बालाघाट के बैगा-गोंड बहुल गांवों में पिछले दो महीनों में 19 बच्चों की मौत सामने आई है। इनमें कोरका, मातला, मछुरदा और कोंडेकसा जैसे गांव शामिल हैं, जो नक्सल प्रभावित रहे हैं। बीमारी और मौतों के बीच यहां एक और चुनौती सामने आई- बीमार बच्चों को अस्पताल तक पहुंचाना। कई परिवार एलोपैथिक इलाज के लिए तैयार नहीं थे। मेडिकल टीम पहुंचती तो बच्चे छिपा दिए जाते। एक मामले में परिजन एंबुलेंस टीम पर कुल्हाड़ी लेकर दौड़े तो बोंदारी में नैन सिंह बच्चों को अस्पताल भेजने के बजाय खुद पर डीजल डालकर जान देने को तैयार हो गया। एसपी आदित्य मिश्रा के मुताबिक, इन्हीं नक्सल प्रभावित गांवों के युवा आदिवासियों और मेडिकल सिस्टम के बीच सबसे अहम कड़ी बने हैं। ये पुलिस की स्पेशल सपोर्ट यूनिट (एसएसयू) के जवान हैं। 2023 में स्थानीय युवक-युवतियों को भर्ती कर बनाई गई इस यूनिट के 200 जवान मेडिकल टीमों के साथ गांवों और अस्पतालों में मदद कर रहे हैं। ये अब तक 100 से ज्यादा बच्चों को अस्पताल में भर्ती कराने और उनकी देखरेख में मदद कर चुके हैं। अभी 50 से ज्यादा मरीज अस्पतालों में भर्ती हैं। एसएसयू के युवा इन्हीं गांवों से हैं, इसलिए स्थानीय भाषा, संस्कृति व मान्यताओं को समझते हैं। नक्सल प्रभावित क्षेत्र होने से कई ग्रामीण फोर्स की वर्दी से भी डरते हैं, इसलिए जवान सामान्य पैंट-शर्ट में उनके बीच पहुंचते हैं। अस्पताल ले जाने के लिए समझाने से लेकर दवा खिलाने और वार्ड-आईसीयू में देखरेख तक साथ रहते हैं। टीम आती तो बच्चे बकरियों के बीच छिपा देते थे
