17 साल तक हत्या के आरोप और उम्रकैद की सजा का बोझ ढो रहे दमोह के तीन भाइयों को आखिरकार हाईकोर्ट से राहत मिल गई। मड़ियादो क्षेत्र में वर्ष 2009 में हुई प्यारेलाल की हत्या के मामले में तुलसीराम, मोहनलाल और हरप्रसाद को 2012 में दमोह की अदालत ने उम्रकैद की सजा सुनाई थी। हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान पुलिस जांच और अभियोजन के साक्ष्यों में गंभीर खामियां सामने आईं। कोर्ट ने सजा रद्द करते हुए आरोपियों को बरी कर दिया। हालांकि, इस 17 साल लंबी कानूनी लड़ाई की कीमत परिवार को अपनी करीब 6 एकड़ जमीन और मकान बेचकर चुकानी पड़ी। परिवार का कहना है कि बच्चों की पढ़ाई तक छूट गई और अब उन्हें खेती के साथ मजदूरी के लिए दिल्ली जाना पड़ता है। बेटे से विवाद के बाद हुई थी प्यारेलाल की मौत तुलसीराम राजपाल के मुताबिक, 25 अगस्त 2009 की रात उनके पड़ोस में रहने वाले प्यारेलाल का अपने बेटे घनश्याम से विवाद हुआ था। बहस के दौरान घनश्याम ने अपने पिता पर चाकू से हमला कर दिया। इलाज के दौरान प्यारेलाल की मौत हो गई। तुलसीराम का आरोप है कि इसके बाद मृतक के परिजनों ने उन पर और उनके दोनों भाइयों पर हत्या का आरोप लगा दिया। परिवार ने पुलिस को बताया था कि घटना के समय तीनों अपने घर पर थे, लेकिन पुलिस ने उन्हें आरोपी बनाकर गिरफ्तार कर लिया। मारपीट कर कबूल करवाने का लगाया आरोप तुलसीराम ने बताया कि घटना के समय उनकी उम्र 16 साल थी। उनके मुताबिक, पुलिस ने उन्हें बालिग बताकर गिरफ्तार किया और रातभर मारपीट की। उन्होंने आरोप लगाया कि पुलिस की पिटाई के डर से उनसे और उनके भाइयों से हत्या कबूल करवाई गई। परिवार के अनुसार, तीनों को करीब आठ दिन तक थाने में रखा गया। इसके बाद कोर्ट में पेश किया गया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया। 29 जून 2012 को दमोह कोर्ट ने तीनों को हत्या का दोषी मानते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई। भाइयों ने हाईकोर्ट में दायर की अपील मामले की जानकारी मिलने के बाद तुलसीराम के भाई बाबूलाल, हरिचरण और नंदलाल, जो घटना के समय दिल्ली में काम कर रहे थे, दमोह पहुंचे। उन्होंने भाइयों को जेल से बाहर निकालने के लिए कानूनी लड़ाई शुरू की। 2012 में निचली अदालत के फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई। आरोपियों की ओर से अधिवक्ता अजय कुमार जैन ने केस लड़ा। इस दौरान हरप्रसाद को 2014 में हाईकोर्ट से जमानत मिल गई थी। जमानत के बाद हरप्रसाद की बिजली गिरने से मौत 2014 में जमानत मिलने के बाद हरप्रसाद खेत में काम कर रहे थे। इसी दौरान बिजली गिरने से उनकी मौत हो गई। इसके बावजूद केस की सुनवाई जारी रही। बाद में तुलसीराम को भी जमानत मिल गई। परिवार का कहना है कि लंबे समय तक चली कानूनी लड़ाई के खर्च के लिए उन्हें जमीन बेचनी पड़ी और गांव का मकान भी बिक गया। सबूत पर्याप्त नहीं माने, उम्रकैद की सजा रद्द हाईकोर्ट ने माना कि अभियोजन पक्ष आरोपों को साबित नहीं कर सका। पुलिस जांच में गंभीर खामियां और साक्ष्यों में विरोधाभास पाए गए। इन परिस्थितियों में निचली अदालत की ओर से दी गई उम्रकैद की सजा को बरकरार रखना उचित नहीं माना गया। कोर्ट ने सजा रद्द करते हुए आरोपियों को बरी कर दिया। परिवार ने अब मामले की जांच करने वाले पुलिसकर्मियों के खिलाफ कार्रवाई की मांग की है। केस लड़ते-लड़ते जमीन और मकान बिक गए तुलसीराम का कहना है कि 17 साल चली कानूनी लड़ाई के दौरान परिवार की करीब 6 एकड़ जमीन का बड़ा हिस्सा बिक गया। गांव का मकान भी बेचना पड़ा। आर्थिक स्थिति खराब होने के कारण बच्चों की पढ़ाई तक छूट गई। उनका कहना है कि पहले परिवार अपनी जमीन पर खेती करके गुजर-बसर करता था, लेकिन अब खेती के साथ मजदूरी के लिए दिल्ली जाना पड़ता है। बचे हुए खेत में खेती कर परिवार किसी तरह जीवन चला रहा है। मां बोली- कानून और भगवान पर भरोसा था तुलसीराम की मां लक्ष्मीबाई ने बताया कि हत्या के समय तुलसीराम और मोहन घर में थे, जबकि हरप्रसाद आंगन में बैठे थे। उनके मुताबिक, शोर सुनकर परिवार के लोग बाहर आए थे। इसके बाद मृतक के परिवार ने उनके तीनों बेटों पर हत्या का आरोप लगा दिया। लक्ष्मीबाई ने कहा कि 17 साल तक केस चला, लेकिन परिवार को कानून और भगवान पर भरोसा था। आखिरकार कोर्ट से राहत मिली। पत्नी बोली- केस के कारण बच्चों की पढ़ाई छूट गई मोहन की पत्नी चित्राबाई ने कहा कि उनके पति, जेठ और देवर को झूठे केस में फंसाया गया। लंबे समय तक केस लड़ने के कारण परिवार की आर्थिक स्थिति खराब हो गई और बच्चों की पढ़ाई भी छूट गई। उन्होंने कहा कि परिवार को सिर्फ कानून और भगवान पर भरोसा था और आखिरकार न्याय मिला। वकील बोले- पुलिस जांच में लापरवाही हुई अधिवक्ता अजय कुमार जैन ने बताया कि तीनों भाइयों पर गांव के ही प्यारेलाल की हत्या का आरोप था। उनके मुताबिक, विवाद की वजह प्यारेलाल के बेटे पर हरप्रसाद के घर चोरी का आरोप लगना था। इसी के बाद विवाद हुआ और प्यारेलाल की मौत हो गई। उन्होंने बताया कि 2012 में निचली अदालत से उम्रकैद की सजा मिलने के बाद आरोपियों ने हाईकोर्ट में अपील की थी। सुनवाई के दौरान पुलिस जांच में सामने आई खामियों और साक्ष्यों में विरोधाभास के आधार पर हाईकोर्ट ने उम्रकैद की सजा रद्द कर आरोपियों को बरी कर दिया।
