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दस्तावेजों में जो मरे बताए, वो भास्कर को जिंदा मिले:संबल योजना का पैसा हड़पने सरपंच-सचिव का कारनामा; जांच के बाद भी एक्शन नहीं

मुझे राशन मिलना बंद हुआ और वृद्धावस्था पेंशन रुक गई। दफ्तरों के चक्कर काटे। पता चला सरकार की नजर में तो मैं मर चुका हूं। कागजों में मेरा अंतिम संस्कार हो चुका है। समग्र आईडी से नाम कट गया और अब जीवित होने के बावजूद राशन कार्ड नहीं बन पा रहा। यह कहना है सतना के गणपत कुशवाहा का। यह कहानी सिर्फ उनकी नहीं है। यह मध्य प्रदेश की ‘मुख्यमंत्री जन कल्याण (संबल) योजना’ में भ्रष्ट तंत्र की हकीकत है, जिसने जिंदा लोगों को कागजों पर मारकर उनके कफन के पैसे तक डकार लिए। दैनिक भास्कर की पड़ताल में सामने आया कि जिन लोगों को सरकारी रिकॉर्ड में ‘मृत’ बताकर लाखों रुपए निकाले गए, वो जिंदा हैं। जिनकी सच में मौत हुई, उनके परिवारों को पता नहीं चला कि उनके नाम पर पैसा कब आया और किसने लिया। सतना और मऊगंज दो जिलों में ही मिलीभगत से 45 लाख रुपए हड़पने के मामले का खुलासा हुआ है। गबन के तीन तरीके: भ्रष्टाचार की ‘क्रिएटिविटी’ भास्कर की जांच में सामने आया कि भ्रष्ट अधिकारियों ने गबन के लिए तीन तरीके अपनाए- 1. साधारण मौत को बनाया ‘एक्सीडेंटल’ मऊगंज के देवरा गांव के रमेश विश्वकर्मा की पत्नी की 2022 में बीमारी से मौत हुई। सचिव ने 2 लाख मिलने की बात कहकर रमेश से चेक और आधार लिए। तीन साल बाद पैसों की जरूरत पर पता चला कि मौत को ‘एक्सीडेंट’ दिखाकर 4 लाख रुपए निकाले गए थे, जिनमें से 2 लाख 10 हजार सचिव ने फर्जी तरीके से हड़प लिए। इसे करीब डेढ़ महीने बाद सस्पेंड किया गया है। 2. अपनों का हक, गैरों के खाते देवरा पंचायत के कामता प्रसाद और नागौद के रामचरण चौधरी के मामलों में परिजन को बिना बताए सहायता राशि दूसरे बैंक खातों में डाल दी गई। सचिवों ने इन खातों का इस्तेमाल कर लाखों रुपए का गबन किया और असली वारिस आज भी मदद के लिए भटक रहे हैं। 3. जिंदा को मुर्दा बनाना सतना की रहिकवारा पंचायत में गणपत कुशवाहा, सज्जन चौधरी और गोरेलाल कुशवाहा समेत 5 लोग जिंदा हैं, लेकिन कागजों में मृत घोषित कर 4-4 लाख रुपए की अनुग्रह राशि और 5-5 हजार अंत्येष्टि का पैसा निकाल लिया गया। सिस्टम में सेंध और जिम्मेदार कौन? इस पूरे खेल के मास्टरमाइंड पंचायत सचिव और सरपंच हैं। प्रक्रिया के अनुसार सचिव दस्तावेजों में हेरफेर कर नॉमिनी का नाम और खाता नंबर बदल देता है। इसके बाद जनपद पंचायत अधिकारी बिना भौतिक सत्यापन के इसे वेरिफाई कर देते हैं। नागौद और मऊगंज में सरपंच-सचिव की मिलीभगत से यह संभव हुआ। जांच हुई, दोष सिद्ध हुआ, पर कार्रवाई ढीली मऊगंज: जनपद सीईओ सुरभि श्रीवास्तव की जांच में 20 लाख का गबन मिला। सरपंच, सचिव, रोजगार सहायक और ऑपरेटर दोषी पाए गए। कलेक्टर संजय जैन ने सख्त निर्देश दिए, लेकिन एक महीने बाद भी सिर्फ सचिव पर कार्रवाई हुई है।
सतना: यहां 25 लाख से ज्यादा का गबन हुआ। जिला पंचायत सीईओ संजय सिंह ने कहा कि सचिव को नोटिस भेजा गया है। आरोपी सचिव पहले से पीएम आवास योजना में गबन के लिए निलंबित है, फिर भी प्रशासन ‘दंडात्मक कार्रवाई’ के नाम पर केवल नोटिस दे रहा है। आज स्थिति यह है कि असली हितग्राही दाने-दाने को मोहताज हैं और सरकारी खजाना लूटने वाले खुलेआम घूम रहे हैं। सरकार की ‘सिंगल क्लिक’ योजना का लाभ गरीबों तक पहुंचने से पहले ही भ्रष्टाचार के ‘डबल क्लिक’ से गायब हो रहा है।

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