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एथेनॉल के नाम पर 1160 करोड़ का चावल घोटाला:2320 में खरीदकर 2800 में बेच रहे, मुनाफे में सब हिस्सेदार…‘खुलासे’ से डर रही पुलिस

देश में एथेनॉल मिक्स पेट्रोल को पर्यावरण-अनुकूल नीति के रूप में बढ़ावा दिया जा रहा है। वहीं, मध्य प्रदेश में एथेनॉल प्रोडक्शन के नाम पर सरकारी चावल के घोटाले का मामला सामने आया है। दैनिक भास्कर की पड़ताल में खुलासा हुआ है कि 5 लाख मीट्रिक टन (50 लाख क्विंटल) सरकारी चावल में से ज्यादातर चावल का इस्तेमाल एथेनॉल बनाने में हुआ ही नहीं। यह चावल दोबारा सरकारी गोदाम पहुंच गया। इसकी कीमत करीब 1160 करोड़ रुपए है। पड़ताल में यह भी सामने आया कि यह सामान्य नहीं, बल्कि फोर्टिफाइड चावल था। इसे कुपोषित बच्चों, गर्भवती महिलाओं और किशोरियों को एनीमिया व कुपोषण से बचाने के लिए विटामिन और मिनरल्स मिलाकर तैयार किया जाता है। इस घोटाले में एथेनॉल प्लांट संचालक, राइस मिलर्स और सरकारी तंत्र की मिलीभगत की आशंका है। जानिए, ग्रीन एनर्जी के नाम पर कैसे हो रहा है यह घोटाला.. सरकार प्लांट्स को 4 हजार रुपए का चावल 2320 रुपए में दे रही इस घोटाले को समझने के लिए पहले सरकारी चावल की खरीद और उसकी लागत का गणित समझना जरूरी है। सरकार का तर्क है कि गोदामों में अतिरिक्त अनाज लंबे समय तक रखने से उसके खराब होने का जोखिम रहता है। नई फसल के भंडारण के लिए जगह भी चाहिए। सरकार का यह भी कहना है कि एथेनॉल उत्पादन से ऊर्जा जरूरतें पूरी होती हैं और विदेशी मुद्रा की बचत होती है। इसी नीति के तहत, जिस चावल की खरीद, भंडारण और प्रोसेसिंग पर सरकार का खर्च लगभग ₹3,900 से ₹4,000 प्रति क्विंटल आता है, उसे एथेनॉल प्लांट्स को ₹2,320 प्रति क्विंटल की रियायती दर पर उपलब्ध कराया जाता है। कैसे लगी घोटाले की भनक? एथेनॉल प्लांट के बजाय राइस मिल पहुंचे चावल के ट्रक
मामले का खुलासा 2 जून को नवेगांव वेयरहाउस (बालाघाट) से एवीजे एथेनॉल प्लांट (छिंदवाड़ा के बोरगांव) भेजे गए तीन ट्रक चावल की जांच के दौरान हुआ। सरकारी रिकॉर्ड के अनुसार इनका उपयोग एथेनॉल उत्पादन के लिए होना था। हालांकि, 3 जून को इनमें से एक ट्रक बालाघाट की संचेती राइस मिल में मिला, जबकि बाकी दो ट्रक भी छिंदवाड़ा के एथेनॉल प्लांट तक नहीं पहुंचे। घटना सामने आने के बाद पुलिस की स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (SIT) ने जांच शुरू की। अब तक की जांच में ये तथ्य सामने आए हैं सिलसिलेवार जानिए किसकी क्या भूमिका FCI का पक्ष: गोदाम से निकलने के बाद चावल की जिम्मेदारी हमारी नहीं
भारतीय खाद्य निगम (FCI) के अधिकारियों के अनुसार, मध्य प्रदेश के एथेनॉल प्लांट्स को एक साल में 50 लाख क्विंटल चावल आवंटित किया गया। यदि यह पूरा चावल खुले बाजार में बेचा गया हो, तो अनुमानित हेराफेरी करीब ₹250 करोड़ की हो सकती है। FCI के एक अधिकारी ने नाम पब्लिश न करने की शर्त पर कहा कि गोदाम से चावल जारी होने के बाद उसकी जिम्मेदारी FCI की नहीं रहती। एसोसिएशन का तर्क- सभी को दोषी ठहराना ठीक नहीं
एथेनॉल प्लांट एसोसिएशन के एक पदाधिकारी ने भी नाम न बताने की शर्त पर स्वीकार किया कि सरकारी चावल कुछ मामलों में प्लांट्स के बजाय राइस मिलर्स तक पहुंच रहा है। उनका कहना है कि यदि ऐसा हुआ है तो संबंधित प्लांट संचालकों के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए। सभी प्लांट्स को एक साथ दोषी नहीं ठहराया जाना चाहिए। एक महीने की जांच के बाद भी पुलिस खामोश एक महीने की पुलिस जांच में कई प्रभावशाली लोगों के नाम सामने आए हैं। यही वजह है कि पुलिस इस मामले में बयान देने से बच रही है। दूसरी ओर, एक्सपर्ट का दावा है कि सभी की मिलीभगत के कारण कार्रवाई प्रभावित हो रही है। उनका यह भी दावा है कि बीजेपी-कांग्रेस के नेताओं की भी मिलीभगत है। यही वजह है कि राजनीतिक स्तर पर भी इस मुद्दे पर पर्याप्त प्रतिक्रिया नहीं दिखी।

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