8 साल का अमित लगातार सिरदर्द, नींद की कमी और लंबे स्क्रीन टाइम के बाद अस्पताल पहुंचा। शुरुआत में समस्या सामान्य तनाव और थकान जैसी लगी, लेकिन हालत बिगड़ने पर लंबे इलाज की जरूरत पड़ी। 35 साल के रोहित (परिवर्तित नाम) में भी लगातार तनाव और बिगड़ी लाइफस्टाइल के बीच गंभीर स्वास्थ्य समस्या सामने आई। ऐसे मामले बता रहे हैं कि आईसीयू तक पहुंचने वाले मरीजों की उम्र और गंभीर स्थिति तक पहुंचने के कारणों में बदलाव दिखाई दे रहा है। विशेषज्ञों के मुताबिक, जहां बुजुर्गों में कई पुरानी बीमारियों का एक साथ होना आईसीयू की बड़ी वजह है, वहीं युवाओं में स्ट्रेस, नींद की कमी, स्क्रीन टाइम और कुछ मामलों में पॉइजनिंग चिंता का विषय बन रहे हैं। भोपाल में आयोजित एमपी क्रिटिकॉन 1.0 में इंदौर के क्रिटिकल केयर विशेषज्ञ डॉ. संजय धानुका और डॉ. आनंद सांघी ने आईसीयू में मरीजों के बदलते पैटर्न पर जानकारी दी। विशेषज्ञों के मुताबिक बीमारियों का मूल पैटर्न पूरी तरह नहीं बदला है, लेकिन मरीजों की उम्र, लाइफस्टाइल और गंभीर स्थिति तक पहुंचने के तरीके में बदलाव जरूर दिख रहा है। 20-40 साल में स्ट्रेस, नींद और स्क्रीन टाइम बड़ी समस्या विशेषज्ञों के मुताबिक 20 से 40 साल की उम्र में स्ट्रेस डिसऑर्डर, इंसोम्निया, सिरदर्द और लाइफस्टाइल से जुड़ी समस्याएं बढ़ रही हैं। लंबे समय तक स्क्रीन देखने और देर रात तक जागने का असर नींद, गर्दन, कंधे और मांसपेशियों पर पड़ रहा है। हालांकि इन समस्याओं वाले ज्यादातर मरीज फिलहाल आईसीयू के बजाय ओपीडी में पहुंचते हैं। डॉ. आनंद सांघी के अनुसार लंबे समय तक कंप्यूटर या मोबाइल इस्तेमाल करने वालों को बीच-बीच में ब्रेक लेना चाहिए। सर्वाइकल और शोल्डर एक्सरसाइज भी नियमित रूप से करनी चाहिए। प्रोफेशनल स्ट्रेस घर तक पहुंचा, पॉइजनिंग के मामले भी डॉ. सांघी ने बताया कि प्रोफेशनल स्ट्रेस अब केवल ऑफिस तक सीमित नहीं है। काम के टारगेट, कम समय में ज्यादा काम और घर की जिम्मेदारियों के कारण तनाव बढ़ रहा है। लंबे समय तक रहने वाला तनाव कुछ लोगों में गंभीर मानसिक स्थिति पैदा कर सकता है और कुछ मामलों में आत्महत्या की कोशिश तक सामने आती है। आईसीयू में पॉइजनिंग के मरीज भी आते हैं। इनमें कीटनाशक और सल्फास जैसी चीजों से हुई पॉइजनिंग के मामले शामिल हैं। ऐसे मरीजों के इलाज के साथ उनकी मानसिक स्थिति का भी आकलन किया जाता है और जरूरत पड़ने पर साइकेट्रिस्ट को उपचार में शामिल किया जाता है। बच्चों और छात्रों में भी बढ़ रहा तनाव डॉ. सांघी के मुताबिक तनाव केवल नौकरीपेशा युवाओं तक सीमित नहीं है। बच्चों और छात्रों में भी धैर्य की कमी और तनाव दिखाई दे रहा है। मोबाइल नहीं देने, पढ़ाई के लिए डांटने या अपेक्षाओं के दबाव जैसी छोटी घटनाओं पर भी कुछ बच्चे ज्यादा तनाव में आ जाते हैं। ऐसे मामलों में परिवार की भूमिका अहम है। केवल लक्षण का इलाज करने के बजाय तनाव के मूल कारण को समझना जरूरी है। बुजुर्ग मरीज बढ़े, एक साथ कई बीमारियां बनी वजह क्रिटिकल केयर विशेषज्ञ डॉ. संजय धानुका के मुताबिक आईसीयू में बीमारियों का मूल पैटर्न लगभग वही है, लेकिन बुजुर्ग मरीजों की संख्या बढ़ी है। जीवन प्रत्याशा और स्वास्थ्य सुविधाएं बेहतर होने से लंबे समय तक डायबिटीज, ब्लड प्रेशर और किडनी जैसी बीमारियों के साथ जी रहे मरीजों की संख्या भी बढ़ी है। ऐसे मरीजों में इंफेक्शन, डायलिसिस, बार-बार हार्ट अटैक, एंजाइना या ऑपरेशन के बाद जटिलताओं के कारण आईसीयू की जरूरत पड़ सकती है। बढ़ते कैंसर और बुजुर्ग आबादी का असर भी क्रिटिकल केयर पर दिखाई दे रहा है। ये खबर भी पढ़ें… पाल के युवाओं में ‘ब्लड किक’ का खतरनाक ट्रेंड भोपाल के गांधी मेडिकल कॉलेज में 2026 में जनवरी से अब तक 5 ऐसे युवक इलाज के लिए पहुंचे हैं, जिन्हें ब्लड कंपोनेंट्स की लत है। अस्पताल पहुंचने का पैटर्न लगभग एक जैसा रहा। पूरी खबर पढ़ें
