वर्ष 2013 की व्यापमं (मप्र कर्मचारी चयन मंडल) की पुलिस सब इंस्पेक्टर भर्ती परीक्षा में फर्जी परीक्षार्थी (सॉल्वर) बैठाने के मामले में ग्वालियर स्थित सीजीएम की विशेष अदालत ने बुधवार को बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने आरोपी अमितेश और असली अभ्यर्थी विपिन कुमार को आपराधिक षड्यंत्र (120-बी), धोखाधड़ी (420), प्रतिरुपण (419), दस्तावेज कूटरचना (465) और मप्र मान्यता प्राप्त परीक्षा अधिनियम के तहत दोषी करार दिया है। अदालत ने दोनों को धारा 467, 468 और 471 के गंभीर आरोपों से मुक्त करते हुए धारा 465 व अन्य संबंधित धाराओं में दोषी माना है। सजा के प्रश्न पर फैसला सुरक्षित रखा गया है। हाईकोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा ऐसे अपराधों से संपूर्ण चयन प्रक्रिया, युवा वर्ग और समाज गंभीर रूप से प्रभावित होता है। अनुचित साधनों के प्रयोग से पूरी व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न लगता है, जिससे योग्य छात्रों का मनोबल टूटता है। न्याय व्यवस्था का दायित्व है कि ऐसे मामलों में सख्त और न्यायोचित संदेश दिया जाए। परीक्षा केंद्र के मुख्य द्वार पर ही पकड़ाया था सॉल्वर मामले की विवेचना सीजीएम के डीएसपी मुकुल रावत द्वारा की गई। 9 मार्च 2014 को शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, गुना में परीक्षा केंद्र बनाया गया था। परीक्षा शुरू होने से पहले जांच के दौरान वीक्षकों और केंद्राध्यक्ष डॉ. सुमन श्रीवास्तव को परीक्षार्थी पर संदेह हुआ। अभ्यर्थी विपिन कुमार के स्थान पर अमितेश परीक्षा देने पहुंचा था। एडमिट कार्ड की फोटो का मिलान चेहरे और वोटर आईडी से करने पर अंतर पाया गया, जिसके बाद सॉल्वर अमितेश को गेट पर ही दबोच लिया गया। जांच में ऐसे बेनकाब हुई पूरी साजिश षड्यंत्र साबित करने के लिए सहमति ही काफी: कोर्ट बचाव पक्ष ने तर्क दिया था कि दोनों के बीच कोई सीधा संपर्क साबित नहीं हुआ है और सॉल्वर परीक्षा हॉल में प्रवेश नहीं कर पाया था। हालांकि, अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न दृष्टांतों का हवाला देते हुए बचाव पक्ष की दलीलों को खारिज कर दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि आपराधिक षड्यंत्र का अपराध आपसी सहमति बनते ही पूरा हो जाता है। जाली एडमिट कार्ड तैयार कर परीक्षा देने का प्रयास करना ही षड्यंत्र को पूरी तरह प्रमाणित करता है।
