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कूनो के 60 % चीते भारत में जन्मे:नामीबिया से लाए 8 में सिर्फ 3 जिंदा बचे थे, 4 साल में कैसे बदली तस्वीर

चार साल पहले नामीबिया से चीते कूनो लाए गए तो सबसे बड़ा सवाल था कि 70 साल बाद भारत लौटे इस वन्यजीव को यहां फिर से बसाया जा सकेगा या नहीं। शुरुआती दौर में लगातार हुई मौतों से प्रोजेक्ट पर सवाल उठे, लेकिन चार साल बाद तस्वीर बदल गई है। भारत में अब 52 चीते हैं, जिनमें 32 का जन्म यहीं हुआ है। 17 सितंबर 2022 को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कूनो में 8 चीतों को छोड़कर प्रोजेक्ट की शुरुआत की थी। तब से अब तक प्रोजेक्ट ने कई उतार-चढ़ाव देखे। भास्कर ने पीसीसीएफ वाइल्ड लाइफ शमिता राजौरा से बात कर चार साल के चार बड़े पड़ाव समझे। पढ़िए रिपोर्ट…. 4 साल, 4 बड़े पड़ाव: मौतों के संकट से नए इलाकों तक चीतों का विस्तार पहला साल (2022-23): लगातार मौतें और सुप्रीम कोर्ट के सवाल प्रोजेक्ट के पहले साल में 9 चीतों की मौत हुई, जिसके बाद प्रोजेक्ट पर सवाल उठे और मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा। कोर्ट ने चीतों को किसी दूसरी जगह शिफ्ट करने की संभावना पर सवाल किया। अफ्रीका से आए चीतों के सामने कूनो की गर्मी बड़ी चुनौती बनी। तापमान 45 डिग्री से ऊपर पहुंचा। 23 मई को पहले शावक और 25 मई को दो अन्य शावकों की मौत हुई। गर्मी और डिहाइड्रेशन को मौत की वजह बताया गया। 26 मार्च से 2 अगस्त तक 3 वयस्क और 6 शावक, यानी कुल 9 चीतों की मौत हुई। दूसरा साल (2023-24): 13 शावकों से बढ़ी उम्मीद आलोचनाओं के बीच दूसरा साल प्रोजेक्ट के लिए राहत लेकर आया। सालभर अलग-अलग समय पर शावकों का जन्म हुआ, जिनमें 13 एक साल की उम्र पूरी कर सके। इस दौरान अफ्रीका और नामीबिया से आए वयस्क चीते भी भारत के मौसम के अनुकूल हो गए। तीसरा साल (2024-25): खुले जंगल में आवाजाही और राजस्थान तक विस्तार तीसरे साल कूनो की टीम ने चीतों को खुले जंगल में छोड़ना शुरू किया। कुछ चीते कूनो की सीमा से बाहर राजस्थान के जंगलों तक पहुंचे। इसके बाद आसपास के 12 जिलों में उनकी 24×7 मॉनिटरिंग शुरू की गई। स्थानीय लोगों की आशंकाएं दूर करने के लिए ‘चीता मित्रों’ को जागरूकता अभियान में जोड़ा गया। उन्होंने लोगों को चीतों के व्यवहार की जानकारी दी। इसके बाद कूनो से बाहर चीतों को बसाने की दिशा में कदम बढ़ाया गया और 3 चीतों को मंदसौर के गांधी सागर में शिफ्ट किया गया। चौथा साल (2026): नए इलाकों में बस रहा चीता कुनबा चार साल बाद प्रोजेक्ट विस्तार के चरण में पहुंच गया है। कूनो टीम के मुताबिक, चीते प्राकृतिक व्यवहार दिखा रहे हैं और नए इलाकों की ओर बढ़ रहे हैं। गांधी सागर के बाद नौरादेही नेशनल पार्क में भी चीतों को बसाने की तैयारी तेज है। ‘लाना एक बार का ऑपरेशन था, बसाना 24×7 की ड्यूटी’ चीता प्रोजेक्ट पर पीसीसीएफ वाइल्ड लाइफ शमिता राजौरा कहती हैं, “कूनो में जब नामीबिया से चीते लाए गए तो पूरी दुनिया की नजरें हम पर थीं। आज यह प्रोजेक्ट दुनिया के लिए एक उदाहरण बन चुका है।” गांधी सागर के बाद हम चीतों के लिए तीसरा घर भी तैयार कर रहे हैं, जो नौरादेही होगा। कूनो में मौजूद 49 चीतों में 19 की उम्र एक साल से कम है। 17 चीते अभी बाड़ों से बाहर हैं, इनमें 10 नर और 7 मादा हैं। बाड़ों में मौजूद चीतों को भी जल्द खुले जंगल में छोड़ा जाएगा। इन चार सालों में हम 8 से 52 चीतों तक पहुंच चुके हैं। सब कुछ ठीक रहा तो इनकी संख्या में और इजाफा होने की उम्मीद है। चीतों को दूसरी जगहों पर भी स्थापित करना है, इसलिए अभी इनकी संख्या बढ़ना जरूरी है। कूनो के चीते अब राजस्थान तक पहुंच रहे हैं। एक मादा चीते ने खुले जंगल में भी शावकों को जन्म दिया है। चीतों के शिकार के पैटर्न में कोई बड़ा बदलाव नहीं आया है, वे अपनी प्राकृतिक प्रवृत्ति के अनुसार ही खुले जंगल में भी शिकार कर रहे हैं और शावकों को जन्म देकर अपनी संख्या भी बढ़ा रहे हैं। चीते अब भारत की परिस्थितियों के पूरी तरह अनुकूल हो रहे हैं। चीतों की निगरानी कैसे होती है? सैटेलाइट कॉलर से ट्रैकिंग
चीतों के गले में विशेष सैटेलाइट कॉलर लगाया जाता है। यह GPS तकनीक के जरिए उनकी लोकेशन और मूवमेंट ट्रैक करने में मदद करता है। कॉलर से मिले सिग्नल के आधार पर टीम चीतों की गतिविधियों पर नजर रखती है। 24×7 ग्राउंड मॉनिटरिंग तकनीक के साथ वन विभाग की टीमें भी 24×7 चीतों की निगरानी करती हैं। इन टीमों में वन विभाग के कर्मचारी और सुरक्षा कर्मी शामिल होते हैं, जो शिफ्ट में काम करते हैं। पार्क से बाहर निकलने पर मूवमेंट पर नजर जब कोई चीता कूनो की सीमा से बाहर जाता है, तो कॉलर से मिले सिग्नल के आधार पर उसकी लोकेशन का पता लगाया जाता है। इसके बाद ग्राउंड टीम मौके पर पहुंचकर उसके मूवमेंट और व्यवहार पर नजर रखती है। जरूरत पड़ने पर चीते की सुरक्षा और प्रबंधन के लिए आवश्यक कदम उठाए जाते हैं। ऐसे हुआ था भारत के आखिरी चीतों का शिकार छत्तीसगढ़ के कोरिया महाराज रामानुज प्रताप सिंहदेव शिकार के शौकीन थे। उन्होंने बाघ, तेंदुए, हिरण, चीतल और बारहसिंगा समेत कई वन्यजीवों का शिकार किया था। 1948 में एक रात वे बैकुंठपुर से लगे सलखा गांव के जंगल में शिकार के लिए गए। ग्रामीणों ने बताया था कि इलाके में कोई जंगली जानवर लगातार लोगों पर हमला कर रहा है और लोग डरे हुए थे। इसी दौरान पेड़ों के बीच अचानक आंखें चमकीं। महाराज ने उसी दिशा में एक के बाद एक कई गोलियां चलाईं। कुछ देर बाद वहां जाकर देखा गया तो तीन चीते मृत पड़े थे। तीनों नर थे और पूरी तरह वयस्क नहीं हुए थे। उस दौर की शिकार परंपरा के मुताबिक महाराज ने तीनों चीतों के साथ बंदूक लेकर फोटो खिंचवाई। उनके निजी सचिव ने यह फोटो बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसायटी को भेजी और रिकॉर्ड के लिए बताया कि महाराज ने तीन चीतों का शिकार किया था। इसके बाद देश में चीतों के दिखाई देने का कोई आधिकारिक रिकॉर्ड सामने नहीं आया। 1952 में भारत सरकार ने देश में चीते विलुप्त घोषित कर दिए। 1972 में चीतों को फिर बसाने की कवायद शुरू हुई भारत में चीतों की वापसी की शुरुआती पहल का श्रेय एमपी कैडर के 1961 बैच के आईएफएस अधिकारी एमके रंजीत सिंह को दिया जाता है। उन्होंने 1972 में भारत में चीतों को फिर बसाने का विचार दिया और प्रोजेक्ट का प्रारंभिक ड्राफ्ट तैयार किया। उस समय ईरान से चीते लाने का समझौता इस शर्त पर हुआ था कि भारत ईरान को एशियाई शेर देगा। हालांकि, यह योजना आगे नहीं बढ़ सकी। 1981 में रंजीत सिंह मध्यप्रदेश लौटे। वन सचिव रहते हुए उन्होंने कूनो के जंगल को सेंक्चुरी बनाने की पहल की। 2008-09 में चीतों को भारत लाने के लिए नए सिरे से प्रोजेक्ट तैयार हुआ। एमके रंजीत सिंह नामीबिया गए और केंद्र सरकार से चर्चा की। इसके बाद केंद्र और राज्य सरकार के बीच नामीबिया से चीते लाने पर सहमति बनी। उस दौरान तत्कालीन वन एवं पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने एक कमेटी बनाई। 2010 में मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। 2013 में अदालत ने आदेश दिया कि कूनो में चीतों की जगह एशियाई शेर बसाए जाएं। कमेटी की सिफारिश पर केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में रिव्यू पिटीशन दायर कर 2013 के आदेश पर पुनर्विचार की मांग की। जनवरी 2020 में सुप्रीम कोर्ट ने नया आदेश जारी करते हुए कूनो में चीतों को बसाने की अनुमति दे दी।

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