पन्ना में मझगाय बांध परियोजना से प्रभावित परिवारों का सत्याग्रह शुक्रवार को 14वें दिन भी जारी रहा। केन-बेतवा, मझगाय, रूँझ और ललितपुर-सिंगरौली रेल मार्ग से प्रभावित ग्रामीण जमीन और अपने अस्तित्व को बचाने की मांग को लेकर आंदोलन कर रहे हैं। मूसलाधार बारिश और बांध का पानी बढ़ने से आंदोलनकारियों की मुश्किलें बढ़ गई हैं। कई लोगों के पैरों की त्वचा गलने लगी है और घाव हो गए हैं। वृद्धों और महिलाओं की तबीयत भी खराब होने की बात सामने आई है। आंदोलन में महिलाएं चिता पर लेटकर, जबकि युवा सूली और बेड़ियों में जकड़कर विरोध जता रहे हैं। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि इसके बावजूद प्रशासन और सरकार की ओर से अब तक कोई ठोस कदम नहीं उठाया गया है। 14 दिन से पानी में, पैरों की त्वचा गलने लगी प्रभावित भूरी बाई ने बताया कि वे 14 दिन से पानी में हैं और उनके पैरों की त्वचा गलने लगी है। उन्होंने कहा कि वे अपने बच्चों के भविष्य के लिए आंदोलन में खड़ी हैं। रंभा बाई ने बताया कि वे दो दिन से बिना खाए-पिए पानी में हैं। रहने की कोई व्यवस्था नहीं है। कपड़े और चटाइयां भीग चुकी हैं। उन्होंने सरकार से लिखित में न्याय देने की अपील की। आठ साल बाद भी सर्वे पूरा नहीं होने का आरोप जय किसान संगठन के नेता अमित भटनागर ने विस्थापन और मुआवजा प्रक्रिया पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि धारा 11 की अधिसूचना जारी हुए आठ साल से ज्यादा समय बीत चुका है। कई बार पूरक सूचियां जारी होने के बावजूद सैकड़ों प्रभावित परिवार सूची से बाहर हैं। भटनागर के मुताबिक, कई परिवारों को मकान, कुएं, पेड़ और जमीन का उचित मूल्यांकन और मुआवजा नहीं मिला है। उन्होंने सवाल उठाया कि विस्थापन की प्रक्रिया वर्षों से चल रही थी तो पात्र परिवारों का सही आकलन क्यों नहीं हुआ और अब बांध का पानी घरों तक पहुंचने के बाद इन त्रुटियों की जवाबदेही कौन लेगा। आंदोलनकारियों ने इसे अधिकार की लड़ाई बताया आंदोलनकारियों का कहना है कि चिता या सूली पर उनका विरोध सुर्खियां बटोरने के लिए नहीं, बल्कि अपनी समस्याओं पर सरकार और प्रशासन से जवाब मांगने के लिए है। अमित भटनागर ने कहा कि जब लोग अपनी परेशानी इस स्तर तक जाहिर करने के लिए मजबूर हों तो यह शासन-प्रशासन के लिए आत्ममंथन का विषय है। प्रभावित परिवारों ने प्रशासन से तत्काल मौके पर पहुंचकर समस्याओं का समाधान करने की मांग की है।
