दूसरों की जान बचाने की जिम्मेदारी निभाने व विकट परिस्थिति में भी लोगों को मोटिवेट करने वाले डॉक्टर खुद तनाव से जूझ रहे हैं। ये निष्कर्ष एमजीएम मेडिकल कॉलेज के मनोरोग विभागाध्यक्ष डॉ. वीएस पाल के नेतृत्व में 199 पोस्ट ग्रेजुएट (पीजी) डॉक्टरों पर किए गए अध्ययन में सामने आया। इसमें 98.5% डॉक्टर उच्च व्यावसायिक तनाव (काम के दबाव) में मिले, जबकि 72% में गंभीर मनोवैज्ञानिक लक्षण पाए गए। वहीं 5-7 प्रतिशत के मन में पेशा छोड़ने व आत्महत्या जैसे ख्याल आ रहे हैं। किसी को 24-30 घंटे लगातार ड्यूटी का टेंशन है तो कोई नाइट शिफ्ट, इमरजेंसी ड्यूटी व अन्य कारणों से तनाव में है। क्लिनिकल (मरीजों के सीधे उपचार वाले) विभाग के डॉक्टर ज्यादा प्रभावित हैं। इनमें तनाव, चिंता, सिरदर्द और पेट दर्द जैसे शारीरिक लक्षण अधिक पाए गए। स्टडी के अनुसार कई डॉक्टरों को इलाज के साथ सैंपल लेने, मरीजों को शिफ्ट कराने और अन्य गैर-चिकित्सकीय कार्य भी करने पड़ते हैं। इससे कार्यभार, मानसिक दबाव दोनों बढ़ते हैं। ऐसे सुधरेंगे हालात पुरुष ज्यादा तनाव ले रहे निजी जीवन प्रभावित : लगातार ड्यूटी के कारण परिवार और दोस्तों के लिए समय कम बच रहा है। मदद लेने में झिझक : कई डॉक्टर मानसिक परेशानी होने पर भी मनोरोग विशेषज्ञ या परामर्शदाता से सलाह लेने में हिचकते हैं। उन्हें छवि प्रभावित होने का डर रहता है। महिला-पुरुष और उम्र: पुरुषों की अपेक्षा महिलाएं कम तनाव लेती हैं। मनोवैज्ञानिक लक्षण दोनों में समान रहे। 25 से 40 वर्ष के सभी डॉक्टर समान रूप से प्रभावित। पिछले कुछ वर्षों में मेडिकल छात्रों और जूनियर डॉक्टरों में बढ़ते तनाव, कार्यक्षमता में कमी और आत्महत्या की घटनाओं ने हमें यह अध्ययन करने के लिए प्रेरित किया। हमारा उद्देश्य मानसिक दबाव बढ़ने का कारण जानना है। – डॉ. वीएस पाल, विभागाध्यक्ष, मनोरोग विभाग, एमजीएम मेडिकल कॉलेज
