इंदौर के भागीरथपुरा में दूषित पानी से हुई 36 मौत की जांच को लेकर मंगलवार को हाईकोर्ट में अहम सुनवाई हुई। पीड़ितों की ओर से दायर जनहित याचिका में एडवोकेट ने कोर्ट से 600 से ज्यादा पेज की जांच रिपोर्ट अध्ययन के लिए उपलब्ध कराने की मांग की। कोर्ट ने कहा कि रिपोर्ट को सार्वजनिक रूप से सर्कुलेट नहीं किया जा सकता। रिपोर्ट हाईकोर्ट रजिस्ट्रार को सौंप दी गई है। संबंधित एडवोकेट रजिस्ट्रार के पास जाकर रिपोर्ट का अध्ययन कर सकते हैं। सुनवाई के दौरान भागीरथपुरा त्रासदी के साथ इंदौर में अब भी सामने आ रहे दूषित पानी के मामलों का मुद्दा भी उठा। कोर्ट ने नगर निगम से पूछा-दूषित पानी क्यों सप्लाई हो रहा याचिकाकर्ता के एडवोकेट ने कोर्ट को बताया कि शहर में अब भी दूषित पानी सप्लाई किया जा रहा है। उन्होंने बताया कि पिछले दिनों दैनिक भास्कर में शहर में दूषित पानी के सैंपल की रिपोर्ट को लेकर खबर प्रकाशित की है। इस पर कोर्ट ने नगर निगम से पूछा कि इस मामले में अब तक क्या संज्ञान लिया है और शहर के कई हिस्सों में स्वच्छ पानी क्यों नहीं पहुंच रहा है। निगम की ओर से जवाब के लिए समय मांगा गया, जिसे कोर्ट ने स्वीकार कर लिया। भागीरथपुरा के बाद भी नहीं थमा गंदे पानी का मुद्दा भागीरथपुरा में 26 दिसंबर 2025 से 25 फरवरी 2026 के बीच दूषित पानी से 36 लोगों की मौत हुई थी। करीब छह महीने बाद इस मामले की जांच रिपोर्ट हाईकोर्ट के सामने है। इसी सुनवाई में शहर में दूषित पानी को लेकर सामने आ रही शिकायतों का मुद्दा उठने से यह मामला केवल पुरानी त्रासदी की जिम्मेदारी तय करने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि वर्तमान जलापूर्ति व्यवस्था पर भी सवाल खड़े हो गए हैं। हाईकोर्ट ने 27 जनवरी 2026 को रिटायर्ड जस्टिस सुशील कुमार गुप्ता की अध्यक्षता में जांच आयोग गठित किया था। आयोग ने दूषित पानी के कारण, अधिकारियों की भूमिका, प्रभावित लोगों को राहत और मुआवजे समेत विभिन्न पहलुओं की जांच की है। आयोग ने 20 अगस्त को 600 से ज्यादा पन्नों की रिपोर्ट कोर्ट में पेश की थी। रिपोर्ट में क्या सामने आया, अभी राज रिपोर्ट सीलबंद होने के कारण फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि आयोग ने दूषित पानी के लिए किन कारणों को जिम्मेदार माना है और किन अधिकारियों या कर्मचारियों की भूमिका तय की है। आयोग ने पेयजल पाइपलाइन में सीवेज के पानी के मिलने, पाइपलाइन की तकनीकी खराबी या क्षति और औद्योगिक प्रदूषण की संभावनाओं की भी जांच की है। मेडिकल रिकॉर्ड और अन्य साक्ष्यों के आधार पर यह भी जांचा गया है कि दूषित पानी से कितने लोग बीमार हुए और 36 मौतों में कितनी मौतों का सीधा संबंध दूषित पानी से था। निगम, प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग के रिकॉर्ड खंगाले जांच आयोग ने नगर निगम, इंदौर विकास प्राधिकरण, जिला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग समेत संबंधित विभागों से रिकॉर्ड जुटाए। प्रभावित लोगों के बयान लिए गए और घटना के दौरान राहत, उपचार तथा स्वास्थ्य व्यवस्थाओं की भी समीक्षा की गई। तत्कालीन निगम कमिश्नर दिलीप यादव, तत्कालीन अपर कमिश्नर रोहित सिसोनिया, कार्यपालन यंत्री संजीव श्रीवास्तव और स्थानीय पार्षद कमल वाघेला समेत कई अधिकारियों-कर्मचारियों की भूमिका भी जांच के दायरे में रही है। हालांकि रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं होने के कारण अभी किसी की जिम्मेदारी तय होने की पुष्टि नहीं हुई है। अब अगली नजर निगम के जवाब पर भागीरथपुरा की त्रासदी की जांच रिपोर्ट पर कोर्ट आगे सुनवाई करेगा। वहीं, शहर में दूषित पानी को लेकर उठे नए सवाल पर नगर निगम को भी जवाब देना होगा। ऐसे में अगली सुनवाई में एक तरफ 36 मौतों की जिम्मेदारी तय करने वाली रिपोर्ट के निष्कर्ष अहम होंगे, तो दूसरी तरफ यह भी देखना होगा कि भागीरथपुरा के बाद जलापूर्ति व्यवस्था में क्या सुधार हुए और इसके बावजूद गंदे पानी की शिकायतें क्यों सामने आ रही हैं।
