ था। डॉक्टरों के अनुसार यही बढ़ा हुआ स्तर धमनी में थक्का बनने की वजह बना। इसी तरह 41 वर्षीय एक अन्य मरीज में भी हार्ट अटैक के बाद जांच में यही पैटर्न सामने आया। भोपाल में एम्स, हमीदिया अस्पताल और निजी अस्पतालों की कार्डियोलॉजी ओपीडी में आ रहे युवा मरीजों की रिपोर्ट बताती है कि हर 10 में से 8 मरीजों में विटामिन डी और बी12 की कमी मिल रही है। यही कमी होमोसिस्टीन बढ़ाकर हृदय, मस्तिष्क और अन्य अंगों को प्रभावित कर रही है। वरिष्ठ कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. किसलय श्रीवास्तव का कहना है कि यह अलार्म है। अब जीवनशैली को लेकर अलर्ट होना जरूरी है। हर 10 में से 8 मरीजों में विटामिन की कमी डॉ. श्रीवस्तव के अनुसार, मरीजों की जांच रिपोर्ट में एक समान स्थिति दिख रही है। करीब 70 से 80 प्रतिशत मरीजों में विटामिन डी और विटामिन बी-12 का स्तर सामान्य से काफी कम पाया जा रहा है। यह कमी केवल बुजुर्गों तक सीमित नहीं है। बल्कि, 22 साल से 45 साल आयु वर्ग के मरीजों में भी विटामिन की कमी और बढ़ा हुआ होमोसिस्टीन स्तर मिल रहा है। समझें होमोसिस्टीन पर नजर रखना क्यों जरूरी होमोसिस्टीन एक अमीनो एसिड है, जो शरीर में विटामिन बी-12 और फोलिक एसिड की कमी होने पर बढ़ जाता है। इसकी सामान्य सीमा 5 से 15 माइ्रोमोल प्रति लीटर होती है। 50 या उससे अधिक स्तर होने पर स्थिति अत्यंत गंभीर मानी जाती है। वरिष्ठ हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ. किसलय श्रीवास्तव बताते हैं कि हार्ट अटैक के लगभग 60 प्रतिशत मामलों में होमोसिस्टीन का स्तर बढ़ा हुआ पाया गया। यह धमनियों की भीतरी परत को नुकसान पहुंचाता है और रक्त का थक्का बनने की संभावना बढ़ाता है। विटामिन डी और बी12 की कमी से अंगों पर असर 1. हृदय (Heart): धमनियों में सूजन और ब्लॉकेज का खतरा बढ़ता है।
2. मस्तिष्क (Brain): स्ट्रोक की आशंका बढ़ सकती है।
3. किडनी: लंबे समय तक उच्च होमोसिस्टीन स्तर से किडनी की कार्य क्षमता प्रभावित हो सकती है।
4. नसें (Nerves): हाथ-पैरों में झुनझुनी, सुन्नपन और संतुलन बिगड़ना।
5. हड्डियां: विटामिन डी की कमी से हड्डियां कमजोर और फ्रैक्चर का खतरा।
6. फेफड़े: रक्त प्रवाह में गड़बड़ी से ऑक्सीजन सप्लाई प्रभावित हो सकती है। बिगड़ती जीवनशैली है प्रमुख कारण डॉ. किसलय श्रीवास्तव के अनुसार कोविड के बाद युवाओं में हार्ट डिजीज के मामले तेजी से बढ़े हैं। पहले लोग दैनिक जीवन में अधिक सक्रिय थे, लेकिन अब शारीरिक गतिविधि कम हो गई है। जंक फूड, धूप में कम समय बिताना, अनियमित दिनचर्या और तनाव ये सभी विटामिन की कमी को बढ़ा रहे हैं। आयुर्वेद के प्रोफेसर डॉ. नितिन उज्जलिया बताते हैं कि विटामिन बी12 कई खाद्य पदार्थों में पाया जाता है, लेकिन पानी में घुलनशील होने के कारण पकाने की गलत विधि से इसकी मात्रा कम हो जाती है। जांच और सावधानियां 30 वर्ष की उम्र के बाद नियमित अंतराल पर होमोसिस्टीन, लिपोप्रोटीन (a), विटामिन, बीपी, शुगर, किडनी और लीवर फंक्शन की जांच जरूरी है। बचाव के उपाय: युवा हाई रिस्क में, वलनरेबल ब्लॉक बन रहे जानलेवा गांधी मेडिकल कॉलेज के कार्डियोलॉजी विभाग के प्रोफेसर डॉ. अजय शर्मा ने कहा कि ह्रदय रोगियों की संख्या बढ़ी है। चिंता की बात यह है कि इनमें एक बड़ी संख्या कम आयु के मरीजों की है। पांच साल पहले की तुलना में वर्तमान में 20 से 40 साल की आयु के पुरुष और महिलाओं में सडन कार्डियक अरेस्ट और हार्ट अटैक के केस बढ़े हैं। डॉ. शर्मा के अनुसार, इन पांच साल में अवेयरनेस बढ़ी है। हर आयु के लोग अब नॉर्मल टेस्ट करा रहे हैं, जिनमें इसीजी, ईको कार्डियोग्राम, ट्रेडमिल टेस्ट, लिपिड प्रोफाइल समेत अन्य शामिल हैं। यह टेस्ट यदि नॉर्मल आते हैं तो फिजिशियन बोल देते हैं कि टेस्ट नॉर्मल है। चिंता की कोई बात नहीं है। हम देख रहें हैं कि यह पेशेंट भी सडन कार्डियक अरेस्ट के लिए ससेप्टिबल होते हैं। जो टेस्ट हैं वो आपके दिल में ब्लॉकेज को तब आइडेंटिफाई करते हैं जब उनका स्तर 80 प्रतिशत से अधिक हो। यदि ब्लॉकेज 20 से 30 प्रतिशत हैं तो इन टेस्ट में सब नॉर्मल दिखता है। जबकि यह जो 20 से 30 प्रतिशत के ब्लॉक होते हैं। इन्हें वलनरेबल ब्लॉक कहा जाता है, जिनमें यह ब्लॉकेज हैं, उनमें सडन इमोशनल स्ट्रेस हुआ तो यह अचानक रप्चर कर जाते हैं। जिससे यह आर्टरीज (खून की नस) को ब्लॉक कर देते हैं। जो सडन कार्डियक अरेस्ट या हार्ट अटैक का कारण बनता है। यह खबर भी पढ़ें… भोपाल के सरकारी अस्पतालों में 23% डॉक्टरों के पद खाली भोपाल में सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था का एक चिंताजनक सच सामने आया है। जिला स्वास्थ्य विभाग के तहत संचालित अस्पतालों में 23% डॉक्टरों के पद खाली हैं। सबसे हैरानी की बात यह है कि आज तक एक भी स्किन स्पेशलिस्ट की नियुक्ति नहीं हो सकी। पूरी खबर यहां पढ़ें…

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