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नरोत्तम की मुश्किलें बरकरार, कांग्रेस में भी उलझन:दतिया में उपचुनाव की सुगबुगाहट, सियासी समीकरण साध रहे नेता; दोनों पार्टियों से जनता अभी तक खफा

सुबह के सात बजे हैं। दतिया के टाउन हॉल में 10-12 लोगों की एक टोली जमी है। इसमें रिटायर्ड शिक्षक, वकील, व्यापारी और नौकरीपेशा लोग शामिल हैं। किसी राजनीतिक दल से सीधा नाता नहीं होने के बावजूद इनके बीच हो रही चर्चा पूरी तरह सियासी है। रिटायर्ड शिक्षक परसराम श्रीवास्तव कहते हैं, “2023 के चुनाव में नरोत्तम मिश्रा ने बहुत गलतियां कीं। अब यदि उपचुनाव होता है, तो उन्हें ये गलतियां सुधारनी चाहिए।” वहीं, एडवोकेट इतरत अली जैदी मानते हैं कि हार की असली वजह जनता की नाराजगी थी। दतिया विधानसभा सीट रिक्त होने के बाद उपचुनाव की चर्चा तेज है। नरोत्तम मिश्रा सामाजिक सम्मेलनों के जरिए जमीन वापस पाने की कोशिश कर रहे हैं, जबकि राजेंद्र भारती अपने बेटे के साथ राहुल गांधी से मुलाकात कर चुके हैं। आजाद समाज पार्टी और निर्दलीय नेता भी सक्रिय हैं। चुनाव आयोग ने अभी चुनाव का ऐलान नहीं किया है और माना जा रहा है कि उसे 14 जुलाई को दिल्ली हाईकोर्ट में होने वाली सुनवाई का इंतजार है। भास्कर टीम ने दतिया पहुंचकर स्थानीय लोगों और विशेषज्ञों से बात कर मिश्रा की हार, भारती के कार्यकाल और उपचुनाव को लेकर उनकी राय जानी। पहले जानिए क्यों हारे नरोत्तम मिश्रा और ढाई साल में राजेंद्र भारती ने क्या किया… पिछला चुनाव: क्यों नहीं दोहराया गया ‘बसई चमत्कार’?
2023 में नरोत्तम मिश्रा की हार में बसई का शहरी क्षेत्र सबसे बड़ी वजह रहा। 13 राउंड में वे सिर्फ 3 राउंड में बढ़त बना पाए। 10वें राउंड तक राजेंद्र भारती 8 हजार वोटों से आगे थे। बीजेपी को 2018 जैसा ‘चमत्कार’ दोहरने की उम्मीद थी, जब बसई से मिले वोटों ने मिश्रा को जीत दिलाई थी। 2023 में 11वें और 12वें राउंड में वे क्रमशः 866 और 379 वोटों से पीछे रहे। आखिरी राउंड में 735 वोटों की बढ़त भी नाकाफी रही और वे 7,742 वोटों से चौथा चुनाव हार गए। जनता की राय: ओवर कॉन्फिडेंस और भीतरघात बना हार का कारण
एडवोकेट इतरत अली जैदी के अनुसार विकास कार्य हुए, लेकिन मिश्रा के करीबी लोगों की कार्यशैली से जनता नाराज थी। वे 2022 के नगर पालिका चुनाव में कथित धांधली और स्थानीय समस्याओं के समाधान में देरी को हार की प्रमुख वजह मानते हैं। उदाहरण के तौर पर ‘लाला का तालाब’ की टूटी दीवार का मुद्दा आज भी लोगों में नाराजगी पैदा करता है। स्थानीय लोगों का मानना है कि मिश्रा को संगठन के भीतर ही नुकसान पहुंचा। परसराम श्रीवास्तव और राजू त्यागी के अनुसार कार्यकर्ता जरूरत के मुताबिक जमीन पर सक्रिय नहीं रहे और अति आत्मविश्वास में रहे। बीजेपी कार्यालय प्रभारी रोहित दुबे भी मानते हैं कि कार्यकर्ता जीत को लेकर जरूरत से ज्यादा आश्वस्त थे। राजेंद्र भारती का कार्यकाल: जनता की मिली-जुली राय
राजेंद्र भारती के ढाई साल के कार्यकाल पर स्थानीय लोगों की राय सख्त है। परसराम श्रीवास्तव के अनुसार वे जनता से दूर रहे। इतरत अली जैदी कहते हैं कि भारती प्रशासन और पुलिस पर नरोत्तम मिश्रा के प्रभाव का हवाला देते थे। राजू त्यागी और शलस त्रिपाठी आरोप लगाते हैं कि विधायक निधि का उपयोग क्षेत्र से बाहर हुआ और विधानसभा के सवाल अफसरों पर दबाव बनाने के लिए उठाए गए। वहीं, कांग्रेस जिलाध्यक्ष राजेंद्र दांगी इन आरोपों को खारिज करते हुए कहते हैं कि असहयोग के बावजूद भारती ने विधायक निधि से जितने संभव थे, उतने काम किए। चुनावी मैदान: प्रमुख दावेदार और रणनीति दतिया में उपचुनाव त्रिकोणीय होने के संकेत मिल रहे हैं। प्रमुख दावेदार राजनीतिक समीकरण जमाने में जुटे हैं.. 1. नरोत्तम मिश्रा (बीजेपी): डैमेज कंट्रोल मोड में राजेंद्र भारती की सदस्यता समाप्त होने के बाद मिश्रा लगातार सक्रिय हैं। वे सामाजिक सम्मेलनों के जरिए नाराज कार्यकर्ताओं और समुदायों को साधने की कोशिश कर रहे हैं। पिछले दो महीनों में एक दर्जन से ज्यादा कार्यक्रम कर चुके हैं। सूत्रों के अनुसार, वे दतिया के लिए बड़ी सरकारी घोषणा की तैयारी में हैं और 1 जून को मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव से मिल चुके हैं। बीजेपी का दावा है कि इस बार संगठन पिछली गलतियों से सबक लेकर मैदान में उतरेगा। 2. कांग्रेस: एक अनार, तीन बीमार टिकट को लेकर पार्टी में खींचतान दिखाई दे रही है। राजेंद्र भारती अपने बेटे अनुज भारती के लिए टिकट मांग रहे हैं। राहुल गांधी और अखिलेश यादव से मुलाकात के बाद टिकट न मिलने पर बागी होने की चर्चा है। पिछले चुनाव में टिकट का त्याग करने वाले अवधेश नायक खुद को स्वाभाविक दावेदार मान रहे हैं, जबकि पूर्व विधायक घनश्याम सिंह के समर्थक भी सक्रिय हैं। हालांकि कांग्रेस जिलाध्यक्ष अशोक दांगी ने गुटबाजी से इनकार करते हुए कहा कि टिकट सर्वे के आधार पर तय होगा। 3. दामोदर यादव (आजाद समाज पार्टी): बिगाड़ सकते हैं खेल दामोदर यादव किसान सम्मेलन और बैठकों के जरिए संगठन मजबूत करने में जुटे हैं। उनका दावा है कि बसपा और कांग्रेस के कार्यकर्ता उनके साथ आ रहे हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उनकी मजबूत मौजूदगी कांग्रेस के वोट बैंक को प्रभावित कर सकती है। एक्सपर्ट व्यू: मुद्दों पर भारी पड़ेंगे जातिगत समीकरण वरिष्ठ पत्रकार रवि ठाकुर के अनुसार उपचुनाव में जातिगत समीकरण निर्णायक रहेंगे।

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