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सूरज की रोशनी बनी सजा,अंधेरे कमरों में कट रही जिंदगी:रीवा के एक ही परिवार के 4 बच्चे दुर्लभ बीमारी के शिकार; अंग्रेज कहकर चिढ़ाते हैं लोग

रीवा जिले से बच्चों में दुर्लभ बीमारी का मामला सामने आया है। जवा तहसील के ग्राम पंचायत देवखर (कोरियान टोला) में रहने वाले सुग्रीव कोरी का परिवार एक ऐसी अजीब और दर्दनाक स्थिति से गुजर रहा है, जहां सूरज की रोशनी मासूम बच्चों के लिए किसी सजा जैसी बन गई है। इस परिवार के चार बच्चे एक ऐसी दुर्लभ आनुवंशिक बीमारी से जूझ रहे हैं, जिसने न सिर्फ उनके शरीर का रंग छीन लिया है, बल्कि उनकी आंखों की रोशनी भी कमजोर कर दी है। खेलने-कूदने और स्कूल जाने की उम्र में ये बच्चे चौबीसों घंटे अंधेरे कमरों में रहने को मजबूर हैं। पढ़िए रिपोर्ट सफेद बाल, सफेद त्वचा: अंग्रेज कहकर चिढ़ाते हैं लोग इस बीमारी के कारण बच्चों अनामिका (5 वर्ष), रिया (9 वर्ष), प्रियांशु (13 वर्ष) और पुष्पेंद्र (10 वर्ष) के सिर के बाल और पूरी त्वचा जन्म से ही पूरी तरह सफेद है। सबसे दुखद बात यह है कि इस शारीरिक लाचारी के बीच समाज का रवैया भी उनके प्रति असंवेदनशील है। गांव के अन्य बच्चे और लोग अंग्रेज-अंग्रेज कहकर चिढ़ाते हैं और उनका मजाक उड़ाते हैं। बच्चों का कहना है कि लोग उन्हें देखकर हंसते हैं, जिससे वे मानसिक रूप से परेशान रहते हैं और अब उन्होंने डर के मारे घर से बाहर निकलना और दूसरों से बात करना बेहद कम कर दिया है। तेज धूप या तेज रोशनी होते ही बच्चों की आंखों में भयंकर जलन और चुभन होने लगती है। बाहर निकलने पर आंखें पूरी तरह बंद हो जाती हैं और संतुलन बिगड़ने से बच्चे कुछ ही दूरी पर गिर पड़ते हैं। बीमारी का डॉक्टरी सच: क्या है ‘एल्बिनिज्म’? मेडिकल विशेषज्ञों के अनुसार, बच्चों में दिखाई दे रहे ये लक्षण एल्बिनिज्म (Albinism – जन्मजात सफेदपन) की ओर इशारा करते हैं। यह एक अत्यंत दुर्लभ आनुवंशिक (जेनेटिक) बीमारी है। इसमें शरीर के भीतर ‘मेलानिन’ नामक तत्व पर्याप्त मात्रा में नहीं बन पाता। मेलानिन ही वह पिगमेंट है जो इंसान के शरीर, बाल और आंखों को उसका सामान्य रंग देता है। मेलानिन न होने से त्वचा धूप के प्रति अति-संवेदनशील हो जाती है और आंखों का विजन (रोशनी) बहुत कमजोर हो जाता है। सिस्टम की दोहरी मार: बायोमेट्रिक फेल होने से राशन और दिव्यांग लाभ बंद यह परिवार न सिर्फ बीमारी, बल्कि सिस्टम की बेरुखी और गरीबी से भी दो-चार हो रहा है। बीमारी के लक्षणों के कारण उनके साथ तकनीकी दिक्कतें आ रही हैं। राशन का संकट: बच्चों की इस बीमारी की वजह से फिंगरप्रिंट और आंखों की पुतली (रेटिना स्कैन) मशीन पर मैच नहीं हो पा रही है। इसके चलते उनका सरकारी राष्ट्रीय पहचान पत्र (बायोमेट्रिक) सत्यापन अधूरा पड़ा है। डेटा मैच न होने से राशन कार्ड पोर्टल पर सक्रिय नहीं हो पा रहा और गरीब परिवार को सरकारी राशन मिलने में भारी दिक्कत आ रही है। दिव्यांगता लाभ से वंचित: इतनी गंभीर और स्पष्ट शारीरिक अक्षमता के बाद भी अब तक प्रशासन द्वारा इन बच्चों का दिव्यांग प्रमाण पत्र नहीं बनाया गया है। नतीजा यह है कि परिवार को दिव्यांग पेंशन, बच्चों की छात्रवृत्ति या किसी भी अन्य सरकारी मदद का लाभ नहीं मिल पा रहा है। मां ने कहा- बड़े अस्पताल में इलाज कराना हमारे वश में नहीं बच्चों की मां माया कोरी और मंजू कोरी ने रोते हुए बताया कि मजदूरी की कम कमाई से घर का खर्च चलाना मुश्किल है। ऐसे में बड़े अस्पताल में इलाज कराना उनके बस की बात नहीं। बच्चे पढ़ना चाहते हैं, लेकिन किताबों के अक्षर धुंधले दिखते हैं। स्वास्थ्य अधिकारी बोले- बच्चों का स्वास्थ्य परीक्षण कराएंगे स्वास्थ्य अधिकारी डॉ. यत्नेश त्रिपाठी कहते हैं कि यह मामला पूरी तरह आनुवंशिक बीमारी का प्रतीत होता है। विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम से बच्चों का स्वास्थ्य परीक्षण कराकर उचित इलाज और आवश्यक सहायता उपलब्ध कराई जाएगी। शासन को भी इसके बारे में अवगत कराया जा रहा है। कलेक्टर बोले- स्वास्थ्य टीम भेजकर मदद करेंगे कलेक्टर नरेंद्र सूर्यवंशी के मुताबिक, मामला बेहद गंभीर और संवेदनशील है। प्रशासन इसकी पूरी जानकारी ले रहा है। स्वास्थ्य विभाग की एक विशेष टीम को तुरंत मौके पर भेजकर आवश्यक कार्रवाई और मदद सुनिश्चित की जाएगी।

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