मध्य प्रदेश क्राइम फाइल्स के पार्ट-1 में आपने पढ़ा कि 8 जुलाई 2004 की रात सिवनी के एक गांव में 40-50 लोगों की भीड़ एक घर में घुसी थी। घर में तीन महिलाएं अकेली थीं। भीड़ ने दरवाजा तोड़ा, तीनों को घर से बाहर निकाला और गांव की गलियों से घसीटते हुए पंचायत भवन के पास ले गई। इसके बाद तीनों महिलाओं के साथ गैंगरेप किया गया। करीब एक घंटे तक यह सब चलता रहा। आरोपी महिलाओं को वहीं छोड़कर फरार हो गए। पुलिस ने सामूहिक बलात्कार, घर में घुसने, अपहरण और एससी-एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत केस दर्ज किया। आखिर तीन तीन महिलाओं को ही निशाना क्यों बनाया गया? और उस रात गांव के इतने लोग एक साथ उनके घर क्यों पहुंचे? आगे की कहानी में इनके जवाब… 4 जुलाई को गांव में एक ऐसा विवाद शुरू हुआ, जिसकी शुरुआत दो युवाओं के रिश्ते से हुई थी। गांव के ही दो अलग-अलग समाजों के युवक-युवती एक-दूसरे को जानते थे। दोनों के बीच बातचीत होती थी और धीरे-धीरे उनका रिश्ता गहरा होता गया। लड़की का युवक के घर आना-जाना भी था। छोटा गांव था, इसलिए यह बात परिवार और आसपास के लोगों से छिपी नहीं थी। फिर 4 जुलाई को दोनों अचानक गांव से गायब हो गए। परिवारों ने पहले अपने स्तर पर तलाश की। जब दोनों नहीं मिले तो परिजनों को शक हुआ कि युवक-युवती साथ ही कहीं गए हैं। समाज की बैठक में चाचा को दी चेतावनी कान्हीवाड़ा थाने में शिकायत दर्ज कराई गई। अब मामला सिर्फ दो युवाओं के गायब होने का नहीं रह गया था। यह दो समाजों के बीच तनाव का रूप लेने लगा था। 6 जुलाई को लड़की के परिवार और समाज के लोगों की बैठक हुई। इसमें युवक के चाचा को बुलाया गया। उससे कहा गया कि लड़की को किसी भी तरह वापस लाया जाए। साथ ही चेतावनी दी गई कि अगर लड़की वापस नहीं आई तो इसके गंभीर परिणाम होंगे। युवक का चाचा गांव की पंचायत समिति में सचिव था और कोटवार की जिम्मेदारी भी निभाता था। उसने धमकी को गंभीरता से लिया और पुलिस को इसकी जानकारी दी। युवक का परिवार भी दोनों को तलाश रहा था। पुलिस को सूचना देने के बाद युवक के चाचा को दो दिन का समय दिया गया। दो दिन बाद और बिगड़ गए हालात दो दिन की तलाश के बाद 8 जुलाई को युवक का चाचा गांव लौटा। उसने गांव वालों और लड़की के परिवार को बताया कि दोनों का कोई सुराग नहीं मिला। यहीं से हालात तेजी से बिगड़ने लगे। लड़की के परिवार को लगने लगा कि युवक का परिवार जानबूझकर दोनों को छिपा रहा है। गांव में पहले जिस रिश्ते की चर्चा हो रही थी, अब वही रिश्ता गुस्से और बदले की वजह बन चुका था। फैसला हुआ कि युवक के परिवार को सबक सिखाया जाएगा। रात में बैठक, फिर घर की तरफ बढ़ी भीड़ 8 जुलाई की रात करीब 8:30 बजे फिर बैठक हुई। तय किया गया कि युवक के परिवार से लड़की के बारे में पूछा जाएगा। लेकिन एक समस्या थी। घर में उस समय युवक के पिता और भाई मौजूद नहीं थे। दोनों युवक और लड़की की तलाश में आसपास के गांवों में गए हुए थे। महिलाओं को घसीटकर पंचायत भवन ले गए भीड़ ने घर का दरवाजा तोड़ा और अंदर मौजूद तीन महिलाओं को बाहर निकाल लिया। इसके बाद उन्हें गांव की गलियों से घसीटते हुए पंचायत भवन के पास ले जाया गया। महिलाओं को वहां ले जाने के पीछे एक मकसद यह भी बताया गया कि पूरी घटना गांव के सामने हो और इसका डर दूसरे लोगों तक पहुंचे। 42 आरोपी बनाए गए, महिलाओं के नाम भी शामिल पीड़ित पक्ष की ओर से दर्ज कराई गई रिपोर्ट में बड़ी संख्या में लोगों को आरोपी बनाया गया। कुल 42 लोगों के खिलाफ मामला दर्ज हुआ। इनमें महिलाएं भी शामिल थीं। पुलिस ने सामूहिक बलात्कार और एससी-एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम के तहत केस दर्ज किया। इसके बाद मामला विशेष न्यायालय पहुंचा। पांच साल चली सुनवाई, एक आरोपी की मौत अदालत में करीब पांच साल तक सुनवाई चली। इस दौरान अभियोजन और बचाव पक्ष की ओर से गवाह और साक्ष्य पेश किए गए। सुनवाई के दौरान एक आरोपी की मौत भी हो गई। सुनवाई पूरी होने के बाद अदालत ने 29 आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया। लेकिन 12 आरोपियों को दोषी माना गया। 12 दोषियों को आजीवन कारावास की सजा अदालत ने मानसिंह, सक्कू, दिनेश, सन्जू, मन्जू, रामू, नीलचन्द, राजकुमार, प्रेमचन्द्र, राजकुमार उर्फ ढक्कू, नन्द कुमार और चिन्तामन को आजीवन कारावास की सजा सुनाई। प्रत्येक पर 8,500 रुपए का अर्थदंड भी लगाया गया। इसके बाद दोषी ठहराए गए आरोपियों ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। केस की अपील हाईकोर्ट में लंबित है। क्राइम फाइल्स पार्ट-1 भी पढ़ें… तीन महिलाओं से एक घंटे किया गैंगरेप
मध्य प्रदेश क्राइम फाइल्स में आज ऐसा मामला, जिसने पूरे प्रदेश में सनसनी फैला दी थी। तीन महिलाओं से सामूहिक दुष्कर्म का मामला दिल्ली तक पहुंच गया था। तत्कालीन मुख्यमंत्री उमा भारती को भी इसमें हस्तक्षेप करना पड़ा। पढ़ें पूरी खबर…
