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स्कूल में बच्चे से अलग बर्तन मंगवाए:नाना बोले- जाति को लेकर भेदभाव करते हैं, टीसी देकर स्कूल से निकाला

दोपहर का वक्त है। मिट्टी के छोटे-से आंगन में पुरानी चटाई बिछी है। उस पर नौ साल का एक बच्चा चुपचाप बैठा है। सामने चौथी कक्षा की हिंदी की किताब खुली हुई है। वह कुछ देर तक शब्दों को जोड़कर पढ़ने की कोशिश करता है, फिर किताब बंद कर देता है। पास ही उसका बस्ता रखा है, लेकिन अब स्कूल जाने की कोई जल्दी नहीं दिखती। यह वही बच्चा है, जो नए सत्र के पहले दिन नई कक्षा में पहुंचने की खुशी लेकर स्कूल गया था। लेकिन दोपहर तक घर लौट आया। इसके बाद उसने स्कूल की चौखट नहीं लांघी। बताया जा रहा है कि आलीराजपुर जिले के खंडाला गमीर प्राथमिक विद्यालय में बच्चे के साथ जाति को लेकर भेदभाव किया गया। खाने के लिए अलग से बर्तन मंगवाए जा रहे थे। क्या सचमुच आलीराजपुर के स्कूल में बच्चों के साथ जातिगत भेदभाव हो रहा है या असली कहानी कुछ और है? इस ग्राउंड रिपोर्ट में पढ़िए… हम जब गांव पहुंचे तो बच्चे के नाना हासम सिंह सोलंकी से पूछा- “अब स्कूल क्यों नहीं जाता?” वो बच्चे की तरफ देखते हैं, फिर धीमी आवाज में कहते हैं, “हमने सोचा था पढ़-लिख जाएगा तो हमारी तरह मजदूरी नहीं करेगा। लेकिन अब स्कूल का नाम लेते ही चुप हो जाता है।” यहीं से शुरू होती है आलीराजपुर जिले के खंडाला गमीर प्राथमिक विद्यालय की वह कहानी, जो अब गांव की गलियों से निकलकर जिला मुख्यालय तक पहुंच चुकी है। एक तरफ परिवार का आरोप है कि बच्चे के साथ तीन साल तक जाति के आधार पर भेदभाव किया गया। दूसरी तरफ स्कूल के शिक्षक इन आरोपों को पूरी तरह झूठा बताते हैं। उनका कहना है कि बच्चे के नाना नशे की हालत में स्कूल पहुंचे थे और बेवजह विवाद किया। दोनों पक्ष अपनी-अपनी बात पर अड़े हैं। लेकिन इन आरोपों और जवाबों के बीच एक सवाल सबसे बड़ा बनकर सामने आता है-अगर सिर्फ बहस हुई थी, तो उसी समय बच्चे का ट्रांसफर सर्टिफिकेट (टीसी) कैसे जारी हो गया? घर तक सिमट गई बच्चे की पढ़ाई खंडाला गमीर गांव के एक छोर पर मिट्टी और टीन से बना एक छोटा-सा घर है। बिजली नहीं है। बाहर घास-फूस की झोपड़ी में नानी चूल्हे पर खाना बना रही हैं। बच्चे की मां का बचपन में ही निधन हो गया था। तब से नाना-नानी ने ही उसे पाल-पोसकर बड़ा किया। दोनों मजदूरी करते हैं। दिनभर खेतों और निर्माण कार्य में मेहनत करने के बाद जो कमाई होती है, उसी से बच्चे की पढ़ाई भी चलती रही। नाना कहते हैं, “मैं खुद पढ़ा-लिखा नहीं हूं। चाहता था कि यह पढ़-लिखकर अच्छा इंसान बने। इसलिए रोज किताब लेकर बैठाता हूं। लेकिन अब इसकी पढ़ाई घर तक ही रह गई है।” तीन साल से भेदभाव का आरोप 7 जुलाई को कलेक्टर की जनसुनवाई में पहुंचे हासम पिता नानचिया ने जो शिकायत दी, उसने प्रशासन को भी जांच के लिए मजबूर कर दिया। बच्चे के नाना गुस्से से कहते हैं- मैं उनसे पूछता हूं, “क्या हुआ था?” वह बिना रुके आगे कहते हैं कि तीन साल से मेरे नाती को बाकी बच्चों से अलग बैठाया जाता था। मिड-डे मील में उसके लिए घर से अलग बर्तन मंगवाए जाते थे। कई बार उसे कक्षा के बाहर भी बैठा दिया जाता था। हम बहुत दिन तक चुप रहे। लगा शायद सब ठीक हो जाएगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। बच्चे को लगातार प्रताड़ित किया जाता रहा। पहली जुलाई… और सब कुछ बदल गया 1 जुलाई को नया शैक्षणिक सत्र शुरू हुआ। बच्चा चौथी कक्षा में पहली बार स्कूल पहुंचा। दोपहर तक वह वापस घर आ गया। खुशी-खुशी घर से गया था लेकिन लौटा तो उसके चेहरे पर उदासी थी। अगले दिन उसके नाना स्कूल पहुंचे। वह बताते हैं कि मैं सिर्फ पूछने गया था कि मेरे नाती के साथ अलग व्यवहार क्यों किया जा रहा है। लेकिन बात बढ़ गई। यही सवाल सबसे बड़ा है… इस पूरे विवाद में सबसे ज्यादा चर्चा टीसी को लेकर हो रही है। अगर बच्चा सिर्फ दो दिन पहले नए सत्र में आया था तो टीसी इतनी जल्दी कैसे बन गई? क्या अभिभावक ने पहले से आवेदन दिया था? क्या विभागीय प्रक्रिया पूरी हुई थी? क्या प्रधानाध्यापक की स्वीकृति ली गई? या फिर विरोध के तुरंत बाद ही सारी औपचारिकताएं पूरी कर दी गईं? इन सवालों का जवाब फिलहाल किसी के पास नहीं है। यही वजह है कि मामला अब सिर्फ जातीय भेदभाव तक सीमित नहीं रहा, बल्कि स्कूल मैनेजमेंट का कामकाज भी सवालों के घेरे में है। स्कूल की तस्वीर भी कई सवाल छोड़ती है खंडाला गमीर प्राथमिक विद्यालय में कुल 37 बच्चे पढ़ते हैं। 15 बालक और 22 बालिकाएं। दो शिक्षक पदस्थ हैं। शिक्षक सज्जनसिंह भयड़िया वर्ष 2015 से यहां पदस्थ हैं, जबकि शिक्षिका मंजुला सोलंकी पिछले सत्र में यहां स्थानांतरित होकर आई हैं। सबसे दिलचस्प बात यह है कि पूरे स्कूल में यह बच्चा अकेला है, जो दूसरे समुदाय से आता है। बाकी सभी विद्यार्थी एक ही समुदाय के हैं। परिजन इसे भी अपने आरोपों के समर्थन में रखते हैं। शिक्षकों ने बताया नशे में आए थे नाना स्कूल के शिक्षक सज्जनसिंह भयड़िया स्कूल में जातिगत भेदभाव के आरोपों को सिरे से खारिज करते हैं। उन्होंने कहानी का दूसरा पहलू सामने रखा। उन्होंने बताया कि बच्चे के नाना शराब के नशे में स्कूल आए थे। उन्होंने विवाद किया। हमने कभी किसी बच्चे के साथ जाति के आधार पर भेदभाव नहीं किया। घटना के बाद हमने स्टाफ को उनके घर भी भेजा था। हम चाहते थे कि बच्चा वापस स्कूल आए, लेकिन वह उस समय अपने नाना के साथ बाजार गया हुआ था। स्कूल में सभी बच्चों के साथ समान व्यवहार किया जाता है। कलेक्टर ने कहा- नाना ने ही निकाली टीसी आलीराजपुर कलेक्टर नीतू माथुर घटना में जाति के आधार पर भेदभाव वाली बात से इनकार कर रही हैं। उनका कहना है कि बच्चों का आपस में झगड़ा हुआ और फिर उसके नाना आए और टीसी निकालकर ले गए। जाति वाली बात इसलिए भी सही नहीं हैं कि टीचर, बच्चे सभी आदिवासी समाज से ही हैं। बच्चा अभी स्कूल जा रहा है या नहीं, इस बारे में पता नहीं हैं।

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