खेती में खाद और सिंचाई जितनी जरूरी है, उतना ही बड़ा खेल सही बीज के चुनाव का भी है। खेत में बोया गया उन्नत और शुद्ध बीज अकेले ही उत्पादन को 20 से 30 प्रतिशत तक बढ़ाने की ताकत रखता है। इसके उलट, खराब या अनुपयुक्त बीज किसानों को कम उत्पादन, रोग और कीट प्रकोप के साथ भारी आर्थिक नुकसान की तरफ धकेल देता है। ऐसे में बड़ा सवाल यही है कि किसान कौन-सी किस्म चुनें। सोयाबीन में जेएस-2309 किस्म केवल 93 दिनों में पककर 24 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उपज देती है और रोग सहनशील मानी जाती है, जबकि 91 दिन में तैयार होने वाली एनआरसी-150 जीवाणु और पत्ती दाग रोग प्रतिरोधी होने के कारण देरी से बुवाई के लिए सबसे भरोसेमंद विकल्प है। किसान एनआरसी-157 भी चुन सकते हैं, जो 92 दिन में पकती है और पत्ती दाग व जीवाणु रोगों के खिलाफ मजबूत सुरक्षा देती है। दूसरी तरफ धान किसानों के लिए कम पानी और सूखे वाले क्षेत्रों में पूसा-1882 बासमती किस्म बेहतर विकल्प मानी जा रही है, जो 134 दिनों में पककर स्थिर पैदावार देती है। अधिक उत्पादन चाहने वाले किसान पूसा-1824 लगा सकते हैं, जो 127 दिन की मध्यम अवधि में 88 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक रिकॉर्ड बासमती उत्पादन देने की क्षमता रखती है। जल्दी बुवाई के लिए पूसा-1509 सबसे उपयुक्त है, जो केवल 118 दिनों में पकने वाली स्वादिष्ट बासमती किस्म है। वहीं झुलसा और ब्लास्ट रोग प्रभावित इलाकों में पूसा बासमती-1847 किसानों के लिए राहत बन सकती है, जो 125 से 128 दिनों में तैयार होकर बेहतर रोग प्रतिरोधकता के साथ 57 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक पैदावार देती है। मक्का की उन्नत किस्में, जो देंगी बंपर पैदावार खरीफ सीजन में मक्का की खेती से अधिक मुनाफा कमाने के लिए हाइब्रिड किस्मों का चयन करना सबसे बेहतर विकल्प है। पूसा बायोफोर्टिफाइड हाइब्रिड-2 खरीफ की अगेती मक्का किस्म है, जो 89 से 91 दिनों में पकती है और पत्ती झुलसा रोग प्रतिरोधी होने के साथ प्रो-विटामिन A व लाइसिन से भरपूर मानी जाती है। पूसा जवाहर हाइब्रिड मक्का-3 मध्यम-देर से पकने वाली किस्म है, जो 115 से 125 दिनों में तैयार होकर 75 से 82 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उत्पादन देने की क्षमता रखती है। कम पानी वाले इलाकों के लिए प्रकाश (हाइब्रिड) उपयुक्त मानी जाती है, जो 80 से 82 दिनों में पककर विपरीत मौसम में भी 40 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक स्थिर उत्पादन देती है। वहीं जवाहर मक्का (जे.एम.-216) सूखारोधी किस्म है, जो 95 से 100 दिनों में तैयार होती है और इसके नारंगी-पीले दानों को बाजार में अच्छे दाम मिलते हैं। उड़द और अरहर की उन्नत किस्में उड़द में टीजेयू-130 अगेती किस्म है, जो 62 दिनों में पककर पीला मोजेक वायरस प्रतिरोधी होने के साथ 11 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उत्पादन देती है। टीजेयू-339 65 दिनों में तैयार होती है और पीला मोजेक रोगरोधी गुणों के साथ 12 क्विंटल तक उपज देती है। वहीं आईपीयू-19-10 किस्म पाउडरी मिल्ड्यू प्रतिरोधी मानी जाती है, जो 74 दिनों में पककर औसतन 11 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उत्पादन देती है। अरहर में पूसा जवाहर अरहर 21-29 सूखारोधी किस्म है, जो 170 दिनों में तैयार होकर 20 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक पैदावार देती है। आईपीए 15-06 सूखा प्रभावित इलाकों के लिए उपयुक्त मानी जाती है और 177 दिनों में 16 क्विंटल तक स्थिर उत्पादन देती है। वहीं पूसा जवाहर अरहर 22-02 केवल 150 दिनों में तैयार होकर पीला मोजेक रोग से सुरक्षा के साथ 18 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उपज देती है। एक्सपर्ट: योगेश द्विवेदी, कृषि विशेषज्ञ एवं मुख्य कार्यकारी अधिकारी, मध्यभारत कंसोर्टियम ने बताया- खरीफ फसलों में बेहतर मुनाफे का आधार उन्नत किस्में और वैज्ञानिक तरीके से बुवाई है। देर से बुवाई कर रहे हैं तो सोयाबीन के लिए एनआरसी-150 चुनें, जबकि अधिक मुनाफे के लिए जेएस-2309 उपयुक्त है। कम पानी में भी पूसा-1882 धान की किस्म बंपर पैदावार दे सकती है।
