10 अप्रैल 2022 की रामनवमी के दौरान खरगोन में हिंसा हुई थी। इस हिंसा के बाद 35 मुकदमे खरगोन कोर्ट में पहुंचे। अपर सत्र न्यायालय ने हाल ही में इनमें से एक केस की सुनवाई करते हुए सभी 11 आरोपियों को बरी कर दिया।
अभी 34 और मुकदमों में अदालत के फैसले का इंतजार है। जिस एक केस में कोर्ट ने आदेश दिया है, उस केस को लेकर कुछ फरियादियों का कहना है कि गवाहों ने डर के कारण अपने बयान बदल दिए और आरोपियों की शिनाख्त से इनकार कर दिया।
इस केस में सरकारी वकील के तौर पर पैरवी करने वाले युवराज गुजराथी भी इसी ओर इशारा करते हैं। अब जो 34 केस अदालत में बचे हैं, उनसे जुड़े गवाहों को भी धमकाने की बात कही जा रही है। वहीं कांग्रेस के नेता भाजपा पर झूठे केस बनवाने के आरोप लगा रहे हैं। दंगे के चार साल बाद खरगोन में क्या बदला है, क्या हिंदू और मुस्लिम पक्ष के बीच कड़वाहट कम हुई है या अब भी मन के घाव हरे हैं, गवाहों के डर की पूरी कहानी क्या है?
इस ग्राउंड रिपोर्ट में पढ़िए-
दंगे के करीब 4 साल बीत चुके हैं। शहर की गलियों में अब आवाजाही सामान्य है। बच्चे स्कूल जाते हैं और दुकानें रोज की तरह खुलती-बंद होती हैं। बाहर से देखने पर लगता है कि शहर ने शायद दंगे की उस शाम को बहुत पीछे छोड़ दिया है। अब सबकुछ पूरी तरह सामान्य है। हालांकि ऐसा नहीं है। कुछ गलियां ऐसी हैं, जहां चार साल का फासला भी उस स्याह शाम के दाग नहीं मिटा सका है। भावसार मोहल्ला, भाटवाड़ी मोहल्ला, तालाब चौक, संजय नगर, आनंद नगर, टवड़ी मोहल्ला, काजीपुरा और खसखसवाड़ी सबसे ज्यादा प्रभावित थे। यहां अब कई लोग तो उस शाम को याद करने से भी कतराते हैं। चार साल में क्या-क्या बदला… पॉलिटिक्स में भाजपा-ओवैसी को फायदा जिन्होंने राम नवमी के जुलूस पर पत्थर बरसाए हैं, उनके घर मिट्टी में मिला देंगे। दंगे के बाद यह कहने वाले मध्य प्रदेश के तत्कालीन गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा अब सरकार में नहीं हैं।
दतिया से एक बार चुनाव हार चुके तो दूसरी बार टिकट ही नहीं मिला। शिवराज सिंह चौहान तब सीएम थे और उन्होंने दंगाइयों से जुर्माना वसूल कर पीड़ितों को दिलाने का भरोसा दिलाया था। अब शिवराज सीएम नहीं हैं, लेकिन वादा अब तक अधूरा है। दंगे के बाद हुए विधानसभा चुनाव में सबसे ज्यादा नुकसान कांग्रेस को हुआ। खरगोन सीट पर रवि जोशी अपनी विधायकी नहीं बचा सके और भाजपा से हार गए। वहीं जिले की दो अन्य सीटें भी कांग्रेस के हाथ से निकल गईं। दंगे के बाद हुए खरगोन नगर पालिका चुनाव में पहली बार असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM के तीन पार्षद जीत गए। इससे पहले शहर में AIMIM का खाता भी नहीं खुला था। चार साल बाद भी जो कायम है… नुकसान की भरपाई कभी नहीं हो सकती यूं तो उस दंगे में बड़ी तादाद में लोग घायल हुए। संपत्ति को नुकसान पहुंचाया गया। पुलिस टीम के साथ दंगों को कंट्रोल करने गए तत्कालीन एसपी सिद्धार्थ चौधरी के बाएं पैर में गोली लगी थी। पथराव में टीआई बीएल मंडलोई का सिर भी फूटा था। लेकिन इस्लामपुरा के रहने वाले 28 साल के इदरिस पिता सद्दाम खान के परिवार का दर्द सबसे बड़ा था। इबरेश की मौत रामनवमी जुलूस के दौरान हिंसा में हो गई थी। इबरेश हमले में घायल हो गए थे। जिसके बाद पुलिस ने उसे अस्पताल पहुंचाया था, लेकिन उनकी मौत हो गई थी। 35 एफआईआर में एक एफआईआर इदरिस के परिवार ने भी दर्ज कराया है। दूसरी ओर, इस दंगे का शिकार 16 साल का शिवम शुक्ला भी हुआ। वो रामनवमी का जुलूस देखने गया था, तभी दंगे भड़क गए। उसे घायल हालत में अस्पताल में भर्ती कराया। सिर की हड्डी का कुछ हिस्सा टूटकर ब्रेन में घुस गया था। अब शिवम 20 साल का है। उसके शरीर का बायां हिस्सा कमजोर हो गया है। सिर पर लगे घाव और ऑपरेशन के निशान अब भी उसे उस हादसे की याद दिलाते हैं। शिवम मामा सुरेंद्र जोशी के साथ खरगोन के जमींदार मोहल्ले में रहकर बीकॉम की पढ़ाई कर रहा है। इस हादसे ने उसे शरीर से कुछ कमजोर जरूर किया है, लेकिन उसकी हिम्मत नहीं टूटी है। वो एमबीए की पढ़ाई करना चाहता है। माता-पिता धार जिले के निसरपुर में खेती-किसानी करते हैं।
अब ये डर सता रहा है… कहीं दूसरे केस में भी गवाह न मुकर जाएं भाटवाड़ी इलाके में हुई हिंसा से जुड़े एक केस के सभी 11 आरोपी बरी हो गए हैं। गवाहों ने आरोपियों को पहचानने से इनकार कर दिया। मामले में बतौर सरकारी वकील पैरवी कर रहे युवराज गुजराथी इसे गवाहों का डर बताते हैं। उन्होंने कहा कि भाटवाड़ी मोहल्ला मुस्लिम बहुल इलाका है। वहां सिर्फ पांच-छह हिंदू परिवार रहते हैं। परिवार के पुरुष कारोबारी हैं। दिन में दुकान पर चले जाते हैं, घर में महिला और बच्चे रह जाते हैं। ऐसे में उन्हें सुरक्षा को लेकर डर रहता है। सभी आरोपी मुस्लिम समुदाय से ही थे। खरगोन दंगे से जुड़े एक अन्य केस के फरियादी प्रकाश भावसार ने बताया कि उनके इलाके में 22 लोगों ने हमला बोला था। हमले में वह गंभीर घायल हो गए थे। प्रकाश कहते हैं कि अब उनके केस का गवाह भी पेशी पर नहीं आ रहा। जब उन्होंने गवाह से इसका कारण पूछा तो उसने बताया कि जान का खतरा है। धमकी मिल रही है। अब उन्हें अंदेशा है कि अगर ऐसा ही रहा तो उनके केस के गवाह के मुकरने से उनके केस के भी सभी 22 आरोपी बरी हो सकते हैं। हिंदू-मुस्लिम इलाके के बीच बनी दीवार अब भी कायम हिंदू बहुल जमींदार मोहल्ला और मुस्लिम आबादी वाले खसखसवाड़ी के बीच दंगे के बाद प्रशासन ने दीवार बना दी थी। मकसद था कि दोनों संप्रदाय के लोग एक-दूसरे के इलाके से दूर रहें, ताकि शांति बहाल रहे। चार बरस बाद अब भी ये दीवार कायम है। धीरे-धीरे ही सही भरोसा बहाल हो रहा है… 35 मुकदमों में 5 मुकदमे मुस्लिम समुदाय ने भी किए हैं। रामनवमी के जुलूस पर जिस तालाब चौक में पथराव शुरू हुए थे, जब हम वहां पहुंचे तो अब चार साल बाद सब सामान्य दिखा। मुस्लिम पक्ष के करीब 15 लोगों और समाज के प्रतिनिधियों से हमने बात की। उन्होंने ऑन कैमरा तो कुछ नहीं कहा, लेकिन गवाहों को डराने के आरोप पर ऑफ कैमरा बोले कि इस समय देश-प्रदेश के जो हालात हैं, क्या उसमें कोई किसी हिंदू परिवार को डरा सकता है? ये आरोप बेबुनियाद है। प्रशासन ने झूठे केस लगाए थे तो गवाह किसी आरोपी को कैसे पहचानते। दंगे के बाद मुस्लिम दुकानदारों से सामान न खरीदने का कैंपेन भी चलाया गया था। इस पर मुस्लिम समाज के लोगों ने कहा कि अब दोनों तरफ के जख्म काफी भर गए हैं। अब ऐसी कोई बात नहीं है। हिंदू-मुस्लिम दोनों एक-दूसरे की दुकान से सामान लेते हैं। देश-प्रदेश के नेता मुखर, लेकिन लोकल लेवल पर नहीं मामले में कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह और जयराम रमेश ने सोशल मीडिया पर पोस्ट किया था। उन्होंने 11 आरोपियों के बरी होने को झूठे केस का मामला बताया था। भाजपा की ओर से किसी राष्ट्रीय या प्रदेश स्तर के नेता ने इस पर बयान नहीं दिया है। वहीं लोकल लेवल पर भाजपा के साथ कांग्रेस नेता भी इस मामले में बोलने से बच रहे हैं। कुछ ऐसा ही स्टैंड पुलिस-प्रशासन का भी नजर आया। पुलिस के एक अफसर ने ऑफ कैमरा ये कहा कि अगर किसी गवाह को धमकी मिल रही है तो हमें बताएं। अब तक हमारे पास ऐसी कोई सूचना नहीं है। हमें बताते हैं तो हम पूरी सुरक्षा मुहैया कराएंगे। साथ ही धमकी देने वाले पर कार्रवाई भी करेंगे।
