शनिवार को दिल्ली में सोनम वांगचुक और रविवार सुबह मध्य प्रदेश के छतरपुर में अमित भटनागर… 24 घंटे के भीतर लगभग एक जैसे तरीके से दोनों को उनके धरना स्थल से उठाया गया। कुपी गांव में केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट के खिलाफ 17 दिन से चल रहे चिता-आंदोलन को प्रशासन ने खत्म करवा दिया। क्या मेडिकल इमरजेंसी एक बहाना है या फिर आंदोलन खत्म करने का एक नया रास्ता; केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट की पूरी कहानी, एमपी एक्सप्लेनर में… सवाल 1: रविवार तड़के क्या हुआ…गिरफ्तारी हुई या मेडिकल इमरजेंसी? जवाब: रविवार सुबह करीब 5 बजे भारी पुलिस बल कुपी गांव में बराना नदी किनारे आंदोलन स्थल पर पहुंचा। यह चिता-आंदोलन का 17वां और जय किसान संगठन के नेता अमित भटनागर के आमरण अनशन का 14वां दिन था। इस पुलिस एक्शन पर दोनों पक्षों के दावे बिल्कुल अलग हैं… प्रशासन का दावा- मेडिकल इमरजेंसी: छतरपुर कलेक्टर पार्थ जायसवाल के मुताबिक, किसी की गिरफ्तारी नहीं हुई। लगातार बारिश से नदी का जलस्तर बढ़ रहा था और लंबे अनशन के कारण भटनागर की तबीयत बिगड़ रही थी। सुरक्षा के लिहाज से उन्हें बिजावर स्वास्थ्य केंद्र में भर्ती कराया गया और बाकी लोगों को बसों से सुरक्षित घर भेजा गया। प्रदर्शनकारियों ने लाठीचार्ज का आरोप लगाया: आंदोलन से जुड़ीं पार्षद दिव्या अहिरवार का दावा है कि करीब 250 से 300 लोगों को हिरासत में लिया गया। पुलिस ने महिलाओं और बच्चों पर लाठियां चलाईं, उन्हें घसीटकर वाहनों में बैठाया और धरना स्थल तहस-नहस कर दिया। ₹400 करोड़ का भ्रष्टाचार, दस्तावेज सार्वजनिक होने थे: दिव्या का आरोप है कि अमित भटनागर रविवार को ही केन-बेतवा प्रोजेक्ट से जुड़े 400 करोड़ रुपए के कथित भ्रष्टाचार के दस्तावेज सार्वजनिक करने वाले थे। इसी बड़े खुलासे को रोकने के लिए सुबह 5 बजे कार्रवाई की गई। सवाल 2: केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट है क्या, आंदोलन क्यों शुरू हुआ? जवाब: यह करीब 44 हजार करोड़ की लागत से बन रहा देश का पहला नदी जोड़ो प्रोजेक्ट है। मकसद है मध्य प्रदेश की केन नदी का अतिरिक्त पानी 221 किलोमीटर लंबी नहर से बेतवा नदी में पहुंचाना, ताकि बुंदेलखंड के सूखाग्रस्त इलाकों को सिंचाई का पानी मिले। सवाल 3: वांगचुक-भटनागर पर एक्शन क्या सिर्फ इत्तेफाक है? जवाब: दोनों मामलों में कुछ समानताएं जरूर दिखती हैं। सोनम वांगचुक और अमित भटनागर दोनों लंबे समय से आमरण अनशन पर थे। दोनों ही मामलों में प्रशासन ने बिगड़ती तबीयत का हवाला देते हुए उन्हें अस्पताल पहुंचाया और गिरफ्तारी से साफ इनकार किया। मध्यप्रदेश कांग्रेस कमेटी के प्रदेश सचिव अनीश कहते हैं कि यह सिर्फ इत्तेफाक नहीं, बल्कि जन-आंदोलनों को खत्म करने का एक सधा हुआ क्राइसिस मैनेजमेंट प्रोटोकॉल है। गिरफ्तारी से बचना ताकि भीड़ न भड़के: अगर पुलिस भटनागर को सीधे गिरफ्तार करके जेल भेजती, तो वे जनता की नजर में हीरो बन जाते। इससे भीड़ भड़कने का खतरा रहता है। इसलिए पुलिस गिरफ्तारी से बचती है और मानवीय आधार यानी जान बचाने का तर्क देती है। अस्पताल यानी सॉफ्ट कस्टडी: तबीयत बिगड़ने का हवाला देकर नेता को अस्पताल ले जाना सबसे सुरक्षित तरीका है। अस्पताल एक ऐसा ग्रे-जोन है, जहां नेता गिरफ्तार भी नहीं होता और आजाद भी नहीं होता। वहां मरीजों की परेशानी का हवाला देकर मीडिया और समर्थकों की भीड़ को आसानी से बाहर किया जा सकता है। धरना स्थल खाली कराना: जैसे ही मुख्य नेता को मेडिकल चेकअप के लिए हटाया जाता है, पीछे बची भीड़ नेतृत्वविहीन यानी बिना लीडर के हो जाती है। इसके बाद धरना स्थल को खाली कराना और टेंट उखाड़ना प्रशासन के लिए बहुत आसान हो जाता है, ठीक वैसा ही जैसा कुपी गांव में हुआ। सवाल 4: 400 करोड़ के कथित घोटाले का आरोप क्या है? जवाब: पार्षद दिव्या अहिरवार का कहना है कि इसी कथित घोटाले से जुड़े दस्तावेज अमित भटनागर रविवार को सार्वजनिक करने वाले थे। सवाल 5: सरकार ने पैकेज दिया, फिर भी आंदोलनकारी क्यों नहीं माने? जवाब: पूर्व कैबिनेट मंत्री और पन्ना विधायक बृजेन्द्र प्रताप सिंह ने भास्कर को बताया कि, आंदोलनकारियों की नाराजगी दूर करने के लिए राज्य सरकार ने 10 जुलाई 2026 को नए आदेश जारी कर दिए हैं। दरअसल, यह पूरा विवाद दो अलग-अलग मांगों का था… 1. रूंझ और मझगवां परियोजना- समान मुआवजे की मांग: ये दोनों राज्य सरकार की अलग परियोजनाएं हैं। पहले यहां विस्थापितों को सिर्फ 5 लाख रुपए का पैकेज दिया गया था। इनकी मांग थी कि केंद्र की केन-बेतवा परियोजना की तर्ज पर उन्हें भी 12.50 लाख रुपए दिए जाएं। सरकार ने इसे मान लिया है और अब इन्हें 5 लाख काटकर शेष राशि कुल 12.50 लाख दी जाएगी। इसका फायदा मझगवां के 1450 और रूंझ के 730 परिवारों को मिलेगा। 2. केन-बेतवा के 8 गांव- 2024 से सर्वे की मांग: पन्ना जिले के 8 गांवों के लोगों की व्यावहारिक मांग थी। उनका कहना था कि सरकार ने मुआवजे के लिए उनका सर्वे 2022 में किया था, जिसे बढ़ाकर 2024 किया जाए जैसा छतरपुर में किया गया है। वे ऐसा इसलिए चाहते थे ताकि 2022 से 2024 के बीच जो लोग 18 साल के यानी बालिग हो गए हैं, उन्हें भी अपना अलग घर बसाने के लिए मुआवजे का पूरा पैकेज मिल सके। सरकार ने उनकी यह मांग मान ली हैं। नए आदेशों के मुताबिक पात्र परिवार यदि प्लॉट नहीं लेना चाहता, तो उसे 12.50 लाख रुपए नकद एकमुश्त मिलेंगे। प्लॉट लेने पर शहरी क्षेत्र में 6.50 लाख और ग्रामीण क्षेत्र में 7 लाख रुपए का अनुदान मिलेगा। रजिस्ट्री का खर्च भी जल संसाधन विभाग उठाएगा। हालांकि आंदोलनकारियों का कहना है कि सिर्फ पैकेज की घोषणा से समस्या हल नहीं होगी। सवाल 6: क्या आंदोलन खत्म हो गया…आगे क्या? जवाब: नहीं, सिर्फ धरना स्थल खाली हुआ है, अनशन नहीं रुका है। सवाल 7: क्या केन-बेतवा प्रोजेक्ट से पन्ना टाइगर रिजर्व और वहां के बाघों को भी खतरा है? जवाब: डीपीआर (डिटेल्ड प्रोजेक्ट रिपोर्ट) के मुताबिक, केन-बेतवा परियोजना के तहत बनने वाले दौधन बांध से पन्ना टाइगर रिजर्व का करीब 6017 हेक्टेयर वन क्षेत्र हमेशा के लिए पानी में डूब जाएगा।
