मध्य प्रदेश लोकायुक्त और EOW ने हाल ही में अलग-अलग विभागों के अफसरों के खिलाफ छापे की कार्रवाई की। जांच में कई मामलों में आय से अधिक संपत्ति मिलने की बात सामने आई। भास्कर की पड़ताल में भ्रष्टाचार के चार अलग-अलग पैटर्न सामने आए। इनमें समानता यह थी कि अफसरों पर अपने पद और अधिकार का निजी फायदे के लिए इस्तेमाल करने के आरोप हैं। सवाल है कि लंबे समय तक चली इन गड़बड़ियों की जानकारी विभागीय निगरानी तंत्र को क्यों नहीं हुई? विधानसभा में पेश आंकड़ों के मुताबिक, 2022 से अब तक लोकायुक्त ने 1,063 मामले दर्ज किए और 1,379 अफसर जांच के दायरे में आए। इनमें सिर्फ 7 मामलों में आरोप सिद्ध हुए, यानी कन्विक्शन रेट 0.65% रहा। भास्कर ने एक्सपर्ट से समझा कि भ्रष्टाचार रोकने वाली व्यवस्था में कौन-से लूपहोल हैं और उन पर कैसे लगाम लगाई जा सकती है। पढ़िए रिपोर्ट… क्या मिला: लोकायुक्त के मुताबिक, 33 साल की सेवा में सोमिल की वैध आय करीब 2 करोड़ रुपए होनी चाहिए थी, जबकि कुल संपत्ति करीब 17 करोड़ रुपए मिली। यह अनुमानित वैध आय से 258% अधिक बताई गई। कार्रवाई में घर से 4 किलो चांदी, 300 ग्राम सोना और 3 लाख रुपए नकद मिले। सिलिकॉन सिटी में 1.20 करोड़ रुपए का तीन मंजिला मकान, पीथमपुर में बेटे के नाम फैक्टरी और बहू व रिश्तेदारों के नाम पर ‘कर्नश पावरजोन’ कंपनी से जुड़े दो औद्योगिक प्लांट मिलने की बात भी सामने आई। कमाई का पैटर्न: तकनीकी विभाग का प्रमुख होने के कारण सोमिल के पास टेंडर और ठेकों की निगरानी की जिम्मेदारी थी। आरोप है कि इस पद का इस्तेमाल पसंदीदा फर्मों को ठेके दिलाने में किया गया। बिजली लाइन, ट्रांसफॉर्मर और मेंटेनेंस से जुड़े कामों में चयनित ठेकेदारों को फायदा पहुंचाने और गुणवत्ता से समझौते के आरोप भी हैं। सूत्रों के मुताबिक, कमीशन के लेन-देन को छिपाने के लिए रिश्तेदारों के नाम पर डमी कंपनियां बनाई गईं। इन्हें सीधे वर्क ऑर्डर जारी किए जाते थे। क्या मिला: 2007 में भर्ती हुए गोरखे का वेतन 2015 में ₹18,711 था, जो 2025 में बढ़कर ₹54,664 हो गया। उनकी पत्नी कीर्ति गोरखे दंत चिकित्सालय में लाइब्रेरियन हैं और उनका वेतन ₹42,402 है। जांच अवधि में दंपती की कुल वैध आय ₹1 करोड़ 11 लाख 31 हजार 383 आंकी गई, जबकि ₹2 करोड़ 13 लाख 85 हजार से अधिक की चल-अचल संपत्ति मिली। यह वैध आय से 108% अधिक बताई गई। कमाई का पैटर्न: सरकारी अस्पतालों में दवाइयों की बड़ी खरीद केंद्रीकृत होती है, जबकि इमरजेंसी के लिए स्थानीय स्तर पर खरीद की व्यवस्था है। आरोप है कि गोरखे ने इसी व्यवस्था का फायदा उठाया। स्थानीय फर्मों से मिलीभगत कर कागजों पर दवाइयों की आपूर्ति दिखाई गई और बिल तैयार किए गए। जांच में गोरखे से जुड़ी 5 से 6 डमी फर्मों की भूमिका भी सामने आने की बात कही गई है। आरोप है कि इन्हीं के जरिए ऑर्डर, नोटशीट और बिल की प्रक्रिया नियंत्रित कर भुगतान हासिल किया गया। क्या मिला: लोकायुक्त की कार्रवाई में पांडेय के पास ₹4.59 करोड़ की अनुपातहीन संपत्ति मिलने की बात सामने आई। उनकी वैध आय करीब ₹80 लाख आंकी गई, जबकि संपत्ति इससे 474.84% अधिक बताई गई। कार्रवाई के बाद निगम आयुक्त क्षितिज सिंघल ने उन्हें निलंबित कर दिया। जांच में पत्नी भावना पांडेय के नाम पर आनंद नगर एक्सटेंशन में G+3 इमारत मिली, जिसकी निर्माण लागत करीब ₹1.20 करोड़ बताई गई। चितावद के गुलमोहर बगीचा क्षेत्र में भी पत्नी के नाम पर G+2 इमारत मिली, जिसमें हॉस्टल संचालित हो रहा था। कमाई का पैटर्न: पांडेय के जिम्मे संपत्तियों का रिकॉर्ड और टैक्स वसूली थी। आरोप है कि नोटरी के आधार पर नामांतरण किए जाते थे। इससे बिना रजिस्ट्री वाली संपत्तियों के आधार पर लोन लेने की स्थिति बनती और सरकार को स्टांप शुल्क का नुकसान होता। कई मामलों में मौके पर मकान या कमर्शियल बिल्डिंग होने के बावजूद निगम रिकॉर्ड में संपत्ति को खाली प्लॉट दर्ज कर कम टैक्स वसूले जाने का आरोप है। बहुमंजिला इमारतों में 20 से 40 किराएदार होने के बावजूद एक ही टैक्स लगाने और बाकी राशि रिश्वत के तौर पर लेने का भी आरोप है। क्या मिला: लोकायुक्त की कार्रवाई में कंडवाल के पास करीब ₹9.5 करोड़ की संपत्ति मिलने की बात सामने आई। इसमें पीथमपुर औद्योगिक क्षेत्र के पास 12 प्लॉट और इंदौर में एक कमर्शियल प्लॉट शामिल हैं। उनके घर में हाईटेक जिम और डिपार्टमेंटल स्टोर संचालित होने की जानकारी मिली। शुरुआती जांच में संपत्ति उनकी वैध आय से 241% अधिक होने के प्रमाण मिलने की बात कही गई है। कमाई का पैटर्न: आरोप है कि कुपोषण और आंगनवाड़ी मेंटेनेंस के बजट में वित्तीय गड़बड़ियां की गईं। बच्चों को दिए जाने वाले मिड-डे मील की गुणवत्ता से जुड़े मामलों को नजरअंदाज करने के भी आरोप हैं। संभाग स्तर के अधिकारी के रूप में कंडवाल के अधीन कई जिलों के अधिकारी थे। उनकी सीआर लिखने और ट्रांसफर-पोस्टिंग में भूमिका थी। आरोप है कि जिला स्तर की वित्तीय गड़बड़ियों को दबाने के बदले अधिकारियों से रकम ली जाती थी। एक्सपर्ट बोले- भ्रष्टाचार करने वालों में डर जरूरी, मामलों में जल्द सजा मिले
इन चारों मामलों में भ्रष्टाचार के आरोपों के साथ विभागीय निगरानी व्यवस्था पर भी सवाल उठते हैं। रिटायर्ड IAS डॉ. मोहन गुप्ता कहते हैं कि भ्रष्टाचार करने वालों में कानून का डर होना जरूरी है। इसके लिए मामलों में जल्द सजा का प्रावधान होना चाहिए। वे उत्तर प्रदेश की योगी सरकार की अपराध नियंत्रण नीति का उदाहरण देते हैं। उनका कहना है कि नीति सही है या गलत, इस पर वे टिप्पणी नहीं कर रहे, लेकिन अपराधियों में कार्रवाई का डर दिखता है। उनका मानना है कि भ्रष्टाचार के मामलों में केस दर्ज होने के बाद लंबे समय तक मुकदमे नहीं चलने चाहिए। जल्द सजा होने से भ्रष्टाचार करने वालों में कानून का डर बढ़ेगा। ईओडब्ल्यू ने 2.8 प्रतिशत मामलों में ही एफआईआर दर्ज की
विधानसभा में एक सवाल के जवाब में सरकार ने बताया कि 2020 से जनवरी 2026 तक ईओडब्ल्यू को कुल 19775 शिकायतें मिलीं, यानी हर साल औसतन तीन हजार से ज्यादा। जनवरी 2026 में 437 शिकायतें दर्ज हुईं, लेकिन करीब बीस हजार शिकायतों में से केवल 2624 यानी लगभग 14 प्रतिशत ही औपचारिक रूप से दर्ज की गईं। सिर्फ 566 मामलों में एफआईआर दर्ज की गई, जो कुल शिकायतों का 2.8 फीसदी है। लोकायुक्त के 1063 दर्ज मामलों में से सिर्फ 7 में सजा
विधानसभा में पेश आंकड़ों के मुताबिक, 2022-23 से अब तक लोकायुक्त को 1884 शिकायतें मिलीं और 1063 आपराधिक मामले दर्ज किए गए। इनमें 393 मामलों की जांच पूरी हुई, लेकिन 134 मामले अब भी अभियोजन की मंजूरी का इंतजार कर रहे हैं। केवल 39 मामलों में प्रारंभिक अभियोजन कार्रवाई शुरू हुई, 208 मामलों में चालान पेश हुए और दोषसिद्धि सिर्फ 7 मामलों में हुई।
