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मात्र 30 रुपए में मिलती है ‘कंजर व्हिस्की’:भिंड के डेरे में चारपाई-झोले से चलता है पूरा खेल, 7 घरों में बंटा है अवैध शराब का नेटवर्क

भिंड से करीब 85 किमी दूर दबोह क्षेत्र में रेहकोला माता मंदिर से सटा कंजर डेरा। नाम लेते ही इलाके में सिर्फ एक बात सुनने को मिल जाएगी। यहां कंजर व्हिस्की मिल जाएगी। न कोई डर, न कोई रोक-टोक। कंजर व्हिस्की को पसंद करने वालों की कमी नहीं है। दैनिक भास्कर टीम यहां की हकीकत को परखने के लिए कंजर डेरे में घुसी, वह भी समाजसेवी बनकर। करीब चार घंटे तक टीम यहां रुकी। उस अवैध शराब नेटवर्क को नजदीक से देखा जो खुलेआम चल रहा है, लेकिन कानून की पकड़ से दूर है। भास्कर टीम ने पाया कि कंजर डेरा सिर्फ अवैध शराब का अड्डा नहीं है, बल्कि एक संगठित नेटवर्क है, जहां महिलाएं सामने हैं और पर्दे के पीछे कई चेहरे सुरक्षित बैठे हैं। सवाल यह नहीं है कि यहां शराब क्यों बिक रही है। सवाल यह है कि सब कुछ जानते हुए भी इसे रोकने वाला कोई क्यों नहीं है? कंजर डेरे के भीतर क्या और कैसे चलता है? पढ़िए, दैनिक भास्कर की रिपोर्ट… भिंड के दबोह क्षेत्र में रेहकोला माता मंदिर से सटे कंजर डेरे में खुलेआम शराब बिकती है। क्या सही में ऐसा होता है, इसकी पड़ताल के लिए भास्कर टीम ने डेरे के भीतर जाने की प्लानिंग की। करीब 10 दिन की मेहनत के बाद टीम को सफलता मिल गई। डेरे वालों के करीबियों के जरिए यह संभव हुआ। टीम के सदस्य समाजसेवी बनकर आखिरकार डेरे में दाखिल हुए। डेरे में कदम रखते ही एहसास हो गया कि यहां हर अजनबी पर नजर रखी जाती है। अंदर जाते ही दो महिलाएं नजर आईं। एक कुछ काम में लगी थी, जबकि दूसरी आंगन में चारपाई पर बैठकर आईना लिए शृंगार करती दिखी। दोनों एक-दूसरे से किसी बात को लेकर सवाल-जवाब भी कर रही थीं। टीम के भीतर दाखिल होते ही दोनों महिलाओं के हाव-भाव बदल गए। बातचीत रुक गई। आंखों में सवाल उतर आए। पहला सवाल आया- कौन हो? यहां क्यों आए हो? उनके इस सवाल ने हमें यह बता दिया कि इस इलाके में अजनबी की एंट्री आसान नहीं है। सवाल- काफी रूखे तरीके से पूछा गया था। रिपोर्टर ने खुद को सहज किया और बोला- भिंड शहर का रहने वाला हूं। समाजसेवी हूं। मैं उन बस्तियों में जाकर काम करता हूं, जहां गरीब और वंचित लोग रहते हैं। इनके बीच पहुंचकर यह जानता हूं कि सरकारी योजनाओं का लाभ उन्हें मिल रहा है या नहीं। गरीबों के लिए चल रही सरकारी योजनाओं की बात करने पर सवाल करने वाली महिला थोड़ी सहज हुई। हालांकि, उसके चेहरे से ऐसा नहीं लगा कि उसने पूरी तरह से भरोसा कर लिया, लेकिन बातचीत का रास्ता खुल गया। ऐसे होता है अवैध शराब की बिक्री का खेल करीब से देखने पर यह कंजर डेरा किसी सामान्य झुग्गी बस्ती जैसा नहीं लगा। यहां छह से सात मकान पक्के थे। सब कुछ व्यवस्थित, तयशुदा और नियंत्रित दिखा। न कोई अफरा-तफरी, न शोर-गुल। स्थायी रोजगार का कोई साधन नजर नहीं आया। पुरुष दिन में डेरा छोड़ देते हैं। महिलाएं व बच्चे ही यहां रहते हैं। दिनभर का पूरा सिस्टम इन्हीं के भरोसे चलता है। यहीं से शुरू होता है शराब का खेल। डेरा शराब बेचने के लिए किसी दुकान या ठेके जैसा नहीं दिखता, लेकिन तरीका इतना पुख्ता है कि ग्राहक को कहीं भटकना नहीं पड़ता। पूरा सिस्टम फिक्स होता है, यानी जिस घर से उस दिन शराब बिकनी होती है, उसके बाहर एक चारपाई रखी होती है। चारपाई पर एक थैला। इसी थैले में आठ से दस पॉलिथीन पाउच, जिनमें कच्ची शराब भरी होती है। यही ग्राहक के लिए क्लू होता है। झोला देखकर ग्राहक समझ जाता है कि आज शराब किस घर से मिलेगी। घर में मौजूद महिला या बच्चा पैसे लेता है और पाउच थमा देता है, अगर वे किसी काम में व्यस्त हों तो ग्राहक खुद थैले से पाउच निकालता है और पैसे डाल देता है। पूरी प्रक्रिया में न हिचक, न डर। हर पाउच की कीमत तय है… सिर्फ 30 रुपए। महिलाओं से बातचीत में उन्होंने बिना लाग-लपेट के स्वीकार किया कि शराब बेचना ही उनकी आमदनी का जरिया है। एक महिला ने कहा कि वे कोई बड़ा धंधा नहीं करतीं। बस दो-चार पाउच बिक जाते हैं, उसी से घर चल जाता है। आपसी सहमति से टकराव नहीं इस डेरे में अवैध शराब कारोबार को लेकर आपसी टकराव नहीं है। यहां सब कुछ नियम से चलता है। कुल सात मकान हैं। सभी के बीच सहमति बनी हुई है। सप्ताह के हर दिन के लिए एक मकान तय है। सोमवार को एक घर शराब बेचेगा, मंगलवार को दूसरा। इस तरह पूरा हफ्ता बंटा हुआ है, जिस दिन एक घर से शराब बिकती है, उस दिन बाकी घर पूरी तरह बंद रहते हैं। इस सिस्टम से न प्रतिस्पर्धा होती है और न झगड़ा। सवाल- शराब आती कहां से है? शराब कहां से आती है? इसे लेकर जब सवाल किया गया तो पहले टालने की कोशिश हुई, लेकिन थोड़ी देर बाद एक महिला ने साफ कहा- हम खुद भी शराब बनाती हैं। कुछ बाहर से भी आती है। शराब बनाने के तरीके को बेहद साधारण बताते हुए महिला ने कहा- जैसे दाल बनती है, वैसे ही गुड़ की शराब को भाप से उतार लिया जाता है और यह नुकसानदेह नहीं होती। स्थानीय लोगों से बातचीत में पता चला कि डेरा दिन में लगभग पुरुष विहीन रहता है। पुरुष बीहड़ों में चले जाते हैं, जहां शराब बनाई जाती है। रात में शराब लाकर आसपास के खेतों में गड्ढे खोदकर छिपा दी जाती है। जरूरत पड़ने पर वहीं से निकालकर बिक्री की जाती है। शराब का स्टॉक कहीं खुले में नजर नहीं आता, लेकिन पूरा इलाका उसके असर में डूबा रहता है। शराब ठेकेदार के गुर्गे भी शामिल पड़ताल में सबसे चौंकाने वाला तथ्य तब सामने आया, जब सूत्रों से पता चला कि कंजर डेरे से सिर्फ स्थानीय ग्राहक ही शराब नहीं खरीदते, बल्कि कुछ शराब ठेकेदारों के लोग भी यहां से बड़ी मात्रा में कच्ची शराब उठाते हैं। इस शराब को पाउच और प्लास्टिक की बोतलों में पैक कराया जाता है। फिर आसपास के गांवों में अवैध शराब विक्रेताओं तक पहुंचाया जाता है। कम कीमत में मिलने वाली इस शराब से दो से चार गुना तक मुनाफा कमाया जाता है। अवैध शराब बेचने वालों को पकड़े जाने का डर नहीं रहता, क्योंकि उन्हें भरोसा होता है कि शराब ठेकेदारों के लोगों के जरिए आई है। कई लोग इस कच्ची शराब को सरकारी समझकर पी जाते हैं। सूत्र बताते हैं कि जो लोग ठेकेदारों से शराब नहीं खरीदते, उन्हें आबकारी या पुलिस के जरिए पकड़वाने का खतरा बना रहता है। अब पढ़िए, रिपोर्टर और महिला के बीच हुई बातचीत के अंश… महिला – कौन हो, यहां क्यों आए हो?
रिपोर्टर – मैं भिंड शहर से आया हूं। समाजसेवी हूं। गरीब बस्तियों में सरकारी योजना के बार में जानकारी जुटा रहा हूं।
महिला – क्या जानकारी ले रहे हो?
रिपोर्टर – आप लोगों को सरकारी योजनाओं का लाभ मिला रहा है?
महिला – नहीं मिल रहा? इसी समय घर के अंदर से दूसरी महिला आ गई, तभी पहली महिला ने कुछ दूसरी भाषा में बातचीत की। इस पर रिपोर्टर ने पूछा- ये कौन सी भाषा है। उसने बताया कि हम लोग राजस्थानी में बातचीत करते हैं।
रिपोर्टर – आप वीर भूमि राजस्थान के लोग हो?
महिला – हां, मेरे पूर्वज राजस्थान के हैं। हम लोग राठ-महोबा से 10-15 साल पहले यहां आकर बस गए।
रिपोर्टर – ये पक्के मकान पीएम आवास योजना से बनाए होंगे?
महिलाएं – नहीं, खुद की मेहनत से। हम लोगों को आज तक कोई सरकारी लाभ नहीं मिला। आधार कार्ड है। पैन कार्ड है। बैंक खाता है, परंतु हमारे किसी व्यक्ति का वोटर कार्ड नहीं है।
रिपोर्टर – क्यों? वोटर कार्ड बनाने कोई आया नहीं?
महिलाएं – वे लोग बहुत सारी जानकारी मांगते हैं, इसलिए वोटर कार्ड नहीं बना। हम लोग वोट नहीं डाल पाते।
रिपोर्टर – मनरेगा में मजदूरी या फिर सरकारी राशन मिलता है?
महिलाएं – नहीं, कुछ नहीं मिलता।
रिपोर्टर – बच्चे पढ़ते या नहीं?
महिलाएं – हां, पढ़ने स्कूल में जाते हैं। सरकारी स्कूल में पढ़ते हैं?
रिपोर्टर- ठीक है। आप बताइए कितने परिवार यहां रहते हैं। परिवार के मुखिया का नाम बताइए?
महिला – मैं नाम नहीं बता पाऊंगी।
रिपोर्टर – ऐसा क्यों?
महिलाएं – हम लोग नाम बताएंगे तो डेरे पर लोग हमसे लड़ेंगे?
रिपोर्टर – क्यों लड़ेंगे। आप लोगों की जानकारी प्रशासन को देंगे। प्रशासन आप को योजना से जोड़ेगा।
महिलाएं – नहीं, हम लोग घर खर्च के लिए शराब के कुछ पाउच बेचते हैं। इससे ही परिवार का भरण-पोषण होता है।
रिपोर्टर- ये शराब आप लोग यहीं बनाते हैं?
महिलाएं- नहीं, दूसरी जगह से आती है। मैं कुछ बता नहीं पाऊंगी। इतना कहते हुए महिलाओं ने चुप्पी साध ली। इसके बाद कुछ नहीं बताया।

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