शुजालपुर क्षेत्र के बड़ी पोलाय में दक्षिण अफ्रीकी विशेषज्ञों और वन विभाग की टीम ने दो दिन में 176 काले हिरणों का रेस्क्यू किया। शनिवार को 97 और रविवार को 79 हिरणों को रेस्क्यू कर ट्रकों के जरिए कूनो नेशनल पार्क, श्योपुर की ओर रवाना किया गया। इस ऑपरेशन में दक्षिण अफ्रीका की ‘बोमा’ तकनीक का इस्तेमाल किया गया। इसमें हिरणों को न जाल से पकड़ा गया और न ही बेहोशी की दवा दी गई। हेलिकॉप्टर से झुंड को रास्ते की ओर हांका रेस्क्यू के दौरान खेतों के ऊपर कम ऊंचाई पर हेलिकॉप्टर उड़ाया गया। इसकी मदद से काले हिरणों के झुंड को धीरे-धीरे एक खास रास्ते की ओर हांका गया। करीब एक किलोमीटर लंबे V-आकार के फनल से होते हुए हिरण सीधे ट्रकों तक पहुंचे। रास्ते को इस तरह बनाया गया था कि हिरण बिना ज्यादा घबराए आगे बढ़ते रहें। लोहे की दीवारों की जगह पर्दे और झाड़ियों का इस्तेमाल इस ऑपरेशन में फनल बनाने के लिए लोहे की दीवारों के बजाय हरे-काले पर्दे, स्थानीय घास और झाड़ियों का इस्तेमाल किया गया। इससे हिरणों को सामने ठोस दीवार जैसी रुकावट नजर नहीं आई। रास्ता धीरे-धीरे संकरा होता गया और उसका अंतिम सिरा ट्रकों तक पहुंचा। तस्वीरे देखिए… हिरणों के अंदर पहुंचते ही बंद किए पर्दे बोमा तकनीक में हिरणों के स्वभाव और भागने की दिशा का इस्तेमाल किया जाता है। झुंड के फनल में दाखिल होने के बाद उसे धीरे-धीरे ट्रकों की ओर बढ़ाया गया। हिरणों के अंदर पहुंचते ही पीछे के पर्दे बंद कर दिए गए, ताकि वे वापस न लौट सकें। इसके बाद हिरणों को कूनो नेशनल पार्क की ओर रवाना किया गया। 2 से 5 फीट की ऊंचाई पर उड़ता है हेलिकॉप्टर उज्जैन सीएफ किरण बिसेन के मुताबिक, दो से ढाई घंटे तक चलने वाले इस ऑपरेशन में दक्षिण अफ्रीकी पायलट हेलिकॉप्टर को जमीन से महज 2 से 5 फीट की ऊंचाई तक लाकर झुंड को बोमा की तरफ हांकते हैं। इस दौरान लो-फ्लाइंग हर्डिंग, जमीन पर मौजूद टीम के साथ तालमेल और सही समय पर पर्दे बंद करने की तकनीक का इस्तेमाल किया जाता है। मध्य प्रदेश के सात डीएफओ समेत करीब 20 वनकर्मी इस प्रक्रिया की फील्ड ट्रेनिंग ले रहे हैं, ताकि भविष्य में भारतीय टीमें भी ऐसे ऑपरेशन कर सकें। 30 डिग्री तापमान पर रोक देते हैं ऑपरेशन विशेषज्ञों के प्रोटोकॉल के मुताबिक, तापमान 30 डिग्री सेल्सियस तक पहुंचने पर ऑपरेशन रोक दिया जाता है। अधिक गर्मी और लंबे समय तक दौड़ने से हिरणों की मांसपेशियों को नुकसान पहुंच सकता है। इसे ‘कैप्चर मायोपैथी’ कहा जाता है। गंभीर स्थिति में इससे हृदय संबंधी जोखिम भी हो सकते हैं। इसलिए रेस्क्यू के दौरान हिरणों के तनाव, थकान और चोट की आशंका कम रखने पर जोर दिया जाता है। नर-मादा को अलग करने के लिए हल्के स्पर्श का इस्तेमाल ट्रकों में हवा आने-जाने के लिए बड़े छेद रखे जाते हैं। हिरणों के अंदर पहुंचने के बाद वनकर्मी पतली लकड़ी से हल्का स्पर्श कर नर और मादा को अलग-अलग हिस्सों में करते हैं। इसका उद्देश्य नर हिरणों के नुकीले सींगों से मादाओं को चोट लगने का जोखिम कम करना है। सफर के दौरान धक्का-मुक्की और अचानक होने वाली हलचल से बचाने के लिए भी सावधानी रखी जाती है। गंध से लेकर बिजली लाइनों तक की जांच ऑपरेशन से एक दिन पहले ग्रामीणों को खेतों में पानी नहीं छोड़ने और कार्यस्थल पर नहीं जाने के लिए कहा जाता है। टीम रास्ते में मौजूद बाधाओं, खाने-पीने की चीजों और तेज गंध जैसी संभावित दिक्कतों की जांच करती है। परफ्यूम और अन्य तेज गंधों को लेकर भी सावधानी रखी जाती है। टीम सुबह करीब तीन बजे मौके पर पहुंचकर तैयारियों और तकनीकी व्यवस्थाओं की जांच करती है। इसके बाद करीब आठ बजे हेलिकॉप्टर की उड़ानों के साथ ऑपरेशन शुरू किया जाता है। बड़ी पोलाय में खेतों के बीच आबादी, रास्ते और हाईटेंशन बिजली लाइनें होने के कारण ऑपरेशन चुनौतीपूर्ण है। कम ऊंचाई पर हेलिकॉप्टर उड़ाते समय बिजली लाइनों, ग्रामीणों और वन्यजीवों की सुरक्षा का ध्यान रखना पड़ता है। दो दिन के ऑपरेशन के बाद बोमा सेटअप को अगली लोकेशन पर शिफ्ट किया जा रहा है। इस साल 2 हजार हिरणों को शिफ्ट करने का लक्ष्य पीसीसीएफ वाइल्ड लाइफ एल. कृष्णमूर्ति के मुताबिक, पिछले साल इस तकनीक से 847 हिरणों को शिफ्ट किया गया था। इस साल 2 हजार हिरणों को सुरक्षित स्थानांतरित करने का लक्ष्य है। उन्होंने कहा कि इसी तकनीक से आगे खेतों में फसलों को नुकसान पहुंचाने वाली नीलगायों को भी रेस्क्यू करने की योजना है। किसान बोले- एक बीघा में 18 की जगह 25 किलो बीज डालना पड़ रहा शुजालपुर क्षेत्र के बड़ी पोलाय, हन्नूखेड़ी, अमसियाखेड़ी और बंजारी सहित आसपास के गांवों में किसान काले हिरणों के झुंड से परेशान हैं। किसानों का कहना है कि हिरण सोयाबीन की फसल को नुकसान पहुंचाते हैं। कई बार खेतों में 50 से 100 तक हिरण एक साथ पहुंच जाते हैं। बड़ी पोलाय के किसान लीलाधर ने बताया कि सोयाबीन में कोपलें निकलते ही हिरण उन्हें खाने लगते हैं। हार्वेस्टर चलाने पर कई बार दानों की जगह सिर्फ ठूंठ मिलते हैं। आठ बीघा में करीब 50 क्विंटल सोयाबीन होने की उम्मीद थी, लेकिन राहुल मंडलोई के मुताबिक, उत्पादन घटकर 15 से 16 क्विंटल रह गया। नुकसान की भरपाई के लिए अब एक बीघा में 18 किलो की जगह करीब 25 किलो बीज डालना पड़ रहा है। किसान लखन डबोतिया ने बताया कि उनके खेत में 200 से 250 तक हिरण आ जाते हैं। इसके अलावा 40 से ज्यादा नीलगाय भी फसल को नुकसान पहुंचाती हैं।
