खून से तैयार होने वाले एक मेडिकल प्लाजा उत्पाद में HIV रिएक्टिव पाए जाने के आरोपों को लेकर दायर जनहित याचिका पर मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की जबलपुर खंडपीठ में गुरुवार को सुनवाई हुई। याचिकाकर्ता बाकी बचे सैंपल की जांच के लिए कोर्ट में केस लड़ रहा है। मामले की गंभीरता को देखते हुए न्यायालय ने पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है। रिलायंस लाइफ साइंसेज का प्रोडक्ट यह याचिका नरसिंहपुर के सामाजिक कार्यकर्ता शुभम कौरव द्वारा दायर की गई है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि वर्ष 2024 में नरसिंहपुर जिले के निवासी महेश कुमार वर्मा के उपचार के दौरान उपयोग के लिए खरीदे गए रिलायंस लाइफ साइंसेज के उत्पाद ह्यूमन एल्बुमिन 20 प्रतिशत (AlbuRel-OS) के एक नमूने की जांच में एचआईवी रिएक्टिव परिणाम प्राप्त हुआ था। याचिकाकर्ता का कहना है कि यह उत्पाद मानव प्लाज्मा से तैयार किया जाता है, जबकि उसके पैकेज पर एंटी-एचआईवी के लिए नॉन-रिएक्टिव होने का दावा अंकित है। जांच में HIV रिएक्टिव रिजल्ट आया याचिका के अनुसार, मरीज का उपचार जबलपुर के गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट डॉ. पंकज असाटी की देखरेख में चल रहा था। चिकित्सकीय परामर्श के बाद उत्पाद की तीन बोतलें जबलपुर स्थित एक मेडिकल स्टोर से खरीदी गई थीं। आरोप है कि उनमें से एक बोतल के नमूने की प्रारंभिक जांच में एचआईवी रिएक्टिव परिणाम सामने आया। बाद में पुनः कराई गई जांच में भी समान परिणाम प्राप्त होने का दावा किया गया। जानकारी देने के बाद भी कार्रवाई नहीं याचिकाकर्ता ने न्यायालय को बताया कि मामले की जानकारी संबंधित कंपनी, औषधि सुरक्षा विभाग, ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया (डीसीजीआई), मध्यप्रदेश खाद्य एवं औषधि प्रशासन तथा औषधि निरीक्षक कार्यालय को दी गई थी। इसके बावजूद अब तक उत्पाद के शेष सीलबंद नमूनों की अधिकृत जांच या कथित दोषियों के विरुद्ध कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई है। हाईकोर्ट में दायर जनहित याचिका में मांग की गई है कि संबंधित बैच की बची हुई दो सीलबंद बोतलों का नमूना लेकर राष्ट्रीय स्तर की मान्यता प्राप्त एवं अधिकृत प्रयोगशालाओं में वैज्ञानिक और पुष्टिकरण (कन्फर्मेटरी) जांच कराई जाए। साथ ही उत्पाद के निर्माण, आयात, वितरण और विक्रय से जुड़े सभी पक्षों की भूमिका की जांच कर आवश्यक कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित की जाए। जनस्वास्थ्य से जुड़ा मुद्दा सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता पक्ष ने तर्क दिया कि मामला सीधे जनस्वास्थ्य और मरीजों की सुरक्षा से जुड़ा हुआ है। यदि आरोप सही पाए जाते हैं तो इसके दूरगामी प्रभाव हो सकते हैं। इसलिए स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच आवश्यक है। मामले की सुनवाई पूरी होने के बाद हाईकोर्ट ने अपना आदेश सुरक्षित रख लिया है। अब सभी की निगाहें न्यायालय के निर्णय पर टिकी हैं, जिससे यह स्पष्ट होगा कि कथित रूप से सुरक्षित रखे गए नमूनों की जांच और मामले की आगे की प्रक्रिया किस दिशा में आगे बढ़ेगी। केन्द्र सरकार की ओर से एडिशनल सॉलिसिटर जैन ने की पैरवी प्रारंभिक सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता कृष्ण शरण कौरव ने पक्ष रखा, वहीं केन्द्र सरकार की ओर से एडिशनल सॉलिसिटर जनरल सुनील कुमार जैन ने दलीलें रखीं। फिलहाल न्यायालय के अंतिम आदेश का इंतजार किया जा रहा है, जबकि यह मामला स्वास्थ्य सुरक्षा और औषधीय उत्पादों की गुणवत्ता नियंत्रण व्यवस्था को लेकर महत्वपूर्ण प्रश्न खड़े कर रहा है।
