छतरपुर में कच्चे मकान के मलबे में दबने के बाद करीब आधे घंटे तक हेमा केवट अपनी 2 माह की बेटी हिमांशी को मुंह से सांस देती रही। उसे भरोसा था कि वह अपनी बच्ची को बचा लेगी। खुद भी मलबे में दबी हेमा की सांसें घुट रही थीं, लेकिन वह बेटी को बचाने की कोशिश करती रही। दो दिन बाद होश में आने पर उसे पता चला कि उसकी बेटी और 13 साल की ननद रचना की हादसे में मौत हो चुकी है। बुधवार-गुरुवार की रात करीब 1 बजे हेमा अपनी बेटी हिमांशी और ननद रचना के साथ कच्चे मकान में लकड़ी की खटिया पर सो रही थी। अचानक मकान का छप्पर और मिट्टी की दीवारें भरभराकर गिर गईं। तीनों मलबे में दब गए। हादसे में दोनों बच्चियों की मौत हो गई, जबकि हेमा गंभीर रूप से घायल हो गई। खटिया के सहारे चेहरे के पास बची जगह हेमा ने बताया कि मकान गिरने के बाद उसका पेट, कमर और दोनों पैर मिट्टी में दब गए थे। वह हिल भी नहीं पा रही थी। गनीमत रही कि खटिया का एक हिस्सा नीचे धंस गया और छप्पर की लकड़ी का भारी हिस्सा खटिया की पाटियों पर टिक गया। इससे उसके सीने और चेहरे के आसपास थोड़ी जगह बची रही। वह दोनों कुहनियों के बल उल्टी लेटी हुई थी। बेटी को हाथ से छू नहीं पा रही थी, लेकिन सीने और चेहरे से उसे महसूस कर रही थी। कुछ देर बाद बच्ची की सांसें तेज होने लगीं। हेमा को लगा कि बेटी की हालत बिगड़ रही है, तो उसने उसे मुंह से सांस देना शुरू कर दिया। हेमा के मुताबिक, वह करीब 25 से 30 मिनट तक बेटी को सांस देती रही। उस समय उसे यह पता नहीं था कि बच्ची की सांसें थम चुकी हैं। वह खुद भी मलबे में दबी थी और सांस लेने में परेशानी हो रही थी, लेकिन बेटी को बचाने की उम्मीद में संघर्ष करती रही। मोबाइल की टॉर्च दिखी तो जगी बचने की उम्मीद मलबे के अंदर हेमा को बाहर की आवाजें और कुछ भी साफ दिखाई नहीं दे रहा था। कुछ देर बाद उसे ऊपर हलचल महसूस हुई। मिट्टी हटने लगी और मलबे के बीच से मोबाइल की टॉर्च की रोशनी दिखाई दी। हेमा ने बताया कि टॉर्च की रोशनी दिखते ही उसे लगा कि अब बचाव दल उन तक पहुंच गया है। बाहर से लोगों की आवाजें सुनाई दीं। करीब आधे घंटे की मशक्कत के बाद उसे मलबे से बाहर निकाला गया। वह उस समय बेहोश थी। होश आने पर उसने खुद को छतरपुर जिला अस्पताल के आईसीयू में पाया। परिजनों ने कुछ समय तक नहीं बताई बच्ची की मौत अस्पताल में हेमा की हालत को देखते हुए परिजनों ने उसे दोनों बच्चियों की मौत की जानकारी नहीं दी। उससे कहा गया कि उसकी 2 माह की बेटी हिमांशी पीआईसीयू में भर्ती है और ननद रचना दूसरे वार्ड में भर्ती है। बाद में जब हेमा को सच्चाई पता चली तो वह स्तब्ध रह गई। जिस बेटी को बचाने के लिए वह मलबे के नीचे अपनी जान की परवाह किए बिना संघर्ष करती रही, वह उसे बचा नहीं सकी। बिजली गुल होने के बाद मोबाइल की रोशनी में रेस्क्यू हेमा की सास फूला बाई केवट ने बताया कि मकान गिरने की आवाज सुनकर परिजन और आसपास के लोग मौके पर पहुंचे। हादसे में बिजली की लाइन भी टूट गई थी, जिससे इलाके में अंधेरा हो गया। इसके बाद लोगों ने मोबाइल और बैटरी की रोशनी में मलबा हटाना शुरू किया। परिजनों और आसपास के लोगों ने हाथों से मिट्टी हटाई। घर में मौजूद बर्तन और खाना बनाने के सामान की मदद से भी मलबा हटाया गया। करीब आधे घंटे की मशक्कत के बाद तीनों को बाहर निकाला गया। तब तक दोनों बच्चियों की मौत हो चुकी थी और हेमा गंभीर रूप से घायल थी। कमर और पीठ में गंभीर चोट, सहारे से बैठ रही फूला बाई के मुताबिक, हेमा की कमर, पीठ, पेट और कमर के नीचे के हिस्से में गंभीर चोटें आई हैं। वह अभी खुद से ठीक से उठ-बैठ नहीं पा रही है। उसे सहारे की जरूरत पड़ रही है और फिलहाल चलना भी संभव नहीं है। मलबे के नीचे करीब आधे घंटे तक जिंदगी और मौत से जूझती हेमा के लिए उस रात सबसे बड़ी चिंता अपनी दुधमुंही बेटी की थी। उसे बचाने की उम्मीद में वह खुद की तकलीफ भूलकर लगातार उसकी सांसों के लिए कोशिश करती रही। इस मामले से जुड़ी खबर पढ़ें…. छतरपुर में कच्चा मकान ढहने से दो बच्चियों की मौत:2 माह की नातिन और 13 साल की बेटी मलबे में दबीं छतरपुर जिले के हिनौता थाना क्षेत्र के क्योटा गांव में बुधवार-गुरुवार की दरमियानी रात करीब 1 बजे बड़ा हादसा हो गया। परिवार के लोग घर के अंदर सो रहे थे, तभी कच्चा मकान और उसकी दीवार अचानक भरभराकर गिर गई। पूरी खबर पढ़ें
