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‘मंदिरों की लूट’ पर भाजपा विधायक का वीडियो:चिंतामणि मालवीय बोले- सनातन बोर्ड बनना जरूरी, राज्य नियंत्रण से मुक्त कर मंदिर हिंदूओं को लौटाए जाएं

आलोट से भाजपा विधायक डॉ. चिंतामणि मालवीय ने हिंदू मंदिरों की संपत्ति और उनके प्रबंधन को लेकर बड़ा सवाल उठाया है। उन्होंने सोशल मीडिया पर ‘भारतीय मंदिर संपदा : शोषण और समाधान-एक विवेचन’ शीर्षक से वीडियो जारी कर मंदिरों की संपत्ति के इतिहास, सरकारी नियंत्रण, दान, जमीन और आय के इस्तेमाल पर विस्तार से अपनी बात रखी। मालवीय ने मंदिरों को राज्य सरकारों के नियंत्रण से मुक्त कर सनातन बोर्ड बनाने का सुझाव दिया है। दान की परंपरा से मंदिर बने संपन्नता के केंद्र मालवीय ने कहा कि भारतीय समाज में दान, सहयोग, करुणा और सेवा की परंपरा रही है। धार्मिक त्योहारों और अवसरों पर दान देना परिवारों की संस्कृति का हिस्सा रहा है। राजाओं और महाराजाओं ने भी मंदिरों को बड़ी मात्रा में दान दिया। इसी वजह से हजारों वर्षों में मंदिर धार्मिक और सांस्कृतिक केंद्रों के साथ संपन्नता के केंद्र भी बनते गए। उन्होंने सोमनाथ मंदिर पर 1026 में महमूद गजनवी के हमले का उदाहरण देते हुए मंदिर में मौजूद सोना, मुद्राएं और आभूषणों का उल्लेख किया। मालवीय ने कहा कि यदि उस समय की संपदा को आज के मूल्य से आंका जाए तो उसकी कीमत बहुत बड़ी हो सकती है। मंदिरों के प्रबंधन में सरकारी नियंत्रण पर सवाल भाजपा विधायक ने कहा कि आजादी के बाद विभिन्न राज्यों में बने कानूनों के जरिए मंदिरों की संपत्ति, दान और जमीन के प्रबंधन में सरकारों की भूमिका बढ़ती गई। उन्होंने सवाल उठाया कि श्रद्धालु जिस धार्मिक भावना से मंदिर में दान करता है, उस धन का उपयोग मंदिर और समाज के धार्मिक-सामाजिक हितों में ही होना चाहिए। मालवीय ने अंग्रेजी शासन के दौरान वक्फ संपत्तियों के नियमन के लिए बनाए गए कानून का भी उल्लेख किया और कहा कि मंदिरों की संपत्ति के लिए वैसी व्यवस्था विकसित नहीं हुई। बड़े मंदिरों की संपत्ति और आय का हवाला मालवीय ने पद्मनाभस्वामी, शिरडी साईं बाबा, वैष्णो देवी, सिद्धिविनायक, महाकाल और काशी विश्वनाथ मंदिरों का उदाहरण देते हुए कहा कि देश के कई मंदिरों के पास बड़ी संपत्ति है और हर साल करोड़ों रुपए का दान प्राप्त होता है। उन्होंने पद्मनाभस्वामी मंदिर के खजाने और शिरडी, वैष्णो देवी व सिद्धिविनायक मंदिरों की आय का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि कुछ बड़े मंदिरों की आय से अस्पताल, शिक्षण संस्थान और अन्य सामाजिक गतिविधियां संचालित हो रही हैं, लेकिन दूसरी ओर देश में बड़ी संख्या में छोटे मंदिर रखरखाव के अभाव में जर्जर हो रहे हैं। ऐसे मंदिरों तक संपन्न मंदिरों के संसाधन पहुंचाने की व्यवस्था होनी चाहिए। मंदिरों की जमीन को लेकर भी उठाया सवाल विधायक ने मंदिरों की जमीन के रिकॉर्ड और इस्तेमाल को लेकर भी सवाल उठाए। उन्होंने ओडिशा और तमिलनाडु सहित कुछ राज्यों का उदाहरण देते हुए कहा कि मंदिरों के पास रही जमीन का पूरा रिकॉर्ड स्पष्ट होना चाहिए। जमीन किसके नाम दर्ज है और उसका उपयोग किस तरह हो रहा है, इसकी निगरानी जरूरी है। उन्होंने कहा कि मंदिरों की संपत्ति का संरक्षण केवल बड़े मंदिरों तक सीमित नहीं रहना चाहिए। कम आय वाले मंदिरों की जमीन और संपत्ति को भी सुरक्षित रखना जरूरी है। मंदिरों की आय से अस्पताल, स्कूल और यूनिवर्सिटी चलाने का सुझाव मालवीय ने कहा कि मंदिरों की संपदा का पारदर्शी और बेहतर प्रबंधन किया जाए तो इससे शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में बड़ा काम हो सकता है। मंदिरों की आय से यूनिवर्सिटी, कॉलेज, स्कूल और अस्पताल चलाए जा सकते हैं। जरूरतमंदों की सहायता और धार्मिक-सांस्कृतिक गतिविधियों को भी इससे बढ़ावा दिया जा सकता है। उन्होंने कहा कि मंदिर में आने वाला दान श्रद्धालु की आस्था से जुड़ा होता है। इसलिए दान के उपयोग की पारदर्शी व्यवस्था होने पर लोगों का भरोसा और दान दोनों बढ़ सकते हैं। सनातन बोर्ड बनाने का प्रस्ताव मालवीय ने मंदिरों को राज्य सरकारों के सीधे नियंत्रण से मुक्त करने के लिए सनातन बोर्ड बनाने का प्रस्ताव रखा। उनके अनुसार यह बोर्ड मंदिरों की संपत्ति, जमीन, आय और प्रबंधन की निगरानी कर सकता है। उन्होंने कहा कि व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए जिसमें मंदिरों की संपदा सुरक्षित रहे और उसका उपयोग धार्मिक एवं सामाजिक उद्देश्यों के लिए हो। उन्होंने मंदिरों में पूजा करने वाले परंपरागत पुजारी परिवारों की भूमिका सुरक्षित रखने की भी बात कही। उनके मुताबिक मंदिरों से जुड़ी परंपरागत व्यवस्थाओं का पंजीयन कर उन्हें संरक्षित किया जाना चाहिए। बड़े मंदिरों से छोटे मंदिरों को जोड़ने का मॉडल मालवीय ने मंदिर प्रबंधन के लिए एक मॉडल भी सुझाया। उन्होंने कहा कि बड़े मंदिरों के अधीन आसपास के छोटे मंदिरों का पंजीयन किया जा सकता है। बड़े मंदिरों की आय से छोटे मंदिरों का रखरखाव, पूजा और अन्य धार्मिक गतिविधियां संचालित की जा सकती हैं। उन्होंने इसकी तुलना विश्वविद्यालय व्यवस्था से करते हुए कहा कि जैसे एक विश्वविद्यालय के अधीन कई संस्थान होते हैं, उसी तरह बड़े मंदिरों के अधीन छोटे मंदिरों की व्यवस्था विकसित की जा सकती है। सभी वर्गों को प्रतिनिधित्व देने की बात मालवीय ने प्रस्तावित सनातन बोर्ड में समाज के सभी वर्गों को प्रतिनिधित्व देने की बात कही। उन्होंने अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और पिछड़ा वर्ग सहित विभिन्न सामाजिक वर्गों की भागीदारी सुनिश्चित करने का सुझाव दिया। उन्होंने कहा कि मंदिरों की प्रशासनिक व्यवस्था में व्यापक समाज की भागीदारी होनी चाहिए। साथ ही उन्होंने स्पष्ट किया कि पूजा-पद्धति और मंदिर प्रशासन अलग-अलग विषय हैं। पूजा और धार्मिक परंपराओं का संचालन शास्त्र एवं परंपरा के अनुसार होना चाहिए, जबकि प्रशासनिक व्यवस्था में समाज के विभिन्न वर्गों को प्रतिनिधित्व दिया जा सकता है। शुल्क के बजाय पारदर्शी दान व्यवस्था पर जोर मालवीय ने मंदिरों में शुल्क व्यवस्था को लेकर भी सवाल उठाया। उनका कहना था कि श्रद्धालु को यदि यह भरोसा हो कि उसका दान मंदिर, धर्म और समाज के हित में इस्तेमाल होगा तो दान की प्रवृत्ति और मजबूत होगी। इसलिए पारदर्शिता और जवाबदेही के साथ दान व्यवस्था विकसित की जानी चाहिए। अंत में मालवीय ने कहा कि मंदिरों की संपदा और धार्मिक परंपराएं पूर्वजों की विरासत हैं। वर्तमान पीढ़ी की जिम्मेदारी है कि इस संपदा को सुरक्षित रखे और उसका उपयोग शिक्षा, स्वास्थ्य, सेवा और धार्मिक-सांस्कृतिक गतिविधियों के लिए बेहतर तरीके से किया जाए।

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